असुर (एक विशेष अध्याय) भाग 2:- रोहतास के आसमान में अजब सी ख़ामोशी थी, उस दिन मां को बिटिया की बहुत याद आ रही थी. माँ की आँखे अपनी परी को देखने के लिए बेताब थी, चेहरे पर चिंता की लकीरें और प्रार्थना बेटी के लम्बी उम्र की. तो वहीँ हल्की मुस्कान से चेहरे पर चिंता के साथ ख़ुशी भी झलक रही थी. चिंता और ख़ुशी एक साथ हो भी क्यों न, उनकी होनहार बिटिया नीट की तैयारी कर रही थी लेकिन वो दो सौ किलोमीटर दूर काशी में थी.
काशी यानी वाराणसी, जिसे जिन्दा शहर भी कहते हैं. यहाँ आध्यात्म और शिक्षा का अद्भुद संगम मिलता है. इसलिए यहाँ दूर दूर से लाखों लोग केवल शिक्षा ग्रहण करने आते हैं. विश्व के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय के साथ ही कई कोचिंग सेंटर्स हैं जो लाखों छात्रों को विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियां करवाते हैं तो वहीँ इन छात्रों के लिए यहाँ की गलियों में सैकड़ों हॉस्टल हैं. लेकिन महादेव की इस नगरी में असुर भी आ ही जाते हैं.
रोहतास की गलियों में सन्नाटे के बिच कुत्तों के भोकने की आवाज गूंज रही थी और वाराणसी के हॉस्टल में मोबाइल की घंटी. गुलाबी ठण्ड में रोहतास के कुशवाहा परिवार के माथे पर सिकन और पसीना था. तभी एक फ़ोन ने…
कुशवाहा परिवार की लाडली अपने परिवार का नाम रोशन करने के लिए दिन रात मेहनत करती थी, वो खुश थी, उसे पूरा भरोसा था की वो इस बार नीट की परीक्षा में सफलता हासिल करेगी. रोज फ़ोन पर माँ से हर सुख दुःख बाटती थी, उसकी आवाज सुनकर माँ को तसल्ली हो जाती थी. वो 17 साल की थी लेकिन 31 जनवरी की रात क्या हुआ?
1 फ़रवरी को सुबह 5 बजे हॉस्टल संचालक के फ़ोन की घंटी बजती है, हॉस्टल संचालक का कहना था कि माँ ने फ़ोन किया था और बोला कि बिटिया की तबियत ख़राब है उसे देखलें, सुबह 6:30 बजे हॉस्टल संचालक बिटिया के कामरे में जाता है और दरवाजे को पिटता है. पिटते ही दरवाजे की सिटकनी खुल जाती है.
रोहतास के कुशवाहा परिवार के घर पर फ़ोन की घंटी बजती है और मन एक सवाल लिए कि आखिर उसका एक पैर बेड पर और एक जमीन पर था, तो ये कैसे संभव है? कुशवाहा परिवार वाराणसी की ओर रवाना हो गया, ये सफ़र कोई सामान्य सफ़र नहीं था, हाईवे, गली जैसी लगने लगी, रास्ते लम्बे लगने लगे, वक़्त धीरे हो गया, दो सौ किलोमीटर का सफ़र हजारों का लगने लगा, कई सवाल मन में लिए एक पिता का पैर जब काशी धरती पर पड़ता है तो अध्यात्म की हवा के बिच उन्हें असुर के उपस्थिति संदेह होता है, वो असुर जो ताकतवर है, जिसके नकाब ने किताब को बंद करा दिया, जिसकी ताकत ने महादेव के सामने ही गुलाम बना दिया.
हॉस्टल संचालक का कहना था कि 1 फरवरी को सुबह 06:30 बजे उसने जब बिटिया के कमरे का दृश्य देखा तो उसके बाद ही वाराणसी के दुर्गाकुंड पुलिस चौकी पर सुचना दी.
