सौरव दास-आशुतोष रांका ने हाईकोर्ट से याचिका वापस ली:हिरासत बढ़ाने के खिलाफ लगाई थी; कोर्ट बोला- दोनों ने बॉन्ड की शर्तें तोड़ीं
कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका ने न्यायिक हिरासत बढ़ाए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में दायर अपनी याचिका वापस ले ली है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि दोनों याचिकाकर्ताओं ने पहले शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड दिया था, लेकिन बाद में बैरिकेड पार करने और निर्धारित शर्तों का उल्लंघन करने का आरोप सामने आया। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने के लिए पुनरीक्षण याचिका का विकल्प उपलब्ध है, तो सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का रुख क्यों किया गया। इसके बाद दोनों नेताओं ने अपनी याचिकाएं वापस ले लीं।
प्रदर्शन से पहले हिरासत, फिर दोबारा गिरफ्तारी:
दी गई जानकारी के मुताबिक, 10 अक्टूबर को प्रदर्शन से पहले सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिया गया था। बाद में उन्हें शांति भंग नहीं करने की शर्त पर जमानत दी गई। इसके बाद 12 अक्टूबर को सरकार ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया।
आरोप है कि इसके बावजूद 13 अक्टूबर को दोनों नेता तिरंगा लेकर जंतर-मंतर पहुंचे। वहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 14 अक्टूबर को मजिस्ट्रेट अदालत ने दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया। 19 अक्टूबर को उनकी हिरासत की अवधि समाप्त होने के बाद कस्टडी दो दिन के लिए बढ़ा दी गई। इसी आदेश को चुनौती देते हुए दोनों नेताओं ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
हाईकोर्ट ने वैकल्पिक कानूनी रास्ते पर उठाया सवाल:
सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि जब मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने के लिए पुनरीक्षण याचिका दायर करने का कानूनी विकल्प मौजूद है, तो सीधे अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट क्यों आया गया। अदालत ने कहा कि यदि किसी आदेश को चुनौती देने के लिए कानून में एक विशेष प्रक्रिया निर्धारित है, तो सामान्य तौर पर पहले उसी रास्ते का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
इसके बाद अदालत ने याचिकाकर्ताओं को मौजूदा याचिका वापस लेकर पुनरीक्षण याचिका दायर करने का विकल्प अपनाने को कहा। सौरव दास और आशुतोष रांका ने अपनी याचिकाएं वापस ले लीं।
बॉन्ड और बैरिकेड के मुद्दे पर अदालत की टिप्पणी:
सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों नेताओं की ओर से पहले दिए गए शांति बनाए रखने के बॉन्ड का उल्लेख किया। अदालत ने सवाल किया कि यदि बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन हुआ है, तो संबंधित अधिकारियों की ओर से नियमों के तहत कार्रवाई किए जाने को गलत कैसे कहा जा सकता है।
बैरिकेड पार करने के मामले पर भी अदालत ने टिप्पणी की। उसने कहा कि जब प्रदर्शनकारी बैरिकेड पार करते हैं, तो उनके साथ दूसरे लोग भी आगे बढ़ सकते हैं। समूह में शामिल कुछ लोगों की गतिविधियां प्रदर्शनकारियों के नियंत्रण से बाहर हो सकती हैं, जिससे कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका पैदा हो सकती है।
प्रदर्शन की अनुमति और जंतर-मंतर जाने पर सवाल:
अदालत ने यह भी कहा कि यदि प्रदर्शन को शांतिपूर्ण रखना उद्देश्य था, तो पुलिस से अनुमति लेने का विकल्प अपनाया जा सकता था। इससे ऐसे लोगों को समूह में शामिल होने से रोकने में मदद मिल सकती थी, जो प्रदर्शन के माहौल को बिगाड़ सकते हैं।
जंतर-मंतर जाने के फैसले पर अदालत ने सवाल किया कि जब इस स्थान को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाया गया था, तो दोनों नेता वहां क्यों पहुंचे। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि संबंधित अधिसूचना पर रोक नहीं लगी थी और उससे जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। अदालत की टिप्पणियों में बैरिकेड पार करने और शांति भंग होने की आशंका को भी शामिल किया गया।
याचिकाकर्ताओं की उम्र और संगठन के उद्देश्य पर चर्चा:
सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों नेताओं की उम्र पूछी। उनके वकील ने बताया कि एक की उम्र 27 वर्ष और दूसरे की 31 वर्ष है। इस पर अदालत ने टिप्पणी की, “ये जेन-जी नहीं हैं।” अदालत ने यह भी पूछा कि दोनों नेता क्या करते हैं और जिस संगठन से जुड़े हैं, उसका उद्देश्य क्या है।
यह सुनवाई न्यायमूर्ति सुब्रमोनियम प्रसाद की अदालत में हुई। सौरव दास और आशुतोष रांका की ओर से अधिवक्ता अभिक चिमनी ने दलीलें रखीं। वहीं, दिल्ली पुलिस की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा और केंद्रीय सरकार के स्थायी अधिवक्ता आशीष दीक्षित पेश हुए।
दोनों मामले अपराध शाखा को सौंपे गए:
दी गई जानकारी के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने सौरव दास और आशुतोष रांका से जुड़े जंतर-मंतर मामले को भी अपराध शाखा को स्थानांतरित कर दिया है। इससे पहले कनॉट प्लेस में दर्ज मामला अपराध शाखा को सौंपा गया था। अब दोनों मामलों की जांच अपराध शाखा करेगी।
कॉकरोच जनता पार्टी ने पहले भी किया था प्रदर्शन:
कॉकरोच जनता पार्टी ने 20 जून से 25 जुलाई तक नीट प्रश्नपत्र लीक मामले में तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था। दी गई जानकारी के अनुसार, यह प्रदर्शन 36 दिनों तक चला था। इस दौरान सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी भूख हड़ताल पर बैठे थे।
20 जुलाई को पार्टी ने संसद तक मार्च भी निकाला था। 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रदर्शन समाप्त कर दिया गया था।
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