भगवान उस दिन तू भी रो रहा था।
मुझे पता है अरमानों की हत्या के वक्त तू सो रहा था।।
सत्य, स्वाभिमान और आत्मसम्मान का हत्यारा था अभिमान।
आंसू तेरे भी गिरे, परंतु तू इन्हें खो रहा था।।
हैं न भगवान, उस दिन तू भी रो रहा था।।
सत्य तन्हा मासूम बच्चे सा था,
डराओ तो डरता था, भगाओ तो भागता था,
क्योंकि उस दिन वो स्वाभिमान को खो रहा था।
और आत्मसम्मान बहुत रो रहा था।।
अभिमान की अत्याचार की पराकाष्ठा ने
सत्य को स्वाभिमान से मिलाया,
अभिमान का अपमान कर,
स्वाभिमान ने आत्मसम्मान को बचाया।
उस दिन अत्याचारी का अभिमान खो रहा था,
अभिमान को कुबेर का साथ मिला,
सत्यवान को स्वाभिमान का…
आत्मसम्मान बचा कर भी सत्य टूट रहा था।
क्योंकि पहलवान और धनवान उससे रूठ रहा था।।
मुझे पता है अरमानों की हत्या के वक्त तू सो रहा था।।
हैं न भगवान, उस दिन तू भी रो रहा था।।
…….. : अभिनेंद्र की कलम से