रिपोर्टर: अमित कुमार
बलिया (Ballia) जनपद से एक ऐसी सामाजिक पीड़ा सामने आई है, जो आज भी लोगों की पहचान और सम्मान से जुड़ी हुई है। यहां का एक गांव, जिसका नाम “रूपवार तवायफ” है, अपने नाम के कारण दशकों से सामाजिक तिरस्कार, शर्मिंदगी और मानसिक पीड़ा झेल रहा है। गांव के लोगों का कहना है कि यह नाम अंग्रेजी हुकूमत की देन है, जिसका दंश आज भी महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों को समान रूप से सहना पड़ रहा है। गांव की महिलाएं सामाजिक नजरों में संदेह और गलत दृष्टि का सामना करती हैं, जबकि युवा पीढ़ी इस पहचान से बचने के लिए पलायन तक कर रही है।
अंग्रेजी दौर की कहानी, आज का कलंक:
ग्रामीणों के अनुसार बलिया (Ballia) मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर पंदह ब्लॉक में स्थित यह गांव लगभग 800 मतदाताओं वाला है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि अंग्रेजों के शासनकाल में इस क्षेत्र को अय्याशी का अड्डा बनाया गया था। उस समय करीब 400 तवायफों को जमीन देकर यहां बसाया गया और शाम होते ही अंग्रेज अफसरों का जमावड़ा लगता था। समय बदला, अंग्रेज चले गए, लेकिन उनके द्वारा दिया गया यह नाम और उससे जुड़ा कलंक गांव के लोगों के जीवन में स्थायी रूप से चिपक गया।
महिलाओं को झेलनी पड़ती सामाजिक अग्निपरीक्षा:
गांव की महिलाओं के लिए यह नाम सबसे बड़ी पीड़ा बन गया है। ग्रामीणों का कहना है कि जब महिलाएं शहरों में नौकरी के लिए जाती हैं और पहचान पत्र में गांव का नाम “तवायफ” दिखता है, तो लोग उन्हें संदेह और बुरी नजर से देखते हैं। कई बार उन्हें कमरे तक लेने में परेशानी होती है। इस स्थिति को ग्रामीण सीता माता की अग्निपरीक्षा से जोड़कर देखते हैं, जहां महिलाओं को बार-बार अपनी पवित्रता और चरित्र साबित करने की सामाजिक परीक्षा से गुजरना पड़ता है।
युवा पीढ़ी का पलायन और पहचान छुपाने की मजबूरी:
गांव के युवाओं का कहना है कि आधुनिक समय में भी यह नाम उनके भविष्य में बाधा बन रहा है। पढ़ाई या नौकरी के लिए बाहर जाने पर वे अपने गांव का नाम बताने से कतराते हैं। कई युवा शहरों में रहकर अपना पता शहर का ही बताने लगे हैं, ताकि इस कलंकित पहचान से बचा जा सके। इससे गांव में सामाजिक और आर्थिक विकास भी प्रभावित हो रहा है।
बुजुर्गों की पीड़ा और बेबसी:
गांव के बुजुर्ग पंचदेव यादव बताते हैं कि अपने ही गांव का नाम बताने में शर्म महसूस होती है। उनका कहना है कि लोग आज भी गांव का नाम सुनकर हंसते हैं और मजाक उड़ाते हैं। वोटर आईडी से लेकर अन्य सरकारी दस्तावेजों तक हर जगह “रूपवार तवायफ” दर्ज है, जिसे देखकर अपमान का अनुभव होता है। बुजुर्गों का दर्द यह है कि कई शहरों और जिलों के नाम सरकारें अध्यादेश लाकर बदल देती हैं, लेकिन उनके गांव की मांग वर्षों से अनसुनी है।
सरकार से नाम बदलने की गुहार:
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने मुख्यमंत्री (Chief Minister), राज्यपाल (Governor), प्रधानमंत्री (Prime Minister) और राष्ट्रपति (President) तक को पत्र लिखकर गांव का नाम बदलने की मांग की है। उनका आग्रह है कि गांव का नाम बदला जाए ताकि समाज में उन्हें सम्मान की नजर से देखा जा सके और आने वाली पीढ़ियों को यह मानसिक बोझ न ढोना पड़े।
ग्रामीणों की एकजुट आवाज:
ग्रामीण सुरेश वर्मा का कहना है कि गांव का नाम ही लोगों के मजाक का कारण बन गया है। रिश्ता तय करने से पहले लोग गांव का नाम सुनकर संदेह करते हैं कि कहीं पुरानी छवि का प्रभाव अब भी तो नहीं है। इससे सामाजिक रिश्ते तक प्रभावित हो रहे हैं। ग्रामीण चाहते हैं कि सरकार इस पीड़ा को समझे और नाम बदलकर गांववासियों का सम्मान लौटाए।
देवपुर नाम की प्रस्तावित मांग:
गांव के पूर्व प्रधान राजदेव चौधरी बताते हैं कि गांव का नाम बताने पर उन्हें और गांव के अन्य लोगों को गहरी शर्मिंदगी होती है। उनका कहना है कि गांव के लोग चाहते हैं कि इसका नाम “देवपुर” रखा जाए, ताकि यह नाम सम्मान और सकारात्मक पहचान से जुड़ सके। उनका मानना है कि नाम बदलने से सबसे अधिक राहत महिलाओं को मिलेगी, जिन्हें आज सबसे ज्यादा सामाजिक दबाव झेलना पड़ता है।
लंबे समय से जारी प्रयास:
गांव के वर्तमान प्रधान के अनुसार वह पिछले दस वर्षों से अधिक समय से इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं। ग्रामीणों ने तत्कालीन मंत्री रामगोविंद चौधरी से भी मुलाकात की थी, लेकिन आश्वासन के अलावा कोई ठोस परिणाम नहीं निकला। गांववासियों का कहना है कि वे आज भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि एक दिन उनकी इस पीड़ा को समझा जाएगा।
सम्मान की तलाश में गांव की लड़ाई:
रूपवार तवायफ गांव के लोग किसी विशेष सुविधा की नहीं, बल्कि केवल सम्मानजनक पहचान की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि नाम बदलने से इतिहास नहीं बदलेगा, लेकिन वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को एक नई और सकारात्मक पहचान जरूर मिलेगी। गांव की यह लड़ाई सम्मान, आत्मसम्मान और सामाजिक समानता से जुड़ी है।
Disclaimer:
यह खबर स्थानीय संवादाता/मीडिया प्लेटफार्म खेलो इंडिया नॉर्थ जोन किकबॉक्सिंग चैंपियनशिप में शाह फैज पब्लिक स्कूल गाज़ीपुर की दो बेटियों ने पंचम लहरायाया अन्य द्वारा प्राप्त की गई सूचना पर आधारित है। यदि कोई आपत्ति है या खबर से संबंधित कोई सूचना देने या अपना पक्ष रखने के लिए हमें ईमेल करें: apnabharattimes@gmail.com।
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