चुनाव आयोग का इतिहास? मोदी सरकार में कई बार लगे आरोप!
नई दिल्ली। भारत का चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है, जिसकी स्थापना 25 जनवरी 1950 को संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत हुई थी। आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी दी गई है। देश के पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन (Sukumar Sen) थे। चुनाव आयोग की संरचना और कामकाज समय के साथ बदला है, लेकिन उसकी निष्पक्षता, अधिकारों और फैसलों को लेकर राजनीतिक बहस अलग-अलग दौर में सामने आती रही है।
एक सदस्यीय आयोग से तीन सदस्यीय व्यवस्था तक:
शुरुआत में चुनाव आयोग एक सदस्यीय संस्था था। 16 अक्टूबर 1989 को पहली बार दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किए गए, जिसके बाद आयोग तीन सदस्यीय हुआ। हालांकि 1 जनवरी 1990 को यह व्यवस्था फिर एक सदस्यीय हो गई। इसके बाद 1 अक्टूबर 1993 से आयोग दो निर्वाचन आयुक्तों और एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त वाली तीन सदस्यीय व्यवस्था में काम कर रहा है। चुनाव आयोग की आधिकारिक जानकारी में भी पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्तों और निर्वाचन आयुक्तों का यह क्रम दर्ज है।
टी.एन. शेषन के दौर में अधिकारों पर विवाद:
1990 के दशक में तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त टी.एन. शेषन (T.N. Seshan) और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच अधिकारों को लेकर विवाद सामने आया। यह मामला न्यायिक स्तर तक भी पहुंचा। इस दौर ने चुनाव आयोग के भीतर मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की शक्तियों को लेकर व्यापक चर्चा को जन्म दिया।
बाद के वर्षों में भी आयोग के फैसलों और उसकी कार्यप्रणाली पर राजनीतिक दलों की ओर से सवाल उठते रहे। इससे स्पष्ट होता है कि चुनाव आयोग को लेकर राजनीतिक विवाद केवल किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल के कार्यकाल तक सीमित नहीं रहे हैं।
2002 में गुजरात चुनाव को लेकर विवाद:
2002 में गुजरात विधानसभा चुनाव के कार्यक्रम को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) और तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त जे.एम. लिंगदोह (J.M. Lyngdoh) के बीच सार्वजनिक मतभेद सामने आए। चुनाव आयोग ने उस समय गुजरात में जल्द चुनाव कराने के फैसले को स्वीकार नहीं किया था। इसके बाद नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) की ओर से लिंगदोह तथा आयोग के फैसले पर सवाल उठाए गए।
इस घटनाक्रम को चुनाव आयोग और सरकार के बीच चुनाव कार्यक्रम तथा आयोग की भूमिका को लेकर सामने आए प्रमुख विवादों में गिना जाता है। यहां लगाए गए राजनीतिक आरोप संबंधित पक्षों के दावे थे, जिन्हें न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में देखना उचित नहीं है।
2009 में गोपालस्वामी-नवीन चावला विवाद:
2009 में तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त एन. गोपालस्वामी (N. Gopalaswami) ने निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला (Navin Chawla) को हटाने की सिफारिश तत्कालीन राष्ट्रपति के समक्ष की थी। गोपालस्वामी की ओर से चावला के कामकाज में कथित पक्षपात का मुद्दा उठाया गया था। यह मामला उस समय चुनाव आयोग के भीतर मतभेद और राजनीतिक आरोपों का बड़ा विषय बना।
तत्कालीन सरकार ने गोपालस्वामी की सिफारिश को स्वीकार नहीं किया और राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल (Pratibha Patil) ने सरकार की सलाह पर इसे खारिज कर दिया। इसके बाद नवीन चावला मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने। इस प्रकरण में अलग-अलग राजनीतिक पक्षों की ओर से एक-दूसरे पर आरोप लगाए गए थे, इसलिए इसे चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर राजनीतिक विवाद के उदाहरण के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि किसी आरोप के सिद्ध तथ्य के रूप में।
2014 के बाद किन मुद्दों पर बढ़ी बहस:
