इस्राइल (Israel), अमेरिका (America) और ईरान (Iran) के बीच जारी तनाव के बीच वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं सामने आ रही हैं। इसी बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने 2 अप्रैल को कहा कि ईरान में अपने लक्ष्य पूरे करने के बाद ही अमेरिकी सेना इस संघर्ष से बाहर निकलेगी और इसमें दो से तीन हफ्ते का समय लग सकता है। इस घटनाक्रम के चलते खाड़ी देशों ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर विचार तेज कर दिया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों बना चिंता का कारण:
खाड़ी देशों की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होकर गुजरता है। मौजूदा संघर्ष के कारण यह मार्ग बेहद संवेदनशील हो गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही पर नियंत्रण बढ़ा दिया है और कुछ मामलों में पूर्व अनुमति की आवश्यकता बताई जा रही है। इससे तेल और गैस के परिवहन पर असर पड़ा है और निर्यातकों के सामने अनिश्चितता की स्थिति बनी है।
वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर असर:
सामान्य परिस्थितियों में दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस आपूर्ति इसी मार्ग से होती है। मौजूदा हालात में यहां व्यवधान आने से वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो रही है। इसके चलते कच्चे तेल की कीमतों, शिपिंग लागत और बीमा खर्च में वृद्धि देखी जा रही है, जिसका असर कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
एकल मार्ग पर निर्भरता कम करने की कोशिश:
खाड़ी देशों को यह महसूस हो रहा है कि एक ही समुद्री मार्ग पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। इसी कारण अब पाइपलाइन, रेलवे और सड़क नेटवर्क के माध्यम से वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि भविष्य में आपूर्ति बाधित न हो और निर्यात सुचारू रूप से चलता रहे।
सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर जोर:
सऊदी अरब (Saudi Arabia) की 1200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन, जो यानबू (Yanbu) बंदरगाह तक जाती है, होर्मुज मार्ग को पूरी तरह बायपास करती है। इस पाइपलाइन की क्षमता बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है ताकि इसके जरिए अधिक मात्रा में तेल का निर्यात किया जा सके। सऊदी अरामको (Saudi Aramco) के सीईओ अमीन नासर (Amin Nasser) ने भी इसे एक महत्वपूर्ण रणनीति बताया है, जो संकट के समय उपयोगी साबित हो रही है।
आईएमईसी कॉरिडोर पर बढ़ा ध्यान:
भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (India-Middle East-Europe Economic Corridor – IMEC) भी एक प्रमुख विकल्प के रूप में उभर रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य पाइपलाइन, रेलवे और सड़क नेटवर्क के माध्यम से अरब प्रायद्वीप को भूमध्य सागर से जोड़ना है। इसमें इस्राइल (Israel) के हाइफा (Haifa) बंदरगाह और मिस्र (Egypt) के बंदरगाहों को शामिल किया जा सकता है।
क्षेत्रीय सहयोग की जरूरत:
ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्रीय देशों को मिलकर काम करना होगा, ताकि आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित और स्थिर बनाया जा सके। इस दिशा में पाइपलाइन और परिवहन नेटवर्क का विस्तार एक दीर्घकालिक समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
भारत की भूमिका और संभावनाएं:
इस पूरी प्रक्रिया में भारत (India) की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, खासकर आईएमईसी कॉरिडोर के माध्यम से। यदि यह योजना आगे बढ़ती है, तो भारत को ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक कनेक्टिविटी के क्षेत्र में लाभ मिल सकता है।
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