‘मुझे चुप कराने की साजिश’: जेएनयू से बर्खास्तगी पर बोले कांग्रेस सांसद अकोइजाम, भाजपा पर लगाया बदले का आरोप
कांग्रेस सांसद और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के पूर्व प्रोफेसर अंगोमचा बिमोल अकोइजाम ने सेवा से बर्खास्त किए जाने के फैसले पर विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद हुई कार्रवाई को उन्होंने अपने खिलाफ चुनिंदा तरीके से निशाना बनाने की मुहिम बताया है। अकोइजाम का आरोप है कि मणिपुर और पूर्वोत्तर के मुद्दों पर उनकी बेबाक आवाज दबाने के लिए राजनीतिक बदले की भावना से यह कदम उठाया गया। उन्होंने जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें अपना पक्ष रखने का पूरा मौका नहीं मिला। अकोइजाम ने साफ किया कि वह बर्खास्तगी के फैसले को अदालत में चुनौती देंगे।
जांच बंद होने के एक घंटे में रिपोर्ट तैयार होने का दावा:
समाचार एजेंसी एएनआई (ANI) से बातचीत में अकोइजाम ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। उनके मुताबिक, 12 बजकर 40 मिनट पर उन्हें ईमेल के जरिए जांच बंद किए जाने की सूचना मिली। इसके लगभग एक घंटे के भीतर जांच रिपोर्ट तैयार करके कुलपति को सौंप दी गई, लेकिन उन्हें रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई।
अकोइजाम का दावा है कि रिपोर्ट सौंपे जाने के कुछ ही समय बाद उनकी बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया गया और दोपहर ढाई बजे तक मामला मीडिया में सामने आ गया। उन्होंने कुलपति के कथित बयान का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि जब रिपोर्ट पढ़े जाने को लेकर ही स्थिति स्पष्ट नहीं थी, तो इतनी जल्दी बर्खास्तगी का आदेश कैसे जारी कर दिया गया। उनके अनुसार, शुरुआत से ही जांच प्रक्रिया में गंभीर खामियां रही हैं।
शैक्षणिक शिकायत को यौन उत्पीड़न के मामले में बदलने पर सवाल:
अकोइजाम ने अपने ऊपर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों को खारिज करते हुए शिकायत की प्रकृति पर सवाल उठाए। उनका दावा है कि मूल शिकायत विभाग में पढ़ाने के तरीके और शैक्षणिक मामलों से संबंधित थी। उन्होंने सवाल किया कि यह मामला बाद में यौन उत्पीड़न और कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संरक्षण कानून (POSH Act) के तहत कैसे पहुंच गया।
उन्होंने यह भी दावा किया कि मीडिया में सामने आए ‘अंकों के बदले यौन संबंध’ जैसे आरोप मूल शिकायत में शामिल नहीं थे। अकोइजाम ने शिकायत से जुड़े 97 छात्रों और 15 हस्ताक्षरकर्ताओं का जिक्र करते हुए कहा कि हस्ताक्षर करने वालों में तीन लड़के भी शामिल थे। उन्होंने इसी आधार पर शिकायत की प्रकृति और संबंधित कानून के इस्तेमाल पर सवाल उठाए।
हालांकि, ये सभी दावे अकोइजाम की ओर से लगाए गए हैं। यौन उत्पीड़न के आरोपों और जांच के निष्कर्षों को लेकर अंतिम स्थिति संबंधित अभिलेखों और सक्षम कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही स्पष्ट होगी।
300 ईमेल भेजने के दावे को बताया गलत:
विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से जांच में सहयोग नहीं करने के आरोपों पर भी अकोइजाम ने आपत्ति जताई। उनका कहना है कि कुलपति की ओर से मीडिया में 300 ईमेल भेजे जाने की बात कही गई, जबकि उनके मुताबिक उन्हें केवल 43 से 44 ईमेल प्राप्त हुए थे।
अकोइजाम ने दावा किया कि उन्होंने 31 मई को लिखित जवाब दिया था और 16 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से अपना बयान दर्ज कराया था। उनके अनुसार, 14 अगस्त को उनके आठ गवाह भी जांच पैनल के सामने पेश हुए थे। उन्होंने कहा कि अदालत में सभी संबंधित रिकॉर्ड रखे जाएंगे, जिससे जांच में सहयोग नहीं करने के आरोपों की वास्तविक स्थिति सामने आ सकेगी।
मणिपुर और पूर्वोत्तर की आवाज दबाने का आरोप:
अकोइजाम ने इस कार्रवाई को सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) से जोड़ते हुए आरोप लगाया कि सरकार से सवाल पूछने और पूर्वोत्तर के मुद्दों को खुलकर उठाने वाले लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। उनका कहना है कि मणिपुर और पूर्वोत्तर के लोगों की आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है।
उन्होंने कहा कि वह अपने क्षेत्र से जुड़े मुद्दों को उठाना बंद नहीं करेंगे। अकोइजाम ने दावा किया कि उन्हें खामोश करने की कोशिश सफल नहीं होगी और पूर्वोत्तर से हजारों लोग अपनी आवाज बुलंद करेंगे। उन्होंने दोहराया कि वह बर्खास्तगी के फैसले के खिलाफ अदालत जाएंगे और कानूनी तरीके से अपना पक्ष रखेंगे।
9 अक्टूबर को जारी हुआ था बर्खास्तगी का आदेश:
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने 9 अक्टूबर 2026 को अकोइजाम को तत्काल प्रभाव से सेवा से हटाने का आदेश जारी किया था। विश्वविद्यालय के आदेश के मुताबिक, आंतरिक समिति ने जांच के निष्कर्षों के आधार पर उनके खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की थी।
अकोइजाम विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय के अंतर्गत सामाजिक व्यवस्था अध्ययन केंद्र में कार्यरत थे। उन पर 11 छात्राओं ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। इन आरोपों की जांच के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन्हें सेवा से हटाने का फैसला लिया। वहीं, अकोइजाम ने जांच की प्रक्रिया और बर्खास्तगी के फैसले को चुनौती देने की बात कही है। अब इस मामले में उनका अगला कदम अदालत में कानूनी चुनौती देना होगा।
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