2014 के बाद चुनाव आयोग को लेकर राजनीतिक बहस में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम (EVM), वीवीपैट (VVPAT), मतदान के आंकड़े, आदर्श आचार संहिता, मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान विपक्षी दलों ने ईवीएम-वीवीपैट के सत्यापन को लेकर आयोग के सामने अपनी मांगें रखीं। इसके बाद भी चुनावी प्रक्रिया और आंकड़ों को लेकर राजनीतिक दलों की ओर से सवाल उठते रहे।
2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी मतदाता सूची, मतदान प्रतिशत के आंकड़ों और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्षी दलों ने सवाल उठाए। चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर 2024 लोकसभा चुनाव से संबंधित कार्यक्रम, आंकड़े और अन्य चुनावी दस्तावेज उपलब्ध हैं।
2025-26 में एसआईआर बना बड़ा मुद्दा:
2025-26 में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के बीच बहस का प्रमुख विषय बना। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए गए। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 60.06 लाख मामलों की जांच के बाद 27.16 लाख मतदाताओं को पात्र नहीं पाया गया। इन फैसलों के खिलाफ अपील की प्रक्रिया भी शुरू हुई। अप्रैल 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, 27.16 लाख हटाए गए मतदाताओं में 22 लाख से अधिक ने पुनः शामिल किए जाने के लिए अपील की थी।
चुनाव आयोग ने नाम हटाने के संदर्भ में मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित और दोहरे नाम जैसी श्रेणियों का उल्लेख किया है। वहीं राजनीतिक दलों ने एसआईआर की प्रक्रिया और उसके प्रभाव को लेकर अलग-अलग सवाल उठाए। इस मुद्दे पर न्यायिक कार्यवाही भी हुई और अपीलों के निपटारे के लिए अधिकरणों की व्यवस्था की गई।
क्या मोदी सरकार के दौरान ही सबसे ज्यादा आरोप लगे?:
इस सवाल का सीधा हां या नहीं में जवाब देना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा, क्योंकि 1950 से अब तक चुनाव आयोग पर लगाए गए सभी राजनीतिक आरोपों की कोई ऐसी आधिकारिक सूची उपलब्ध नहीं है, जिसमें अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल के आरोपों को एक समान मानक से गिना गया हो।
इतिहास में टी.एन. शेषन से जुड़े अधिकार विवाद, 2002 का गुजरात चुनाव विवाद और 2009 का गोपालस्वामी-नवीन चावला प्रकरण जैसे मामले मोदी सरकार के कार्यकाल से पहले सामने आए। वहीं 2014 के बाद ईवीएम-वीवीपैट, चुनावी आंकड़ों, मतदाता सूची और एसआईआर जैसे मुद्दों पर आयोग की भूमिका को लेकर लगातार राजनीतिक बहस हुई है। इसलिए उपलब्ध घटनाक्रमों से इतना कहा जा सकता है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली को लेकर विवाद भारतीय चुनावी राजनीति में लंबे समय से मौजूद रहे हैं और अलग-अलग समय में इनके मुद्दे अलग रहे हैं।
एक नजर में चुनाव आयोग की प्रमुख घटनाएं:
1950 — चुनाव आयोग की स्थापना।
1951-52 — देश में पहला आम चुनाव।
1989 — पहली बार तीन सदस्यीय आयोग की व्यवस्था।
1990 — आयोग फिर एक सदस्यीय हुआ।
1993 — तीन सदस्यीय व्यवस्था दोबारा लागू हुई।
1990 का दशक — टी.एन. शेषन और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच अधिकारों को लेकर विवाद।
2002 — गुजरात विधानसभा चुनाव के कार्यक्रम को लेकर नरेंद्र मोदी और जे.एम. लिंगदोह के बीच सार्वजनिक मतभेद।
2009 — एन. गोपालस्वामी की ओर से नवीन चावला को हटाने की सिफारिश।
2014-24 — ईवीएम, वीवीपैट, आचार संहिता, मतदान के आंकड़ों और मतदाता सूची को लेकर राजनीतिक बहस।
2025-26 — एसआईआर और मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर बड़ा विवाद।
आरोपों को तथ्य मानने से पहले जरूरी सावधानी:
चुनाव आयोग से जुड़े राजनीतिक विवादों में अलग-अलग दलों, नेताओं और अधिकारियों के दावे सामने आते रहे हैं। इसलिए किसी आरोप को न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। उपलब्ध रिकॉर्ड में जहां किसी पक्ष का आरोप दर्ज है, वहां उसे संबंधित पक्ष के दावे के रूप में ही समझना चाहिए। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े उसके फैसलों तथा आंकड़ों को समझने के लिए आधिकारिक दस्तावेजों को आधार बनाना महत्वपूर्ण है।
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