गाजीपुर में विश्वविद्यालय की आस में हजारों छात्रों का विश्वास सरकार पर है, उम्मीद है कि जिस विश्वविद्यालय का निर्माण कई वर्ष पहले ही हो जाना चाहिए था वो अब हो जायेगा. लेकिन छात्रों के उस विश्वास को तोड़ने का भरपूर प्रयास किया गया.मंचों से छोटे कार्यों पर मसाला लगाकर बड़ा बताने वाले नेताओं की प्राथमिकता में शायद शिक्षा नहीं रहा, जनपद में शिक्षा के बड़े मंदिर के प्रबंधक की प्राथमिकता भी छात्रों का नहीं बल्कि शायद अपना विकास है. वीडियो देखें:
सरकारी विद्यालयों की स्थिति ऐसी हो गयी कि उसे मार्ज करने की नौबत आ गयी, वर्षों से चल रहे मदरसे पर अवैध होने का आरोप लगने लगा. लाखों के कर्ज में डूब कर माँ बाप अपने बच्चों को गैर जनपद भेजने पर मजबूर हैं. लेकिन जनप्रतिनिधि, सरकारी विद्यालय के जिम्मेदार शिक्षक, शिक्षा से सम्बंधित विभागों के अधिकारी, मदरसे के प्रबंधक अपने ही स्वार्थ में झूठी शान को पाल रहे हैं. जनपद का ऐसा हाल देखकर इन्हें नींद कैसे आती है? क्या किसी जनप्रतिनिधि का बच्चा किसी सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढता है? क्या अधिकारी पूर्ण रूप से कोर्ट के उस आदेश का पालन करते हैं जिसमे कहा गया है कि सरकारी कर्मचारी अपने बच्चों को सरकारी विद्यालय में ही पढ़ायेगा. क्या इस पर किसी पार्टी के कोई कार्यकर्त्ता आवाज उठता है? इनका बस एक ही कार्य है खबर इनके पक्ष की हो पत्रकार इमानदार है और इनके गलत कार्यों पर बात हो तो पत्रकार चाटुकार है. देशद्रोही तक बता देते हैं जैसे देशद्रोही शब्द शोध में इन्होने पीएचडी की हो.
हिम्मत है तो सवाल इन जिम्मेदार लोगों से पूछों, जिनका काम है व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखना. गंभीर ख़बरों में मनोरंजन ढूढने से विकास नहीं होता, अपने समाज के लिए कुछ करना है तो संघर्ष करना पड़ता है, शौख छोड़कर दो रोटी में जिन्दगी काटनी पड़ती है, समानता की विचारधारा पैदा करनी पड़ती है. सीखना है तो दीपक उपाध्याय और उनके सहयोगियों से सिखो जिन्होंने हजारों छात्रों के भविष्य के लिए अपने जवानी को दाव पर लगा दिया है. गाजीपुर में विश्वविद्यालय निर्माण के लिए अपने संघर्ष को कभी नहीं छोड़ा, आन्दोलन किया, पत्रक पर पत्रक सौंपते रहे, खून से पात्र लिखा ट्विटर पर विश्विद्यालय की मांग को ट्रेंड करवाया. नेताओं ने भाषण दिया और इन्होने गाजीपुर से लखनऊ और गोरखपुर तक दौड़ते रहे की मुख्यमंत्री तक बात पहुँच जाए और जनपद में विश्वविद्यालय बन जाए. वो भी निस्वार्थ. क्या ये भावना नेताओं में है? सबने लम्बे लम्बे भाषण दिए लेकिन जब सीएम योगी का आगमन जनपद में हुआ तो उनकी प्राथमिकता मंच पर जगह पाना, उनकी नज़रों में आना और फोटो खिचाने तक रह गयी. और इधर जिस कॉलेज को विश्वविद्यालय में तब्दील करने की बात चल रही है उसके प्रबंधक पर आरोप लग रहे हैं उन्होंने कागज को दबा दिया…
जी हाँ बात पीजी कॉलेज गाजीपुर की हो रही है. बताया जा रहा है कि स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाजीपुर जो जनपद का एक अग्रणी एवं साधन संपन्न महाविद्यालय है। यह गाजीपुर से 110 किलोमीटर दूर वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर से संबद्ध है। स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाजीपुर अशासकीय महाविद्यालय है और महाविद्यालय में नियुक्त प्राचार्य, प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर, तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ट्रेजरी के माध्यम से वेतनमान, भत्ता, पेंशन आदि पर 1.5 करोड़ रुपए प्रति माह प्रदान किया जाता है। स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाजीपुर के पास लगभग 77.20 एकड़ राज्य सरकार की सरकारी जमीन (नजूल लैण्ड) है, जो गाजीपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी, कुशलपाल सिंह द्वारा एक रूपए के लीज डीड के माध्यम से तत्कालीन जिलाधिकारी कुशलपाल सिंह की अध्यक्षता में गठित डिग्री कालेज एसोसिएशन, गाजीपुर को 1957 में दी गई है।
