Rajya Sabha (राज्यसभा) सांसद और उत्तर प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री Dr. Dinesh Sharma (डॉ. दिनेश शर्मा) ने कहा है कि आजाद भारत में गुलामी के प्रतीक चिह्न स्वीकार नहीं किए जा सकते। उनका कहना है कि देश को अब मानसिक रूप से भी गुलामी के दौर से पूरी तरह बाहर निकलने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जिन शूरवीरों ने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया, उनका उद्देश्य यह नहीं था कि स्वतंत्र भारत में आक्रांताओं के प्रतीकों और नामों को सम्मान के साथ बनाए रखा जाए। उन्होंने यह मुद्दा Rajya Sabha (राज्यसभा) में विशेष महत्व के विषय के रूप में उठाया।
राज्यसभा में रखा अपना पक्ष:
Dr. Dinesh Sharma (डॉ. दिनेश शर्मा) ने सदन में कहा कि दुनिया के कई देशों ने समय के साथ गुलामी और आक्रांताओं से जुड़े प्रतीकों को सार्वजनिक स्थानों से हटा दिया है। उनके अनुसार भारत को भी स्वतंत्रता के 79 वर्ष बाद इस दिशा में गंभीरता से कदम उठाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि नए भारत की सोच के अनुरूप राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने के लिए ऐसे प्रतीकों की समीक्षा जरूरी है।
विदेशों के उदाहरण का किया उल्लेख:
अपने संबोधन में Dr. Dinesh Sharma (डॉ. दिनेश शर्मा) ने कहा कि Poland (पोलैंड) और Baltic Countries (बाल्टिक देशों) ने सार्वजनिक स्थानों से सोवियत शासन से जुड़े प्रतीकों को हटा दिया। इसी प्रकार China (चीन) ने जापानी आक्रांताओं से जुड़ी निशानियों को समाप्त करने के साथ-साथ अपने पाठ्यक्रम में उन्हें आक्रांता के रूप में पढ़ाने का कार्य किया। उन्होंने इन उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि कई देशों ने अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को प्राथमिकता देते हुए ऐसे कदम उठाए हैं।
देश की सड़कों के नाम बदलने की बात:
Dr. Dinesh Sharma (डॉ. दिनेश शर्मा) ने कहा कि देश की राजधानी Delhi (दिल्ली) में आज भी कई सड़कें Babar (बाबर) और Akbar (अकबर) जैसे आक्रांताओं के नाम से जानी जाती हैं। उनका कहना था कि स्वतंत्र भारत में ऐसे नामों की समीक्षा की जानी चाहिए और राष्ट्रीय गौरव को ध्यान में रखते हुए उचित निर्णय लिया जाना चाहिए।
न्याय व्यवस्था का भी किया उल्लेख:
अपने वक्तव्य में उन्होंने न्याय व्यवस्था का भी जिक्र किया। उनका कहना था कि न्यायालयों में “माय लॉर्ड” जैसे संबोधन मानसिक दासता का प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि नए भारत को ऐसी मानसिकता से मुक्त बनाने के लिए व्यापक स्तर पर विचार करने की आवश्यकता है।
राष्ट्रीय आयोग बनाने का दिया सुझाव:
Dr. Dinesh Sharma (डॉ. दिनेश शर्मा) ने सुझाव दिया कि राष्ट्रीय स्तर पर एक आयोग का गठन किया जाए, जो औपनिवेशिक प्रतीकों और अप्रासंगिक कानूनों की समीक्षा करे। उनके अनुसार यह आयोग समय की आवश्यकता के अनुरूप ऐसे विषयों का अध्ययन कर उचित सिफारिशें प्रस्तुत कर सकता है।
पाठ्यक्रम और स्मारकों में बदलाव की मांग:
उन्होंने कहा कि विद्यालयों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों के पाठ्यक्रम तथा संग्रहालयों में आक्रांताओं को शासक के रूप में नहीं बल्कि आक्रांता के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि स्मारकों और सार्वजनिक स्थलों से आक्रांताओं के नाम हटाकर देश के लिए बलिदान देने वाले शूरवीरों के नाम पर उनका नामकरण किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां देश के वास्तविक नायकों से प्रेरणा ले सकें।
नए भारत की सोच पर दिया जोर:
अपने वक्तव्य के अंत में Dr. Dinesh Sharma (डॉ. दिनेश शर्मा) ने कहा कि नए भारत को गुलामी की मानसिकता से पूरी तरह मुक्त करना समय की आवश्यकता है। उनका मानना है कि राष्ट्रीय अस्मिता और स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान को ध्यान में रखते हुए इस दिशा में गंभीर पहल की जानी चाहिए।
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