नई दिल्ली (New Delhi) में देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने कामकाज के तरीके में बड़ा बदलाव करते हुए वर्चुअल सुनवाई और वर्क फ्रॉम होम व्यवस्था को औपचारिक रूप दे दिया है। यह कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा की अपील के प्रभाव के रूप में देखा जा रहा है। अदालत का उद्देश्य ईंधन की बचत और प्रशासनिक खर्चों में कमी लाना बताया गया है।
वर्किंग सिस्टम में बड़ा बदलाव:
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों के अनुसार अब अदालत के कामकाज में डिजिटल और हाइब्रिड मॉडल को प्राथमिकता दी जाएगी। सोमवार और शुक्रवार को अदालत में फिजिकल सुनवाई के बजाय पूरी तरह वर्चुअल सुनवाई की व्यवस्था लागू की गई है। इन दिनों विशेष रूप से ‘मिसलेनियस’ (Miscellaneous) मामलों की सुनवाई ऑनलाइन माध्यम से की जाएगी, जिससे वकीलों और पक्षकारों को अदालत परिसर में आने की आवश्यकता नहीं होगी।
वर्चुअल सुनवाई से घटेगा ट्रैफिक और ईंधन खर्च:
इस नई व्यवस्था से न्यायिक प्रक्रिया में डिजिटल माध्यम का उपयोग बढ़ेगा। अदालत आने-जाने वाले वाहनों की संख्या कम होने से सड़क पर दबाव घटेगा और ईंधन की खपत में भी कमी आने की उम्मीद है। यह कदम पर्यावरण संरक्षण और संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
रजिस्ट्री विभाग में लागू हुआ वर्क फ्रॉम होम मॉडल:
सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में कार्यरत कर्मचारियों के लिए भी नई व्यवस्था लागू की गई है। निर्देशों के अनुसार रजिस्ट्री स्टाफ का 50 प्रतिशत हिस्सा रोटेशन के आधार पर वर्क फ्रॉम होम करेगा। शेष 50 प्रतिशत कर्मचारी कार्यालय से काम जारी रखेंगे ताकि कामकाज की निरंतरता बनी रहे और व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित हो सके।
प्रशासनिक कार्यों में संतुलन बनाए रखने पर जोर:
नए दिशा-निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि डिजिटल और कार्यालय आधारित कार्य प्रणाली के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक होगा। प्रशासनिक कार्यों की गति और गुणवत्ता प्रभावित न हो, इसके लिए विशेष निगरानी रखी जाएगी।
ऊर्जा संरक्षण की दिशा में न्यायपालिका का कदम:
इस फैसले को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की उस अपील से जोड़कर देखा जा रहा है जिसमें उन्होंने ऊर्जा संरक्षण और संसाधनों के सीमित उपयोग पर जोर दिया था। विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) का यह निर्णय न्यायपालिका में तकनीकी बदलाव और पर्यावरणीय जागरूकता की दिशा में एक बड़ा कदम है।
आशंका जताई जा रही है कि इस मॉडल के सफल क्रियान्वयन के बाद देश की अन्य हाई कोर्ट्स (High Courts) और निचली अदालतें भी इसी तरह के हाइब्रिड सिस्टम को अपनाने पर विचार कर सकती हैं।
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