Video: यूपी के जूता उद्योग पर संकट, समुद्र में फंसा करोड़ों का माल…
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब ताजमहल के शहर आगरा (Agra) तक साफ दिखाई देने लगा है। समंदर में फंसे जूतों के करोड़ों रुपये के माल ने यहां के कारोबारियों और मजदूरों की चिंता को काफी बढ़ा दिया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि दूर हो रहे अंतरराष्ट्रीय विवाद की आंच अब स्थानीय उद्योगों को भी झुलसाने लगी है।
बढ़ते तनाव का सीधा असर जूता उद्योग पर:
अमेरिका (America), इजरायल (Israel) और ईरान (Iran) के बीच जारी तनाव ने आगरा (Agra) के जूता उद्योग की स्थिति को बेहद कमजोर कर दिया है। इस समय करीब 24 मिलियन डॉलर, यानी लगभग 200 करोड़ रुपये का जूता समुद्र में फंसा हुआ है, जिससे व्यापारियों को भारी नुकसान की आशंका सता रही है। निर्यात पर निर्भर इस उद्योग के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण बन चुकी है।
निर्यात कारोबार लगभग ठप:
आगरा (Agra) से हर साल मिडिल ईस्ट (Middle East) के देशों में करीब 1,125 करोड़ रुपये का जूता निर्यात किया जाता है। लेकिन वर्तमान हालात के चलते यह कारोबार लगभग पूरी तरह से ठप पड़ गया है। व्यापारियों का कहना है कि शिपमेंट में रुकावट के कारण तैयार माल समय पर नहीं पहुंच पा रहा है, जिससे ऑर्डर रद्द होने का खतरा भी बढ़ गया है।
कच्चे माल की कीमतों में लगातार वृद्धि:
समस्या केवल माल के फंसने तक सीमित नहीं है, बल्कि कच्चे माल की कीमतों में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। उद्योग से जुड़े लोगों के अनुसार सोल, हील, पैकिंग और केमिकल जैसी आवश्यक चीजों की कीमतें हर तीसरे दिन बढ़ रही हैं। इसका सीधा असर उत्पादन लागत पर पड़ रहा है, जिससे उद्योग की आर्थिक स्थिति और बिगड़ती जा रही है।
पेट्रोकेमिकल्स पर निर्भरता बनी बड़ी चुनौती:
जूता उद्योग का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा पेट्रोकेमिकल्स पर आधारित है। इसी कारण लागत में 40 से 50 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी जा रही है। उत्पादन महंगा होने के कारण छोटे और मध्यम कारोबारियों पर सबसे ज्यादा दबाव बना हुआ है, जिससे उद्योग में अस्थिरता बढ़ती जा रही है।
गैस आधारित यूनिट्स पर ताला:
हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि गैस आधारित 30 प्रतिशत से अधिक यूनिट्स बंद हो चुकी हैं। इससे उत्पादन क्षमता पर सीधा असर पड़ा है और बड़ी संख्या में कामगारों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है।
5 लाख लोगों की रोजी-रोटी पर खतरा:
आगरा (Agra) का जूता उद्योग केवल व्यापार नहीं, बल्कि लगभग 5 लाख लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन है। कोविड, टैरिफ, यूक्रेन (Ukraine) युद्ध और अब मिडिल ईस्ट संकट—इन लगातार झटकों ने इस उद्योग को चारों ओर से घेर लिया है। ऐसे में मजदूरों और छोटे व्यापारियों की चिंता लगातार बढ़ रही है।
सरकार से राहत की मांग तेज:
मौजूदा हालात को देखते हुए उद्योग से जुड़े कारोबारी सरकार से राहत पैकेज की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो यह उद्योग गहरे संकट में चला जाएगा और इसका असर हजारों परिवारों पर पड़ेगा।
कारोबारियों की प्रतिक्रिया:
कारोबारी राजेश सहगल (Rajesh Sehgal), गोपाल गुप्ता (Gopal Gupta) और माला खेड़ा (Mala Kheda) का कहना है कि मौजूदा स्थिति “आगे कुआं, पीछे खाई” जैसी हो गई है। एक तरफ माल फंसा हुआ है, तो दूसरी ओर उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में उद्योग को बचाए रखना बेहद कठिन होता जा रहा है।
भविष्य को लेकर बढ़ी चिंता:
यदि मिडिल ईस्ट (Middle East) का संकट लंबा खिंचता है, तो इसका असर केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका भी प्रभावित होगी। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि हालात कब सामान्य होंगे और सरकार कब तक इस संकट से राहत दिलाने के लिए कदम उठाएगी।
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