कुशवाहा परिवार के लाडली बिटिया की साँसे थम चूँकि थी और मर गया वो सपना जिस सपने को देख लाखों लड़कियां परिवार का और देश का नाम रोशन करने निकलती हैं. पिता के कदम बिटिया के हॉस्टल की ओर बढ़ते हैं, उन्हें बताया गया कि उनकी बिटिया गले में फंदा था जो खिड़की की ग्रिल से बंधा था, एक पैर मुड़ा हुआ बिस्तर पर था और दूसरा जमीन पर. पिता मानने को तैयार नहीं थे की ये आत्महत्या है, क्योंकि ये तस्वीर आत्महत्या के सामान्य मामलों से भिन्न था.
पिता ने दास्तां बयां करते हुए बताया कि जब वे हॉस्टल पहुंचे, तो बिटिया का शव पहले ही नीचे उतारकर बिस्तर पर रखा गया था. 31 जनवरी की रात तक बिटिया से बातचीत हुई थी और वह पूरी तरह सामान्य थी, फिर ये क्या हुआ? पुलिस वालों ने शव को देखने भी नहीं दिया. बिटिया के शव का पोस्टमार्टम जो रहा था और एक ही सवाल पिता के मन में घूम रहा था कि आखिर उसका एक पैर बेड पर और एक जमीन पर था, तो ये कैसे संभव है? तभी बिटिया के सामान को माता पिता को सौंपा गया. पिता की नज़र बिटिया के चेन और टॉप्स नकली हैं, पिता ने कहा कि असली गहनों को नकली गहनों से बदल दिया गया है.
पिता सिसकियाँ भरते हुए कहते कि हमारे ऊपर दवाब बनाया गया और वाराणसी में ही अंतिम संस्कार करने के लिए मजबूर किया गया. माता पिता को हॉस्टल संचालक पर संदेह था और मन में सवाल था कि महादेव के नगरी में क्या वाकई असुरों का दबदबा है?
बिटिया की मौत से केवल बिहार ही नहीं उत्तर प्रदेश में भी न्याय की मांग ने जोर पकड़ लिया, सोशल मीडिया पर आरोप लगाया जाने लगा, न्याय की मांग की जाने लगी, विरोध करने वाले इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं कि ये आत्महत्या है, उन्हें साजिश की बू आ रही है. इस बिच करीब नौ बाद कथित हॉस्टल संचालक के खिलाफ वाराणसी के भेलूपुर थाने में हत्या का मामला दर्ज हुआ.

लोगों का कहना है कि ये आत्महत्या नहीं हत्या है. काशी में घटी इस घटना से पड़ोसी जनपद लहुरी काशी यानि गाज़ीपुर में भी विरोध तेज हो गया. प्रबुद्धजनों, जिला व्यापार मंडल एवं कुशवाहा महासभा गाजीपुर के नेतृत्व में सिटी रेलवे स्टेशन से सरजू पांडे पार्क तक कैंडल मार्च आयोजित कर श्रद्धांजलि अर्पित किया गया।कुशवाहा महासभा के जिला महासचिव जयप्रकाश कुशवाहा ने कहा कि यह एक सुनियोजित हत्या है और दोषियों को बचाने के लिए इसे आत्महत्या का रूप दिया जा रहा है।उन्होंने कहा कि बिटिया के माता-पिता ने वाराणसी प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाया है। समाजसेवी एवं जिला महामंत्री व्यापार मंडल सुनील सिंह कुशवाहा ने कहा कि यह जघन्य अपराध है और सरकार इसको छुपाने का प्रयास कर रही है।यदि बिटिया को न्याय नहीं मिलता है तो आने वाले समय में कुशवाहा समाज भारतीय जनता पार्टी से सुदसमेत हिसाब चुकता करेगा।

बताया जा रहा है कि वाराणसी पुलिस आयुक्त मोहित अग्रवाल ने एसआईटी गठित कर चुके हैं और एडीसीपी काशी जोन सरवरण टी. की अध्यक्ता में गठित तीन सदस्यीय टीम में एसीपी भेलूपुर और क्राइम ब्रांच प्रभारी शामिल हैं.
17 वर्ष की बिटिया अपने देह को छोड़कर चली गयी या उसके आत्मा से उसके शरीर को किसी ने छीन लिया? ये तो नहीं पता, इतना जरुर है कि महादेव की काशी से 200 किलोमीटर दूर रोहतास के गलियों में रहने वाली इस माँ के चेहरे पर चिंता के साथ अद्भुद ख़ुशी का संगम अब नहीं दिखेगा…


