यूपी MLC चुनाव क्यों जीतकर भी हारी भाजपा:सपा से 3,123 वोट ज्यादा मिले; टीचर्स BJP, ग्रेजुएट सपा के साथ दिखे
उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) विधान परिषद की 11 सीटों के चुनाव परिणामों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने छह सीटों पर जीत दर्ज कर सबसे बड़ी पार्टी बनने का गौरव हासिल किया, जबकि समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के खाते में पांच सीटें गईं। हालांकि सीटों के मामले में भाजपा आगे रही, लेकिन कुल वोटों के आंकड़ों में सपा ने बढ़त बना ली। सपा को भाजपा के मुकाबले करीब 0.45 प्रतिशत यानी 3,123 वोट अधिक मिले। चुनाव परिणामों ने शिक्षक और स्नातक वर्ग के मतदाताओं के रुझान के साथ ही दोनों दलों की चुनावी रणनीति और प्रत्याशी चयन को लेकर भी कई सवाल खड़े किए हैं।
इस चुनाव में कुल 14 लाख 81 हजार 310 मतदाता पंजीकृत थे। इनमें स्नातक खंड की पांच सीटों पर 11 लाख 85 हजार 706 और शिक्षक खंड की छह सीटों पर 2 लाख 95 हजार 604 मतदाता शामिल थे। 23 अक्टूबर को हुए मतदान में कुल 55.54 प्रतिशत यानी 6 लाख 58 हजार 542 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। सीटों के बंटवारे में शिक्षक खंड की छह सीटों में से चार भाजपा और दो सपा को मिलीं, जबकि स्नातक खंड की पांच सीटों में सपा ने तीन और भाजपा ने दो सीटों पर जीत हासिल की।
शिक्षक और स्नातक वर्ग के नतीजों में अलग-अलग रुझान:
विधान परिषद चुनाव के नतीजों में शिक्षक और स्नातक वर्ग के मतदाताओं का रुझान अलग-अलग दिखाई दिया। चुनाव परिणामों के मुताबिक शिक्षक वर्ग की ज्यादातर सीटों पर भाजपा को सफलता मिली, जबकि स्नातक वर्ग में समाजवादी पार्टी ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया।
स्नातक खंड की लखनऊ और इलाहाबाद-झांसी सीट पर सपा ने जीत दर्ज की। वहीं वाराणसी शिक्षक खंड की सीट पर सपा के आशुतोष सिन्हा विजयी रहे। दूसरी ओर मेरठ और आगरा स्नातक सीट भाजपा के खाते में गईं। शिक्षक खंड में भाजपा ने लखनऊ, बरेली-मुरादाबाद, फैजाबाद-गोरखपुर और मेरठ सीटों पर जीत हासिल की, जबकि आगरा और वाराणसी शिक्षक खंड की सीटें सपा को मिलीं।
दस मौजूदा एमएलसी फिर पहुंचे विधान परिषद:
चुनाव परिणामों में एक और अहम तथ्य सामने आया कि विजयी हुए 11 प्रत्याशियों में से 10 पहले से ही विधान परिषद के सदस्य थे। केवल अवनीश सिंह पटेल को हार का सामना करना पड़ा और उन्हें परिषद से बाहर होना पड़ा।
शिक्षक वर्ग से लाल बिहारी यादव, उमेश द्विवेदी, ध्रुव कुमार त्रिपाठी, आकाश अग्रवाल, हरि सिंह ढिल्लो और श्रीचंद शर्मा दोबारा जीतकर विधान परिषद पहुंचेंगे। वहीं स्नातक वर्ग से आशुतोष सिन्हा, मान सिंह यादव, मानवेंद्र प्रताप सिंह और दिनेश गोयल ने फिर से जीत दर्ज की। अवनीश पटेल की जगह सपा की कांति सिंह विधान परिषद पहुंचेंगी। इस तरह राजधानी लखनऊ में भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा।
प्रत्याशी चयन में चूक को बताया हार की वजह:
चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा के कुछ पदाधिकारियों ने प्रत्याशी चयन को लेकर संगठन की चूक स्वीकार की। उनके मुताबिक कुछ सीटों पर उम्मीदवारों का चयन पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हुआ।
आगरा शिक्षक सीट पर सपा प्रत्याशी आकाश अग्रवाल ने पहले भाजपा से टिकट पाने के लिए संपर्क किया था। हालांकि भाजपा संगठन के एक वर्ग ने उनकी जगह हरिकिशोर तिवारी को उम्मीदवार बनाने का निर्णय लिया। इसके बाद आकाश अग्रवाल सपा में शामिल हो गए और चुनाव में हरिकिशोर को पराजित कर दिया।
वाराणसी स्नातक सीट पर भाजपा ने केदारनाथ सिंह को प्रत्याशी बनाया था, जो वर्ष 2020 में सपा के आशुतोष सिन्हा से चुनाव हार चुके थे। वहीं वाराणसी शिक्षक सीट पर भाजपा ने प्रमोद मिश्रा को मैदान में उतारा। उनके सामने सपा के लाल बिहारी यादव थे, जिन्हें शिक्षक राजनीति का अनुभवी चेहरा बताया गया। इन दोनों सीटों पर भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
