सुप्रीम कोर्ट में EC का जवाब दाखिल! SIR पर फैसले सर्वसम्मति से, Form-6 में कोई बदलाव नहीं? लेकिन पूरी कहानी अभी बाकी है!
नई दिल्ली (New Delhi): मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर चुनाव आयोग (Election Commission of India) और विपक्ष के बीच जारी विवाद के बीच आयोग ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) में 15 बिंदुओं वाला जवाबी हलफनामा दाखिल किया। आयोग ने मतदाता सूची में अनियमितताओं के आरोपों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं किया गया है। आयोग ने यह भी कहा कि एसआईआर से संबंधित तीनों आदेश सर्वसम्मति से पारित किए गए थे। हलफनामे को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (Gyanesh Kumar) और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू (Sukhbir Singh Sandhu) तथा विवेक जोशी (Vivek Joshi) ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी है।
विपक्ष की याचिका पर आयोग का जवाबी हलफनामा:
यह मामला राहुल गांधी (Rahul Gandhi) और विपक्षी गठबंधन इंडिया (INDIA Bloc) के अन्य नेताओं की ओर से दायर याचिका से संबंधित है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया था। याचिकाकर्ताओं ने एसआईआर से जुड़े आधिकारिक अभिलेख सार्वजनिक करने, मतदाता सूची से हटाए गए नामों का स्वतंत्र ऑडिट कराने और बूथवार सूची उपलब्ध कराने की मांग की है।
विपक्ष का कहना है कि किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से हटाने से पहले उसे सूचना दी जानी चाहिए और अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। आयोग ने अपने हलफनामे में प्रक्रिया, निर्णय लेने के तरीके, आवेदन पत्रों और डिजिटल मतदाता अभिलेखों को लेकर उठाए गए सवालों पर अपना पक्ष रखा है। आयोग ने याचिका के आधार पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यह एक समाचार रिपोर्ट पर आधारित है।

एसआईआर के तीनों आदेश सर्वसम्मति से पारित:
चुनाव आयोग ने अपने जवाब में बताया कि जून 2025, अक्तूबर 2025 और मई 2026 में एसआईआर को लेकर जारी किए गए तीनों आदेश सर्वसम्मति से पारित हुए थे। आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी फाइल पर मुख्य चुनाव आयुक्त या अन्य चुनाव आयुक्त की ओर से लिखी गई टिप्पणियों, सवालों और सुझावों को अपने आप आयोग का अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता।
आयोग के अनुसार, सामान्य प्रक्रिया में कोई फाइल पहले एक चुनाव आयुक्त, फिर दूसरे चुनाव आयुक्त और अंत में मुख्य चुनाव आयुक्त के पास मंजूरी के लिए भेजी जाती है। तत्काल निर्णय की आवश्यकता होने पर इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी स्वीकृति ली जा सकती है, जिसे बाद में संबंधित फाइल में दर्ज किया जाता है।
फॉर्म-6 और घोषणा पत्र को लेकर स्पष्टीकरण:
फॉर्म-6 में बदलाव के आरोपों पर आयोग ने कहा कि मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले इस फॉर्म में कोई संशोधन नहीं किया गया है। आयोग के मुताबिक, फॉर्म में बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है।
आयोग ने एसआईआर के दौरान इस्तेमाल होने वाले घोषणा पत्र को फॉर्म-6 से अलग दस्तावेज बताया। उसके अनुसार, ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया में दोनों दस्तावेजों को प्रदर्शित करने के तरीके से यह भ्रम पैदा हो सकता था कि फॉर्म-6 में संशोधन किया गया है।
इस स्थिति को स्पष्ट करने के लिए आयोग ने बताया कि 21 अक्तूबर से ऑनलाइन आवेदन में फॉर्म-6 और घोषणा पत्र को अलग-अलग दिखाने की व्यवस्था की जाएगी। यह व्यवस्था कागजी आवेदन पत्रों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के अनुरूप होगी।
मतदाताओं के दस्तावेज और सुनवाई पर क्या कहा:
आयोग ने उन मतदाताओं के संबंध में भी स्पष्टीकरण दिया, जिनके अभिलेख पुराने दस्तावेजों से नहीं जुड़ पाए हैं। आयोग के अनुसार, ऐसे मतदाताओं को सामान्य तौर पर सुनवाई के लिए बुलाने की आवश्यकता नहीं होगी। बूथ स्तर के अधिकारी उनके घर जाकर दस्तावेज जुटाएंगे। हालांकि, विशेष परिस्थितियों में सुनवाई की जा सकती है और जहां संभव होगा, वहां ऑनलाइन व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाएगा।
डिजिटल मतदाता डेटाबेस ईसीआईनेट (ECINET) पर नाम जोड़ने या हटाने के अधिकार को लेकर आयोग ने कहा कि किसी मतदाता का नाम केवल निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी के आदेश के आधार पर ही जोड़ा या हटाया जा सकता है। इस व्यवस्था की जांच के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) और भारतीय विज्ञान संस्थान (Indian Institute of Science) के विशेषज्ञों वाली समिति गठित किए जाने की जानकारी भी दी गई।
गोवा के मतदाताओं और पश्चिम बंगाल की अपीलों पर सफाई:
गोवा (Goa) में मतदाता सूची से कथित तौर पर छूटे 97 लोगों के मामले में आयोग ने बताया कि इनमें से 88 लोग पहले से ही मतदाता के रूप में दर्ज थे। छह लोग विदेश में थे, जबकि तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट थे।
वहीं, पश्चिम बंगाल (West Bengal) में मतदाता सूची में नाम शामिल करने से संबंधित अपीलों पर आयोग ने कहा कि ये अपीलें सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अधिकारियों की ओर से दाखिल की गई थीं। आयोग के अनुसार, इन मामलों को उसके सामने नहीं लाया गया था।
अधिकारियों और आंतरिक दस्तावेजों पर आयोग का रुख:
आयोग ने स्पष्ट किया कि यदि कोई अधिकारी अपने निर्धारित अधिकारों से बाहर जाकर आदेश जारी करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। हलफनामे में 28 जुलाई के कार्य आवंटन आदेश का भी उल्लेख किया गया। आयोग के अनुसार, यह आदेश प्रतिनियुक्ति पर आए एक अतिरिक्त सचिव ने जारी किया था। दोनों चुनाव आयुक्तों ने अगले दिन कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा और आयोग के संयुक्त निर्देश के बाद 30 जुलाई को यह आदेश लागू नहीं किया गया।
आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ रोक लगाने की मांग वाली याचिका को कानूनी रूप से विचार योग्य नहीं बताया। उसने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान है।
इसके अतिरिक्त, आयोग ने कहा कि उसने किसी भी आंतरिक टिप्पणी या फाइल को मीडिया के लिए जारी करने की मंजूरी नहीं दी है। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को चुनौती देने वाली याचिकाओं के संबंध में आयोग ने अपने हलफनामे में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ऐसी याचिकाओं को पहले ही खारिज कर चुका है।
आगे की प्रक्रिया पर टिकी निगाहें:
एसआईआर को लेकर दाखिल इस हलफनामे में चुनाव आयोग ने अपनी प्रक्रिया और निर्णयों का बचाव करते हुए विपक्ष की ओर से उठाए गए सवालों पर जवाब दिया है। दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं ने मतदाता सूची से हटाए गए नामों के स्वतंत्र ऑडिट और बूथवार विवरण सहित संबंधित अभिलेख सार्वजनिक करने की मांग की है। अब इस मामले में आगे की न्यायिक कार्यवाही के दौरान आयोग के जवाब और याचिकाकर्ताओं की मांगों पर होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी।
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