लड़की को गलत जगह डंडा मारना, बिना वर्दी वाले लाठीबाज बुलाना; डियर दिल्ली पुलिस, ये 4 हरकतें सिर्फ गैरकानूनी नहीं शर्मनाक भी हैं
Delhi (दिल्ली) में Jantar Mantar (जंतर-मंतर) के आसपास 20 जुलाई को हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। प्रदर्शन के दौरान हुई कार्रवाई से जुड़े कई वीडियो और आरोप सामने आए हैं। इन्हीं घटनाओं के बीच पुलिस की कार्यप्रणाली, बल प्रयोग के नियम और कानूनों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। प्रदर्शनकारियों की ओर से महिला प्रदर्शनकारियों के साथ अभद्र व्यवहार, बिना नेमप्लेट वाले पुलिसकर्मियों की मौजूदगी और सादे कपड़ों में कार्रवाई किए जाने जैसे आरोप लगाए गए हैं। दूसरी ओर Delhi Police (दिल्ली पुलिस) ने पैलेट गन और शॉक बैटन के इस्तेमाल से इनकार करते हुए इन दावों को भ्रामक बताया है।
महिला प्रदर्शनकारियों से व्यवहार पर उठे सवाल:
प्रदर्शन के दौरान रिकॉर्ड किए गए कुछ वीडियो और मीडिया के सामने दिए गए बयानों में महिला प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि पुरुष सुरक्षाकर्मियों ने लाठीचार्ज के दौरान उनके साथ अभद्र व्यवहार किया और गालियां दीं। वहीं Abhijeet Deepke (अभिजीत दीपके) ने दावा किया कि एक महिला प्रदर्शनकारी के साथ पुरुष पुलिस अधिकारी ने मारपीट की और उसके कपड़े फाड़े। इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
महिलाओं से कार्रवाई को लेकर क्या कहते हैं नियम:
Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 43 के अनुसार किसी महिला को केवल महिला पुलिसकर्मी ही गिरफ्तार कर सकती है या उसे छू सकती है। सिविल राइट्स एक्टिविस्ट और अधिवक्ता Vinay Srinivas (विनय श्रीनिवास) के अनुसार महिला प्रदर्शनकारियों से निपटने की जिम्मेदारी भी महिला पुलिस या महिला सुरक्षा बलों की होती है। वहीं Bharatiya Nyaya Sanhita (भारतीय न्याय संहिता) की धारा 74 के तहत यदि किसी महिला की मर्यादा को ठेस पहुंचाने की नीयत से मारपीट की जाती है तो यह दंडनीय अपराध माना गया है, जिसमें एक से पांच वर्ष तक की सजा का प्रावधान है।
बिना नेमप्लेट और वर्दी पर भी विवाद:
प्रदर्शन के दौरान सामने आए कई वीडियो में यह दावा किया गया कि Delhi Police (दिल्ली पुलिस) और Rapid Action Force (रैपिड एक्शन फोर्स) के कुछ जवान बिना नेमप्लेट के ड्यूटी करते दिखाई दिए। इस पर Rapid Action Force (रैपिड एक्शन फोर्स) की Assistant Commandant Sonia Sehrawat (असिस्टेंट कमांडेंट सोनिया सेहरावत) ने कहा कि सुरक्षात्मक उपकरण पहनने के दौरान नेमटैग गिर सकते हैं या टूट सकते हैं, इसलिए कई बार उन्हें हटाना पड़ता है।
वहीं Delhi Police (दिल्ली पुलिस) के वरिष्ठ सूत्रों का कहना है कि ऐसी परिस्थितियों में नेमप्लेट टूट सकती है और यह जानबूझकर नहीं किया जाता।
पुलिस नियमों में क्या है प्रावधान:
पुलिस मैनुअल के अनुसार फील्ड ड्यूटी के दौरान प्रत्येक पुलिसकर्मी के लिए पूरी वर्दी पहनना और नाम व रैंक वाला बैज लगाना अनिवार्य है। दंगा नियंत्रण या लाठीचार्ज के समय नेमप्लेट हटाने का कोई अलग नियम नहीं है। वर्ष 1997 में Supreme Court (सुप्रीम कोर्ट) ने DK Basu vs State of West Bengal (डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य) मामले में स्पष्ट किया था कि बिना पहचान वाले पुलिसकर्मी गिरफ्तारी नहीं कर सकते।