लखनऊ स्नातक सीट पर भी अवनीश सिंह पटेल को लेकर शुरुआत से विरोध की स्थिति बताई गई। भाजपा ने करीब आठ महीने पहले ही उन्हें प्रत्याशी घोषित कर दिया था। इसके बावजूद संगठन ने विरोध के बीच उम्मीदवार नहीं बदला। इसी तरह झांसी-इलाहाबाद सीट पर अशोक राठौर का चयन भी पार्टी के लिए सफल साबित नहीं हुआ। चुनाव के बाद भाजपा के शीर्ष नेताओं के बीच भी लखनऊ स्नातक और इलाहाबाद-झांसी सीट पर जीत को लेकर मुश्किल की चर्चा थी। हालांकि आगरा शिक्षक और वाराणसी की दोनों सीटों पर सपा को कमजोर आंकना भी पार्टी नेतृत्व की चूक बताई गई।
गोरखपुर-फैजाबाद में प्रत्याशी बदलने का असर:
गोरखपुर-फैजाबाद सीट पर समाजवादी पार्टी ने पहले घोषित प्रत्याशी कमलेश यादव का टिकट काटकर संजयन त्रिपाठी को उम्मीदवार बनाया था। चुनाव परिणामों के विश्लेषण में इस फैसले को लेकर यादव मतदाताओं की नाराजगी की बात सामने आई। बताया गया कि इस क्षेत्र के यादव मतदाताओं ने सपा प्रत्याशी संजयन त्रिपाठी के बजाय निर्दलीय उम्मीदवार राजीव यादव का समर्थन किया। यादव मतों का राजीव यादव के पक्ष में एकजुट होना उनके मुकाबले में बने रहने की वजह बताया गया।
संगठन की टीमों पर निर्भरता भी बनी चुनौती:
चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आगरा, बरेली, वाराणसी, गोरखपुर और लखनऊ की सीटों पर प्रचार किया था। इनमें लखनऊ स्नातक सीट को छोड़कर भाजपा ने अन्य जगहों पर जीत दर्ज की। हालांकि वाराणसी की दोनों सीटों पर पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। चुनावी विश्लेषण में इन क्षेत्रों में नाराजगी और संगठनात्मक गुटबाजी को भी महत्वपूर्ण कारण बताया गया।
बताया गया कि जिन सीटों पर चुनाव की जिम्मेदारी प्रदेश और जिला स्तर की टीमों के भरोसे छोड़ी गई, वहां भाजपा को अपेक्षाकृत अधिक नुकसान हुआ। इसके उलट जिन सीटों पर संगठन की कमान अनुभवी और मजबूत नेतृत्व के हाथों में रही, वहां पार्टी को सफलता मिली। नए पदाधिकारियों के पास चुनाव संचालन का पर्याप्त अनुभव नहीं होना भी एक चुनौती के रूप में सामने आया।
लखनऊ स्नातक सीट पर कांति सिंह की जीत:
लखनऊ स्नातक सीट पर कांति सिंह और उनके पति एसपी सिंह की भूमिका को जीत के प्रमुख कारणों में गिना गया। भाजपा की ओर से मौजूदा एमएलसी अवनीश सिंह पटेल के समर्थन में पार्टी के कई बड़े नेताओं ने प्रचार किया। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह ने भी उनके लिए प्रयास किए, लेकिन इसके बावजूद भाजपा को सफलता नहीं मिली।
इस सीट पर कुल 3 लाख 13 हजार 531 मतदाता थे और 38.02 प्रतिशत मतदान हुआ। चुनावी विश्लेषण के मुताबिक कुर्मी मतदाताओं के बीच कांति सिंह को समर्थन मिला। कांति सिंह सपा के प्रतापगढ़ से सांसद शिवपाल सिंह पटेल की पत्नी हैं। वह इससे पहले वर्ष 2014 में भी सपा के टिकट पर लखनऊ स्नातक सीट से एमएलसी चुनी गई थीं। वर्ष 2020 में भाजपा ने यह सीट सपा से छीन ली थी, लेकिन इस बार कांति सिंह ने दोबारा जीत दर्ज की।
पश्चिमी यूपी में भाजपा ने बरकरार रखी पकड़:
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पांच सीटों पर भाजपा का प्रदर्शन मजबूत रहा। इनमें मेरठ-सहारनपुर मंडल की स्नातक और शिक्षक खंड की दो सीटें, आगरा मंडल की दो सीटें और बरेली-मुरादाबाद शिक्षक खंड की एक सीट शामिल थी। इन पांच सीटों में से केवल आगरा स्नातक सीट सपा जीत सकी, जबकि बाकी चार सीटों पर भाजपा ने कब्जा बरकरार रखा।
भाजपा ने मेरठ की दोनों सीटों के साथ बरेली-मुरादाबाद शिक्षक सीट पर भी जीत हासिल की। मेरठ में दोनों सीटों पर जीत का अंतर 12 हजार से अधिक रहा, जबकि बरेली-मुरादाबाद में भाजपा प्रत्याशी ने 17,676 मतों से जीत दर्ज की। आगरा स्नातक सीट पर भाजपा के मानवेंद्र सिंह उर्फ गुरुजी ने करीब 11 हजार वोटों के अंतर से जीत हासिल की। इस तरह पश्चिमी यूपी में भाजपा ने अपना प्रभाव बनाए रखा, जबकि सपा को यहां सीमित सफलता मिली।
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