यूपी में विधानसभा के बाद ही होंगे पंचायत चुनाव:हाईकोर्ट का आदेश रुकवाने SC जाएगी सरकार, ये 5 कारण बताएगी
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव और विधानसभा चुनाव के समय को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने का आदेश दिया है, लेकिन विधानसभा चुनाव से ठीक पहले यह प्रक्रिया पूरी कर पाना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। पंचायत चुनाव में बड़ी संख्या में प्रशासनिक अधिकारियों, कर्मचारियों, पुलिस बल और सरकारी संसाधनों की जरूरत होगी। ऐसे में विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग को लेकर ग्राम प्रधान संगठन, ओबीसी आयोग और राज्य सरकार के सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी की बात सामने आई है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, पंचायत चुनाव टालने की इच्छा केवल सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) तक सीमित नहीं है। समाजवादी पार्टी (SP), बहुजन समाज पार्टी (BSP) और कांग्रेस (Congress) समेत विपक्षी दलों के लिए भी चुनाव का समय महत्वपूर्ण है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील देगी और पंचायत चुनाव पहले होने से विपक्षी दलों के सामने किस तरह की चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
दशहरे के बाद सरकार करेगी उच्चस्तरीय बैठक:
शासन से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के निर्देश पर पंचायती राज विभाग, कानून विभाग और वरिष्ठ वकीलों की टीम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का अध्ययन शुरू कर दिया है। दशहरे के बाद मुख्यमंत्री मंत्रियों और संबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ उच्चस्तरीय बैठक कर सकते हैं। इसमें सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने की रणनीति पर विचार किए जाने की बात कही जा रही है।
संसदीय कार्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार, योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल का शपथ ग्रहण 25 मार्च 2022 को हुआ था। 18वीं विधानसभा की पहली बैठक 23 मई 2022 को बुलाई गई थी। संवैधानिक प्रावधानों के तहत 19वीं विधानसभा का गठन 23 मई 2027 से पहले होना चाहिए।
ऐसे में यदि पंचायत चुनाव के कारण विधानसभा चुनाव के निर्धारित कार्यक्रम में बदलाव होता है, तो चुनावी प्रक्रिया पूरी करने के लिए सरकार और चुनाव आयोग के पास सीमित समय रह सकता है। इसी वजह से चुनावों की समय-सारणी को लेकर प्रशासनिक स्तर पर गंभीरता से विचार किए जाने की बात कही जा रही है।
ग्राम प्रधान संगठन भी सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में:
इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने के आदेश के खिलाफ ग्राम प्रधान संगठन भी सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने की तैयारी कर रहा है। संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अखिलेश सिंह का कहना है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण, मतदाता सूची की गड़बड़ियों को दूर करने और दूसरी जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा करने में समय लगेगा।
उनका कहना है कि सरकार ने ग्रामीणों द्वारा चुने गए ग्राम प्रधानों को ही पंचायतों में प्रशासक की जिम्मेदारी दी है। इसलिए चुनाव कराने में जल्दबाजी करने के बजाय जरूरी प्रक्रियाओं को पूरा करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। संगठन का तर्क है कि आरक्षण और मतदाता सूची से जुड़े काम पूरे होने के बाद ही चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ाना उचित होगा।
ओबीसी आयोग जुटा रहा आरक्षण से जुड़े आंकड़े:
राज्य का ओबीसी आयोग पंचायत चुनाव में आरक्षण से जुड़े आंकड़े जुटाने और अपनी रिपोर्ट तैयार करने में लगा है। आयोग यह पता लगाने की प्रक्रिया में है कि पिछले पंचायत चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग के कितने लोग ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य (बीडीसी) और जिला पंचायत सदस्य चुने गए थे। इसके साथ ही उन क्षेत्रों का भी आकलन किया जा रहा है, जहां ओबीसी वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम मिला।
ग्राम पंचायत स्तर पर ओबीसी जातियों की आबादी और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति से जुड़े आंकड़े जुटाए जा रहे हैं। इस कार्य में जिलाधिकारियों और पंचायती राज विभाग की मदद ली जा रही है।
आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति रामअवतार सिंह से रिपोर्ट को लेकर सवाल पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि आयोग रिपोर्ट कब सौंपेगा और आगे क्या कदम उठाएगा, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती। उनके मुताबिक, आयोग अपना काम ईमानदारी से कर रहा है और उचित समय पर रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी।
पंचायत चुनाव टालने के पीछे बताए जा रहे पांच कारण:
1. विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर असर:
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव कराने के लिए बड़ी संख्या में कर्मचारियों, पुलिसकर्मियों और प्रशासनिक अधिकारियों की जरूरत पड़ती है। यदि पूरा सरकारी तंत्र पंचायत चुनाव में व्यस्त हो जाता है, तो विधानसभा चुनाव की तैयारियां प्रभावित हो सकती हैं। मतदाता सूची में सुधार, मतदान केंद्रों की व्यवस्था, सुरक्षा बलों की तैनाती और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) के इंतजाम में भी देरी की आशंका जताई जा रही है।
2. राजनीतिक दलों में नाराजगी की आशंका:
ग्राम प्रधान और बीडीसी के चुनाव पार्टी के चुनाव चिह्न पर नहीं लड़े जाते, लेकिन ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य और जिला पंचायत अध्यक्ष के पदों के चुनाव में राजनीतिक दल अपने उम्मीदवार उतारते हैं। ऐसे में टिकट न मिलने या चुनाव हारने पर स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ सकती है। विधानसभा चुनाव से पहले यह असंतोष दलों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है।
3. ग्रामीण राजनीतिक माहौल का असर:
पंचायत चुनाव के परिणामों से गांवों में राजनीतिक माहौल और विभिन्न दलों की स्थानीय पकड़ का आकलन किया जाता है। यदि किसी पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहता है, तो चुनावी नतीजों को विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा सकता है। इसी वजह से पंचायत चुनाव के समय को लेकर राजनीतिक दलों की रणनीति महत्वपूर्ण हो जाती है।
4. आरक्षण और मतदाता सूची की प्रक्रिया:
पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए आयोग को अपनी रिपोर्ट तैयार करनी है। इसके लिए सर्वे और आंकड़ों की जांच की जा रही है। साथ ही मतदाता सूची में सुधार भी जरूरी है। यदि इन प्रक्रियाओं को पूरा किए बिना चुनाव कराए जाते हैं, तो आरक्षण और मतदाता सूची को लेकर विवाद पैदा हो सकते हैं। मामला अदालत तक पहुंचने पर चुनाव प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका रहेगी।
5. कानून-व्यवस्था की चुनौती:
पंचायत चुनाव गांव और स्थानीय स्तर पर लड़े जाते हैं। इनमें कई बार व्यक्तिगत विवाद और गुटबाजी भी सामने आती है। चुनाव के दौरान विवाद या हिंसा की आशंका को देखते हुए कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन के लिए चुनौती हो सकता है। पंचायत चुनाव के तुरंत बाद विधानसभा चुनाव होने पर सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
पंचायत चुनाव पहले होने पर विपक्ष को फायदा या नुकसान:
पंचायत चुनाव में कमजोर प्रदर्शन होने पर विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं का उत्साह प्रभावित हो सकता है। टिकट नहीं मिलने या स्थानीय स्तर पर हार-जीत को लेकर नेताओं और कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ने की आशंका भी रहती है। पंचायत चुनाव में व्यस्त रहने के कारण राजनीतिक दलों को विधानसभा चुनाव से पहले बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने के लिए कम समय मिल सकता है।
इसके विपरीत, यदि विपक्षी दल ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन करते हैं या उन्हें स्थानीय स्तर पर सरकार के खिलाफ नाराजगी दिखाई देती है, तो वे इसे विधानसभा चुनाव में अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सकते हैं। पंचायत चुनाव सभी दलों को गांवों में अपनी पकड़ और बूथ स्तर की ताकत परखने का अवसर भी देते हैं।
वहीं, सत्ताधारी दल पंचायत चुनाव में बेहतर प्रदर्शन को अपने पक्ष में बने माहौल के रूप में पेश कर सकता है। ऐसे में पंचायत चुनाव पहले कराने या टालने का राजनीतिक असर अलग-अलग दलों के लिए अलग हो सकता है। फिलहाल चुनाव की समय-सारणी को लेकर आगे की रणनीति हाईकोर्ट के आदेश, संभावित कानूनी कार्रवाई और प्रशासनिक तैयारियों पर निर्भर करेगी।
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