कैसे लागू होगी जाति जनगणना? Caste Census Strategy Explained…

केंद्र सरकार ने ऐलान कर दिया है कि अगली जनगणना में जाति के आधार पर गिनती भी होगी। ये फैसला चौंकाने वाला है, क्योंकि विपक्ष की मांग के बावजूद अब तक ‌BJP इसे टाल रही थी। इस घोषणा के बाद राहुल गांधी बोले- कहा था ना, मोदी जी को ‘जाति जनगणना’ करवानी ही पड़ेगी। अब हम आरक्षण पर 50% की सीमा हटाने का दबाव बनाएंगे।

बड़ा सवाल है कि कैसे और कब तक होगी जातिगत जनगणना, मोदी सरकार इसके लिए क्यों तैयार हुई और क्या अब आरक्षण की 50% लिमिट को भी बढ़ाया जाएगा……

30 अप्रैल 2025 को राजनीतिक विषयों की कैबिनेट कमेटी ने जातिगत जनगणना कराने का फैसला लिया। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मीडिया को बताया कि जातियों की गणना अब आने वाली मूल जनगणना में ही शामिल होगी। राजनीतिक मामलों की कैबिनेट कमेटी के अध्यक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। इसके अलावा इस कमेटी में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह, सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल भी इसमें शामिल हैं।

अश्विनी वैष्णव ने कहा,

1947 से जाति जनगणना नहीं की गई। कांग्रेस की सरकारों ने हमेशा जाति जनगणना का विरोध किया। 2010 में PM मनमोहन सिंह ने कहा था कि जाति जनगणना के मामले पर कैबिनेट में विचार किया जाना चाहिए। इसके लिए मंत्रियों का एक समूह बनाया गया था। ज्यादातर राजनीतिक दलों ने जाति जनगणना की सिफारिश की। इसके बावजूद भी कांग्रेस ने महज खानापूर्ति का ही काम किया। उसने सिर्फ सर्वे कराना ही उचित समझा।

सवाल है कि अब जाति जनगणना कब तक पूरी होगी?

बताया जा रहा है कि देश में पिछली जनगणना 2011 में हुई थी। इसे हर 10 साल में किया जाता है। इस हिसाब से 2021 में अगली जनगणना होनी थी, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण इसे टाल दिया गया था। बिहार में अक्टूबर-नवंबर में चुनाव हैं, इसलिए कयास लगाए जा रहे हैं कि सरकार सिंतबर में ही जनगणना की शुरुआत कर सकती है। इसे पूरा होने में कम से कम 1 साल लगेगा, इसलिए जातिगत जनगणना के अंतिम आंकड़े 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत तक आ सकते हैं।

लेकिन सवाल है कि ये जनगणना होगी कैसे?

जनगणना का रिकॉर्ड बताता है कि हर बार पूछे जाने वाले सवालों की संख्या बढ़ जाती है। मसलन, 2001 की तुलना में 2011 की जनगणना में कई एक्स्ट्रा सवाल पूछे गए। जैसे- जहां आप नौकरी करते हैं वो जगह आपके घर से कितनी दूर है। गांव का नाम भी पहली बार पूछा गया था। आखिर में इस डेटा को इकठ्ठा करके इसे नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर में दर्ज किया जाता है। जनगणना अधिनियम 1948 के तहत जनगणना का विस्तृत डेटा गोपनीय रखा जाता है।

2011 तक जनगणना फॉर्म में कुल 29 कॉलम होते थे। इनमें नाम, पता, व्यवसाय, शिक्षा, रोजगार और माइग्रेशन जैसे सवालों के साथ केवल SC और ST कैटेगरी से ताल्लुक रखने को रिकॉर्ड किया जाता था। अब जाति जनगणना के लिए इसमें एक्स्ट्रा कॉलम जोड़े जा सकते हैं।

भारत की जनगणना 2021 का फॉर्म, जिसमें विभिन्न प्रश्नों के लिए कॉलम और खामियां भरी गई हैं।

क्या जातियों केवल हिन्दुओं में होती हैं तो जवाब है नहीं, जातियां तो मुसलमानों में भी होती हैं

जी हाँ एक्सपर्ट का कहना है कि मुसलमानों में भी कई पिछड़ी जातियां हैं। उनकी भी गिनती की जाएगी। मुख्य समस्या जनगणना के बाद शुरू होगी, जब इसे लेकर योजनाएं और रिजर्वेशन लागू करने की मांग होगी। मुसलमानों के अलावा महिलाओं या किसी भी अन्य जाति वर्ग को लेकर भी नए सिरे से एक बहस छिड़ेगी।

नेहरू, पटेल और आंबेडकर जैसे नेता जातिगत जनगणना के पक्ष में नहीं थे

एक सवाल आपके मन में होगा कि क्या इससे पहले भी जातिगत जनगणना हुई? अगर हुई तो क्या हुआ? मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार आज़ाद भारत में पहले कभी जातिगत जनगणना नहीं हुई क्योंकि आजाद भारत की पहली कैबिनेट में शामिल नेहरू, पटेल और आंबेडकर जैसे नेताओं ने तय किया कि जातिगत जनगणना नहीं करवाई जाएगी, क्योंकि इससे समाज में बंटवारा होगा। आजादी के बाद 1951 में पहली जनगणना हुई, इसमें सभी जातियों के बजाय सिर्फ अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) की गिनती हुई। यानी SC और ST का डेटा दिया गया लेकिन OBC और दूसरी जातियों का डेटा नहीं दिया गया। तब से ऐसा ही चला आ रहा है। हर दस साल में होने वाली जनगणना में SC और ST के अलावा दूसरी किसी भी जाति का डेटा नहीं दिया जाता है।

आज़ादी से पहले साल 1881 में अंग्रेजों ने पहली बार जनगणना करवाई थी। इसमें जातियों की भी गिनती होती थी। 1931 तक ऐसा ही चलता रहा। तब पूर्ण जातिगत जनगणना हुई थी। 1941 में जातिगत जनगणना तो हुई, लेकिन इसके आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए।

सिर्फ SC/ST की जातिगत जनगणना क्यों होती है?

