भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में उस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया है, जिसका उद्देश्य विश्व के मानचित्र में महाद्वीपों और विभिन्न भू-भागों के आकार को अधिक सही और संतुलित तरीके से दर्शाना है। 193 सदस्यीय महासभा ने शुक्रवार को टोगो की ओर से पेश किए गए ‘करैक्ट द मैप’ प्रस्ताव को भारी बहुमत से मंजूरी दी। प्रस्ताव के समर्थन में 164 देशों ने मतदान किया, जबकि छह देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। वहीं, अमेरिका ने अकेले प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया।
प्रस्ताव पर भारत ने जताया समर्थन:
भारत ने ‘करैक्ट द मैप’ प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करते हुए स्पष्ट किया कि उसका समर्थन किसी एक विशेष मानचित्र प्रक्षेपण को आधिकारिक रूप से अपनाने के लिए नहीं है। भारतीय राजनयिक रघु पुरी ने कहा कि भारत इस प्रस्ताव को समान-क्षेत्रफल वाले मानचित्र प्रक्षेपण के व्यापक इस्तेमाल और इस विचार को बढ़ावा देने के रूप में देखता है।
रघु पुरी ने स्पष्ट किया कि भारत का समर्थन किसी खास प्रक्षेपण, जिसमें ‘इक्वल अर्थ’ भी शामिल है, को आधिकारिक रूप से अपनाने का समर्थन नहीं माना जाना चाहिए। उनका कहना है कि अलग-अलग मानचित्र प्रक्षेपणों में किसी क्षेत्र के आकार को लेकर लोगों की धारणा अलग हो सकती है।
मानचित्र प्रक्षेपण को लेकर भारत की राय:
भारतीय राजनयिक के अनुसार, कई मानचित्र प्रक्षेपणों का उद्देश्य वास्तविक आकार को दिखाने के बजाय भूगोल की दूसरी विशेषताओं को सुरक्षित रखना होता है। इनमें आकृति, दिशा और दूरी जैसी विशेषताएं शामिल हो सकती हैं। ऐसे में अलग-अलग प्रक्षेपणों में दुनिया के विभिन्न हिस्सों का आकार अलग-अलग दिखाई दे सकता है।
रघु पुरी ने कहा कि समान-क्षेत्रफल वाले मानचित्र प्रक्षेपण महाद्वीपों और भू-भागों के वास्तविक सापेक्ष आकार को अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से दिखाने में मदद कर सकते हैं। भारत का मानना है कि जहां उद्देश्य महाद्वीपीय भू-भाग के सापेक्ष आकार को बनाए रखना हो, वहां ऐसे तरीकों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
किसी एक तकनीक को अनिवार्य बनाने के पक्ष में नहीं भारत:
भारत ने प्रस्ताव में ऐसी भाषा का समर्थन किया है, जो सटीक मानचित्रण को बढ़ावा दे, लेकिन किसी एक तकनीक या मानचित्र प्रणाली को अनिवार्य न बनाए। रघु पुरी के मुताबिक, अलग-अलग देशों, संस्थानों और मानचित्र विशेषज्ञों को अपनी जरूरत और उद्देश्य के अनुसार उपयुक्त मानचित्र प्रक्षेपण चुनने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
भारत की स्थिति का आधार यह है कि मानचित्र तैयार करने में सटीकता को बढ़ावा दिया जाए, लेकिन किसी एक कार्टोग्राफिक पद्धति को सभी के लिए जरूरी न बनाया जाए। इसी दृष्टिकोण के आधार पर भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव का समर्थन किया।
क्या मौजूदा विश्व मानचित्र में आकार सही दिखता है?:
प्रस्ताव में कहा गया है कि 16वीं सदी में समुद्री यात्राओं के लिए तैयार किया गया मर्केटर प्रक्षेपण आज भी स्कूलों, मीडिया, डिजिटल मंचों और आधिकारिक सामग्री में बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, इस प्रक्षेपण में भूमध्य रेखा से दूर स्थित क्षेत्रों के आकार में काफी अंतर दिखाई दे सकता है।
मानचित्र के इस स्वरूप को लेकर यह चिंता जताई गई है कि इससे दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों के वास्तविक आकार को समझने में अंतर पैदा हो सकता है। प्रस्ताव इसी अंतर को कम करने और मानचित्रों में विभिन्न भू-भागों का अधिक संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में है।
अफ्रीका और दक्षिण एशिया के आकार को लेकर चिंता:
संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव में कहा गया है कि मौजूदा मानचित्र प्रक्षेपणों में अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया के वास्तविक आकार को छोटा दिखाई देने का प्रभाव पड़ सकता है। प्रस्ताव के अनुसार, इससे दुनिया को देखने और अलग-अलग क्षेत्रों के महत्व को समझने में एक असंतुलित नजरिया बन सकता है।
‘करैक्ट द मैप’ प्रस्ताव का उद्देश्य मानचित्रों में दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों का ज्यादा संतुलित और सटीक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। भारत ने इसी व्यापक उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए प्रस्ताव का समर्थन किया है, साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि किसी एक विशेष मानचित्र प्रणाली को अनिवार्य रूप से अपनाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
किस देशों ने मतदान से दूरी बनाई:
प्रस्ताव पर हुए मतदान में एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा, सर्बिया और यूक्रेन ने मतदान से दूरी बनाई। दूसरी ओर, अमेरिका ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। इसके बावजूद प्रस्ताव को महासभा में भारी बहुमत मिला और 164 देशों के समर्थन से इसे मंजूरी दे दी गई।
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