जिला प्रशासन द्वारा स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाजीपुर के लिए तत्कालीन बीज गोदाम का कार्यालय एवं भवन आवंटित कर पठन – पाठन प्रारम्भ किया गया। स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाजीपुर को और भव्यता प्रदान करने एवं भवन निर्माण हेतु तत्कालीन जिलाधिकारी कुशलपाल सिंह द्वारा 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान गाजीपुर जनपद के स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी करने वाले जमीनदारों व ग्रामीणों से अंग्रेज सरकार द्वारा वसूल की गई युनिटी टैक्स को 1957 में कुल 83285 रूपए डिग्री कालेज एसोसिएशन, गाजीपुर को प्रदान कर आधुनिक स्वरूप प्रदान किया गया है। वर्तमान में स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाजीपुर में लगभग 9000 छात्र छात्रायें अध्ययनरत हैं, जिससे स्नातकोत्तर महाविद्यालय गाजीपुर का स्वरूप विश्वविद्यालय जैसा दिखता है। स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाजीपुर को राज्य विश्वविद्यालय, गाजीपुर से उच्चीकृत करने पर उतर प्रदेश सरकार पर कोई व्यय भार नहीं पड़ेगा क्योंकि महाविद्यालय के प्रोफेसरों एवं कर्मचारियों को वेतन, भत्ते, पेंशन आदि पर लगभग 1.5 करोड़ रुपए खर्च होने वाले धनराशि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ही प्रदान किया जाता है।
महाविद्यालय के पास पहले से ही भवन, छात्र, वित्तीय कोष आदि उपलब्ध है। गाजीपुर जनपद में उत्तर प्रदेश के सबसे अधिक 364 महाविद्यालय अवस्थित है जिसे राज्य पोषित विश्वविद्यालय, गाजीपुर से सम्बद्ध कर अत्यंत कम खर्चे में एक राज्य पोषित विश्वविद्यालय की स्थापना की जा सकती है और सीएम योगी के महत्वाकांक्षी योजना एक जिला एक विश्वविद्यालय की योजना से पूर्ण हो जायेगा क्योंकि ऐसे ही वाराणसी के यूपी कॉलेज को विश्वविद्यालय के रूप में तब्दील किया है. ऐसे कई उदहारण हैं.
दीपक उपाध्याय और उनके सहयोगियों ने विश्विद्यालय निर्माण मंच की स्थापना कर छात्रों की मांग को मुख्यमंत्री तक पहुँचाने का काम कर रहे हैं. विश्विद्यालय निर्माण मंच के अध्यक्ष और पूर्व छात्रसंघ उपाध्यक्ष दीपक उपाध्याय ने गोरखपुर पहुँच कर सीएम योगी से मुलाकात की और इस समस्या से अवगत करवाया. अब समस्या क्या है इसे समझिये:
विश्विद्यालय निर्माण मंच निर्माण ने विश्विद्यालय स्थापना को लेकर खूब संघर्ष किया, सारे आंकड़ों को सामने रखा, जिलाधिकारी गाजीपुर की तरफ उनकी मांग को मुख्यमंत्री के निजी सचिव तक भेजा गया. उच्च शिक्षा के संयुक्त निदेशक शशि कपूर द्वारा क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी वाराणसी को प्रस्ताव के सम्बन्ध में पत्र लिखा गया और क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी वाराणसी ज्ञान प्रकाश वर्मा द्वारा प्रबंधक/प्रबंध समिति/प्राचार्य स्नाकोत्तर महाविद्यालय गाजीपुर को 7 मई 2025 को प्रस्ताव उपलब्ध कराये जाने के सम्बन्ध में पत्र लिखा गया. अब आरोप है कि स्नाकोत्तर महाविद्यालय गाजीपुर द्वारा अब तक प्रस्ताव उपलब्ध करवाया ही नहीं गया. अब सवाल है क्यों? क्या समस्या आ रही है. AI के ज़माने में विंडोज 98 जैसा काम करने की क्या ज़रूरत है? अब स्नाकोत्तर महाविद्यालय के जिम्मेदार चाहेंगे तो जनपद को विश्वविद्यालय मिल जाएगा… उम्मीद जनप्रतिनिधियों से भी है कि प्राथमिकता शिक्षा होनी चाहिए अपने बच्चों के साथ साथ अपने मतदाताओं के बच्चों की भी… एक समान और सबका सम्मान…