अब आप कहेंगें कि केवल सिर्फ SC/ST की जातिगत जनगणना क्यों होती है? अन्य जातियों की क्यों नहीं होती तो इसको समझ लीजिये और इतिहास पन्नों में झाकिये, वीर योध्याओं से लेकर मुग़ल और मुग़ल से लेकर अंग्रेजों तक के समय को समझना होगा, खैर आज़ादी के बाद 1951 से 2011 तक हर 10 साल पर जनगणना होती रही है। इसके पीछे संवैधानिक कारण हैं। दरअसल, संविधान की धारा 330 और 332 में यह प्रावधान है कि SC और ST समुदायों की जनसंख्या के आधार पर उनके लिए लोकसभा और राज्यसभा में सीटें रिजर्व की जाएं। बिना सही जनसंख्या का पता लगाए उस अनुपात में सीटें रिजर्व करना संभव नहीं है, इसीलिए हर 10 साल में होने वाली जनगणना के साथ ही SC और ST के आंकड़े भी जारी किए जाते हैं। 2021 में जनगणना हुई नहीं है, इसलिए अभी SC और ST सीटों का रिजर्वेशन 2011 की जनगणना के आधार पर ही किया जाता है।

समय-समय पर पिछड़ी जातियों के रिजर्वेशन के लिए सभी जातियों की जनगणना की भी मांग की जाती रही है, लेकिन इसके लिए संविधान में कोई प्रावधान नहीं है। हालांकि, इस साल बिहार और कर्नाटक जैसे राज्यों में जातिगत सर्वे कराए गए हैं। 2023 में बिहार सरकार ने इसके आंकड़े भी जारी किए थे।

वैसे 2011 में मनमोहन सरकार ने सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना यानी SECC कराने का फैसला किया। इसके लिए 4 हजार 389 करोड़ रुपए का बजट पास हुआ। 2013 में ये जनगणना पूरी हुई, 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी लेकिन इसमें जातियों का डेटा आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसके बाद 2016 में मोदी सरकार ने जातियों को छोड़ बाकी सारा डेटा सार्वजनिक किया था। तब सरकार का कहना था कि 2011 में जो सामाजिक-आर्थिक जातिगत जनगणना हुई थी, उसमें कई खामियां थीं।

अब सवाल है कि जातिगत जनगणना के ऐलान का राजनीतिक मकसद क्या है?

कांग्रेस समेत BJD, सपा, RJD, बसपा, NCP शरद पवार देश में जातिगत जनगणना की मांग कर रही हैं। TMC का रुख साफ नहीं है। विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी लगातार जाति जनगणना की मांग करते रहे हैं।

NDA: भाजपा पहले जाति जनगणना के पक्ष में नहीं थी। NDA ने कांग्रेस समेत दूसरी विपक्षी पार्टियों पर आरोप लगाए थे कि ये जातिगत जनगणना के जरिए देश को बांटने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि, बिहार में भाजपा ने ही जातिगत जनगणना का सपोर्ट किया था।

2024 के लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में वादा किया था कि सत्ता में आने पर जातियों की सामाजिक और आर्थिक स्थितियों को समझने के लिए देश भर में जाति जनगणना करवाएगी।’ राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार के दौरान भी जातिगत जनगणना करवाने का वादा किया था।

हालांकि, एक्सपर्ट्स कहते हैं कि BJP ने एक झटके में कांग्रेस से उसका एक बड़ा मुद्दा छीन लिया है।

1. कांग्रेस के मुद्दे को खत्म करना: विपक्ष ने सरकार को वो मुद्दा दिया, जिसको उसने पूरा कर दिया, ऐसे में इसका पूरा क्रेडिट सरकार को जाएगा।

2. अपना पिछड़ा वर्ग का वोट शेयर बढ़ाना: 2024 के लोकसभा चुनाव में खास तौर पर UP और बिहार में BJP का गैर यादव OBC वोट शेयर कम हुआ है। इसे वापस हासिल करने के लिए यह फैसला लिया गया।

3. बिहार चुनाव में नए मुद्दे की तलाश: इस फैसले से BJP को बिहार चुनाव में पिछड़े वर्ग के वोटर्स को टारगेट करने में आसानी होगी।

एक बात को समझना होगा कि जनगणना से केवल जाति ही नहीं, आर्थिक स्थिति और रोजगार की स्थिति भी पता चलेगी, क्योंकि जनगणना के फॉर्म में इन सब की जानकारी भी ली जाएगी और पहले भी ली गयी है…

राजनीति दलों को क्या फायदा होगा? ये तो आने वाला वक़्त बताएगा…

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