सबरीमाला में महिलाओं के साथ भेदभाव मामले में नौ जजों की पीठ गठित, सात अप्रैल से होगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट की 9-न्यायाधीशों की बेंच 7 अप्रैल 2026 से धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के भेदभाव और प्रवेश से जुड़े मामलों की सुनवाई शुरू करेगी। इस मामले में मुख्य रूप से केरल के सबरीमाला मंदिर (Kerala, Sabarimala Temple) से जुड़े मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि सभी पक्ष अपनी लिखित दलीलें 14 मार्च तक जमा कर दें।

सुप्रीम कोर्ट बेंच और वरिष्ठ न्यायाधीशों की नियुक्ति:
सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल होंगे। वरिष्ठ वकील परमेश्वर और शिवम सिंह को एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) के रूप में नियुक्त किया गया है, ताकि वे न्यायालय को मार्गदर्शन और दलीलों का विश्लेषण प्रदान कर सकें। इसके साथ ही, सबरीमाला फैसले की समीक्षा का समर्थन करने वाले पक्ष के लिए कृष्ण कुमार सिंह को नोडल काउंसल (Nodal Counsel) और फैसले का विरोध करने वालों के लिए शश्वती परी को नोडल काउंसल बनाया गया है।

सुनवाई की समयसीमा और प्रक्रिया:
कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सुनवाई 22 अप्रैल तक पूरी की जाएगी। इस दौरान पक्षकारों को अपनी लिखित दलीलों और प्रमाण प्रस्तुत करने का समय मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान के अनुच्छेद 25 एवं 26 के दायरे पर सात प्रमुख सवाल तैयार किए हैं, जिनमें यह स्पष्ट किया गया है कि किसी धार्मिक समूह या संप्रदाय की प्रथाओं को जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है या नहीं।

सियासी हलचल और विपक्ष की प्रतिक्रिया:
सुनवाई से पहले राजनीतिक हलचल भी तेज हो गई है। विपक्षी कांग्रेस का आरोप है कि सरकार को संवेदनशील मामले में जनता के सामने अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में जाने से पहले सरकार असमंजस की स्थिति में रही है। 2018 में पांच-न्यायाधीशों की बेंच ने महिलाओं को सबरीमाला मंदिर प्रवेश की अनुमति दी थी। अब इस फैसले की समीक्षा पर विचार किया जाएगा।

अन्य धार्मिक स्थलों से जुड़े मामले:
सुप्रीम कोर्ट ने केवल सबरीमाला ही नहीं, बल्कि मस्जिदों और दरगाहों में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश तथा पारसी अगियारी (Parsi, Agiary) में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मुद्दों को भी बड़े बेंच के समक्ष भेजा है। यह सुनवाई पूरे देश में धार्मिक स्वतंत्रता और महिला अधिकारों के मामले में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

सर्वोच्च न्यायालय का महत्व:
सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई धर्म, समाज और महिला अधिकारों के बीच संतुलन बनाने में निर्णायक भूमिका निभाएगी। न्यायालय का उद्देश्य सुनिश्चित करना है कि धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर महिलाओं के अधिकारों का हनन न हो और संविधान की मूल भावना का पालन किया जाए।

निष्कर्ष:
सबरीमाला और अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश पर फैसला न केवल धार्मिक समूहों के लिए, बल्कि पूरे देश के महिला अधिकारों और संवैधानिक स्वतंत्रता के लिए ऐतिहासिक महत्व रखता है।



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