गाजीपुर: 330 रुपये कुंतल आलू! किसान की लागत भी नहीं, बाजार में किसका मुनाफा?
मोहम्मदाबाद/गाजीपुर में आलू की गिरती कीमत ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। क्षेत्र के कोल्ड स्टोरों में किसानों की बड़ी मात्रा में आलू भंडारित है और किसानों के अनुसार कई जगह थोक बाजार में आलू का भाव घटकर करीब 330 रुपये प्रति कुंतल तक पहुंच गया है। ऐसे में किसानों के लिए अपनी उत्पादन लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है। खेत तैयार करने से लेकर फसल को बाजार तक पहुंचाने तक लगातार बढ़ते खर्च के बीच कम कीमत ने किसानों की परेशानी बढ़ा दी है।

खेती की शुरुआत से ही बढ़ता खर्च:
आलू की खेती में किसान को फसल तैयार होने से पहले ही कई तरह के खर्च उठाने पड़ते हैं। खेत की तैयारी के लिए ढैचा की बुवाई, जुताई, पलेवा और रोटावेटर का इस्तेमाल किया जाता है। इसके साथ ही डीएपी, यूरिया, पोटाश, कैल्शियम, सल्फर और जिंक जैसे पोषक तत्वों पर भी खर्च होता है। इसके बाद बीज खरीदने, चिराई, उपचार, बोरियों में भराई और मशीन से बुवाई की प्रक्रिया में भी किसान की लागत बढ़ती जाती है।
फसल तैयार होने तक कई चरणों में खर्च:
आलू की बुवाई के बाद भी किसान का खर्च खत्म नहीं होता। खेत में नालियां बनाना, खरपतवार पर नियंत्रण करना और फसल की जरूरत के अनुसार तीन से चार बार सिंचाई करना पड़ता है। इसके अलावा फसल को रोग और कीटों से बचाने के लिए अलग-अलग चरणों में दवाओं का छिड़काव किया जाता है। इस तरह आलू तैयार होने तक किसान लगातार निवेश करता रहता है।
खुदाई से भंडारण तक किसान पर खर्च:
फसल तैयार होने के बाद मशीन से आलू की खुदाई, मजदूरों से आलू बिनवाने, बोरी खरीदने और उनकी सिलाई का खर्च भी किसान को उठाना पड़ता है। इसके बाद ट्रैक्टर से आलू को कोल्ड स्टोर तक पहुंचाने और वहां उतराई के साथ भंडारण का किराया भी देना पड़ता है। उत्पादन से लेकर भंडारण तक बढ़ती लागत के बीच जब बाजार में भाव कम मिलता है तो किसान के सामने आर्थिक नुकसान का संकट खड़ा हो जाता है।
कम भाव के कारण कोल्ड स्टोर का सहारा:
किसानों के अनुसार कम कीमत मिलने पर तत्काल आलू बेचने के बजाय उसे कोल्ड स्टोर में रखना मजबूरी बन जाता है। किसानों को उम्मीद रहती है कि आगे चलकर बाजार भाव में सुधार होगा और उन्हें अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकेगा। लेकिन लंबे समय तक भंडारण के बाद भी यदि आलू का भाव करीब 330 रुपये प्रति कुंतल बना रहता है तो किसान के लिए स्थिति और मुश्किल हो जाती है।
खेत और बाजार की कीमतों में अंतर पर सवाल:
आलू उत्पादक किसानों का कहना है कि खेत या कोल्ड स्टोर से निकलने वाले आलू और अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने वाले आलू की कीमत में काफी अंतर रहता है। किसानों का आरोप है कि इस अंतर का लाभ उत्पादन करने वाले किसान की तुलना में व्यापारिक श्रृंखला के बीच के लोगों को अधिक मिलता है। हालांकि परिवहन, छंटाई, भंडारण, पैकिंग और अन्य खर्च भी बाजार कीमत को प्रभावित करते हैं, लेकिन किसानों की शिकायत है कि उन्हें अंतिम बाजार मूल्य की पर्याप्त जानकारी नहीं मिलती और मूल्य निर्धारण में उनकी भूमिका सीमित रहती है।
पूरी मूल्य-श्रृंखला पर निगरानी की मांग:
किसानों की मांग है कि आलू के लिए केवल उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देने के बजाय उत्पादन से बिक्री तक पूरी मूल्य-श्रृंखला पर निगरानी हो। किसानों का कहना है कि उत्पादन लागत का वास्तविक आकलन कर लाभकारी मूल्य की व्यवस्था की जानी चाहिए। इसके साथ ही कोल्ड स्टोर से मंडी और मंडी से बाजार तक आलू के भाव की पारदर्शी जानकारी किसानों को उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
सीधे खरीदारों से जोड़ने की मांग:
किसानों ने यह भी मांग की है कि उन्हें सीधे थोक खरीदारों, मंडियों और खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों से जोड़ने की व्यवस्था विकसित की जाए। कोल्ड स्टोर में भंडारित आलू की बिक्री के लिए किसानों को बाजार से जुड़ी सही जानकारी उपलब्ध कराने के साथ ही आलू की ग्रेडिंग, पैकिंग और प्रसंस्करण को बढ़ावा देने की मांग भी उठाई गई है, ताकि किसान केवल कच्चा आलू बेचने तक सीमित न रहें।
330 रुपये का भाव किसानों के लिए चिंता:
किसानों के अनुसार 330 रुपये प्रति कुंतल का भाव सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उनकी लागत और आमदनी के बीच बढ़ते अंतर को दिखाता है। यदि खेती की लागत बढ़ती रही और उपज का मूल्य उसके अनुरूप नहीं मिला तो किसानों के लिए आलू की खेती करना मुश्किल हो सकता है। किसानों का कहना है कि बाजार व्यवस्था में उनकी लागत, जोखिम और मेहनत का उचित मूल्य मिलना जरूरी है।
मूल्य निर्धारण में किसान की भूमिका पर सवाल:
किसानों का सवाल है कि जब खेत में उत्पादन की लागत और जोखिम किसान उठाता है, कोल्ड स्टोर में भंडारण का खर्च भी वही देता है और बाजार तक उपज पहुंचाने की जिम्मेदारी भी उसी की होती है, तो उसकी उपज की कीमत तय करने में उसकी हिस्सेदारी इतनी सीमित क्यों है। किसानों का कहना है कि उन्हें बाजार का केवल दर्शक नहीं, बल्कि मूल्य-श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
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रिपोर्टर: जफ़र इकबाल