Ghazipur में मदरसे के खेल का “खुलासा”!

शिक्षा समाज की जड़ है और अगर जड़ में खाद पानी सही नहीं पड़ा तो जड़ सड़ जाता है. समाज के हर वर्ग की शिक्षा के सरकार की कई योजनायें वर्षों से चली आ रही हैं. सरकारी विद्यालय के अलावा एडेड स्कूल, निजी स्कूल और मदरसों को सरकारी मदद मिलती रही है. लेकिन जरा सोचिये यदि इनमे से कोई इस मदद का दुरपयोग करने लगे तो. यहाँ शासन है प्रशासन है और नियम है. अगर उन नियमों का उलंघन होने लगे तो. वीडियो देखें:

इस खबर के सार को यूँ समझिये कि हम पहले ही शिक्षा व्यवस्था के खस्ताहाल को लेकर कई सवाल कर रहे हैं और इधर कुछ लोगों ने मदरसे के नाम पर धन उगाही पूरा सिस्टम बना लिया है और ये सिस्टम अब इतना पुराना हो चूका है कि अब इसके कारनामों की बदबू फ़ैल रही है. ये हम नहीं कह रहे, ये सार तो शिकायतकर्ता के शिकायत के विस्तार से निकल कर आ रहा है.

गाजीपुर जनपद में एक ऐसा मदरसा वर्षों से संचालित हो रहा है, जिसे मान्यता प्राप्त नहीं है। ‘चश्मे रहमत ओरिएंटल कॉलेज’ नामक यह संस्थान वास्तव में एक सोसाइटी है, परंतु इसके माध्यम से शिक्षण कार्य जारी है। हैरानी की बात यह है कि इस मदरसे में शासनादेश की अवहेलना करते हुए शिक्षकों और कर्मचारियों की नियुक्ति भी की गई है। वर्तमान में इस संस्थान में 32 शिक्षक और कर्मचारी कार्यरत हैं, जिनका वेतन जिला अल्पसंख्यक कल्याण विभाग द्वारा जारी किया जा रहा है। शिकायतों के बावजूद अब तक इस मदरसे के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। शिकायतकर्ता लगातार दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर विभाग से गुहार लगा रहा है।

चलिए मान गये कि संस्थान बनाने के लिए सोसाइटी बनायीं होगी लेकिन ऐसा क्या जुगाड़ कर दिया कि सरकारी फंड से तनख्वा मिलने लगी? जी हाँ, बताया जा रहा है कि सूचना के अधिकार के तहत जवाब न देने पर जनसूचना आयोग द्वारा कई बार संबंधित अधिकारियों पर ₹25,000 तक का जुर्माना लगाया गया, बावजूद इसके कोई स्पष्ट सूचना नहीं दी गई। वहीं मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराने के बावजूद गोलमोल उत्तर देकर मामले को दबाने की कोशिश की गई।

शिकायतकर्ता का नाम है हिदायतुल्लाह अंसारी, जो गाजीपुर जनपद के ही सदर कोतवाली क्षेत्र के रजदेपुर शहरी मोहल्ला के निवासी हैं, इन्होने 19 मार्च को मुख्यमंत्री को रजिस्टर्ड डाक से पत्र भेजकर आरोप लगाया कि ‘चश्मे रहमत ओरिएंटल कॉलेज’ कोई मदरसा नहीं, बल्कि एक सोसाइटी है। यानि मदरसे का लाइसेंस नहीं है…

अब अधिकारी का क्या कहना है? ये भी समझिये… जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी सच्चिदानंद तिवारी ने अपने पत्र में बताया कि “चश्मे रहमत ओरिएंटल कॉलेज गाजीपुर अरबी-फारसी मदरसा है, जिसे प्रमाणपत्र संख्या 1964/1985-86 के तहत दिनांक 5-11-1985 को मान्यता प्रदान की गई थी और जिसका नवीनीकरण 9-10-2016 को हुआ था।” यहाँ तक तो ठीक है लेकिन उन्होंने ये भी बताया कि मान्यता को लेकर शिकायत आई थी, जिसकी जांच की गई और एक कमेटी भी गठित की गई। मामला निदेशालय तक पहुंच चुका है। तिवारी ने यह भी स्वीकार किया कि कॉलेज की मान्यता की प्रति विभाग के पास उपलब्ध नहीं है।उन्होंने यह भी कहा कि यह मदरसा काफी पुराना है और वेतन भुगतान काफी पहले से किया जा रहा है। विभाग वर्तमान में एडी बेसिक से प्राप्त कागजातों के आधार पर शासनादेश के तहत भुगतान कर रहा है।

मतलब यदि शिकायतकर्ता का आरोप सही तो ये खेल बहुत पुराना है… सच तो सामने आना चाहिए ताकि सरकारी धन का सही इस्तेमाल हो सके… अब तो जाँच से ही स्पष्ट होगा कि क्या चश्मे रहमत ओरिएंटल कॉलेज ने कोई बड़ा खेल किया है? क्या शिकायतकर्ता का आरोप सही है?

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