पूर्व IPS (आईपीएस) अधिकारी SR Darapuri (एस.आर. दारापुरी) ने भी कहा कि ड्यूटी के दौरान बिना नेमप्लेट और पहचान चिह्न के पुलिसकर्मियों की मौजूदगी पुलिस नियमों के अनुरूप नहीं मानी जाती।
सादे कपड़ों में कार्रवाई पर कानूनी पक्ष:
पुलिस मैनुअल के अनुसार सादे कपड़ों में तैनात पुलिसकर्मी मुख्य रूप से खुफिया जानकारी जुटाने या कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग करते हैं। भीड़ को हटाने, लाठीचार्ज करने या बल प्रयोग की कार्रवाई वर्दीधारी पुलिस बल द्वारा की जाती है। Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 148 के अनुसार भीड़ हटाने या लाठीचार्ज का आदेश केवल कार्यपालक मजिस्ट्रेट, थाना प्रभारी या उससे वरिष्ठ अधिकारी ही दे सकते हैं।
पूर्व IPS (आईपीएस) अधिकारी SR Darapuri (एस.आर. दारापुरी) का कहना है कि यदि सादे कपड़ों में मौजूद कर्मियों द्वारा लाठीचार्ज किया जाता है तो यह विभागीय निर्देशों और न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं माना जाएगा।
पैलेट गन और शॉक बैटन के दावों पर पुलिस का जवाब:
प्रदर्शन के बाद कुछ दावों में पैलेट गन और शॉक बैटन के इस्तेमाल की बात कही गई। हालांकि Delhi Police (दिल्ली पुलिस) ने इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ न तो पैलेट गन और न ही इलेक्ट्रिक स्टन गन का इस्तेमाल किया गया। पुलिस ने लोगों से ऐसी अफवाहों पर विश्वास नहीं करने की अपील की।
बल प्रयोग को लेकर निर्धारित प्रक्रिया:
पुलिस की मानक संचालन प्रक्रिया के अनुसार भीड़ नियंत्रण के लिए पहले चेतावनी दी जाती है। इसके बाद आवश्यकता पड़ने पर पानी की बौछार, आंसू गैस, हल्का लाठीचार्ज और अंत में कम घातक हथियारों के इस्तेमाल का प्रावधान है। Ministry of Home Affairs (गृह मंत्रालय) के दिशा-निर्देशों के अनुसार नॉन-लेथल हथियारों का उपयोग भी निर्धारित परिस्थितियों और सीमित उद्देश्य के लिए किया जाता है।
मामला पहुंचा अदालतों तक:
प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई से जुड़े आरोप अब न्यायालयों तक पहुंच चुके हैं। एक अधिवक्ता ने Supreme Court (सुप्रीम कोर्ट) में प्रदर्शनकारियों के साथ कथित बर्बरता का मुद्दा उठाया और वीडियो साक्ष्यों का हवाला दिया। इस पर Chief Justice of India Surya Kant (मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत) ने कहा कि न्यायालय इस आधार पर सुनवाई नहीं करेगा और वीडियो देखने का समय नहीं है।
वहीं Delhi High Court (दिल्ली हाईकोर्ट) में इस मामले से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार को CCTV (सीसीटीवी) और अन्य उपलब्ध रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान Additional Solicitor General S Raju (एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस. राजू) ने कहा कि याचिकाओं का उद्देश्य प्रचार प्राप्त करना था। इस पर हाईकोर्ट ने सवाल किया कि ऐसा निष्कर्ष किस आधार पर निकाला गया।
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