उत्तर प्रदेश सरकार ने फैसला लिया है कि 50 से कम छात्रों वाले स्कूलों को आसपास के संस्थानों में विलय करके एक अधिक सुदृढ़ शिक्षण वातावरण तैयार करना है। इस फैसले के विरोध में हाईकोर्ट में याचिका डाली गयी, जो ख़ारिज हो गयी, अब इस क्रम में अब इन विद्यालयों की खाली हुई बिल्डिंग में आंगनबाड़ी केंद्रों को शिफ्ट करने की प्रक्रिया शुरू की गई है। इसके लिए बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग पहले सर्वे कराएगा। पहले सर्व शिक्षा अभियान और मनमोहन सरकार में शिक्षा के अधिकार अधिनियम (आरटीई), 2009 के तहत देश के आखिरी बच्चे तक को शिक्षित बनाने की मुहीम चलायी गयी, गाँव गाँव के आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवार के बच्चों को शिक्षा मिले, इसके जगह जगह प्राथमिक विद्यालय खोले गये, ताकि पैसों और दुरी की वजह से कोई शिक्षा से वंचित न रह जाए। सरकारें आती जाती रहीं और स्कूलों में मिड डे मिल, किताबें, ड्रेस और बैग का इंतेजाम सरकारें करती रहीं। अलग अलग वर्ग में सरकारी अध्यापकों और अध्यापिकाओं की नियुक्ति की गयी, तनख्वा भी इतनी अच्छी दी गयी कि अध्यापक दान देकर स्कूल के जर्जर भवन की मरम्मत करवा दें। लेकिन सरकार के निर्णय से स्पष्ट होता है कि जिस मकसद इन स्कूलों को खोला गया वो पूरा हुआ ही नहीं, जहाँ 50 से भी कम बच्चें हैं वहां 2 से 3 शिक्षकों पर सरकार करीब 2 लाख खर्च कर रही है, वहीँ एक निजी स्कूल 6 से 7 शिक्षकों पर 2 लाख खर्च कर 250 से ज्यादा बच्चों को पढ़ा रहे, प्रवेश के लिए भीड़ लग जाती है, छात्र भविष्य उज्जवल हो जाता है। अब सवाल है कि सरकारी विद्यालय की स्थिति का जिम्मेदार कौन है? इसको समझने के लिए हमारे संवादाता ज़फर इक़बाल की इस रिपोर्ट को देखिये:
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ऐसा नहीं है सरकारी शिक्षक अपनी जिम्मेदारियां नहीं निभाते हैं, कई शिक्षक ईमानदारी से अपना काम करते हैं लेकिन कई सरकार की आँखों में धुल झोंकते हैं, कभी इन शिक्षकों विद्यालय के जर्जर भवन, बैठने की व्यवस्था, स्मार्ट क्लासेज, विद्यालय तक आने वाले जर्जर सड़क के लिए आन्दोलन करते देखा हैं. हम सभी शिक्षकों पर आरोप नहीं लगाते हैं, लेकिन कई तो ऐसे हैं जिन्होंने शिक्षा के मंदिर सरकारी धन लेकर केवल मौज काटी है, शिक्षा की जगह धर्म और जातिवादी नफरत को फैलाया है. इनसे अच्छे तो निजी स्कूल हैं जो पैसा लेते तो हैं लेकिन शिक्षा भी देते हैं. सरकार ने देश में शिक्षा और समानता के लिए, जनता के टैक्स के पैसे से इकठ्ठा हुए राजस्व को खर्च किया, ताकि गरीब के बच्चे भी मुख्य धारा में आ सके लेकिन कई सरकारी शिक्षकों के कारण सरकारी राजस्व की बर्बादी भी हुई और गरीब को उसका अधिकार भी न मिल सका. अरे ये तो अपने बच्चों को भी अपने स्कूल नहीं पढ़ाते…
खैर अब सुप्रीम कोर्ट कम छात्रों वाले 10 हजार से अधिक प्राइमरी स्कूलों को दूसरे विद्यालयों में विलय करने के उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले के खिलाफ सुनवाई करने पर सहमत हो गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मामले को इसी सप्ताह सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई। हालांकि, जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, यह नीतिगत फैसला है, लेकिन सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं तो वह इस मुद्दे की सुनवाई के लिए तैयार हैं। याचिकाकर्ता तैय्यब खान सलमानी की ओर से पेश अधिवक्ता प्रदीप यादव ने तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया था।
याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकार के स्कूलों के विलय करने के निर्णय को मनमाना बताया है। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि स्कूलों के विलय की प्रक्रिया के कारण बच्चों को एक किलोमीटर से ज्यादा पैदल चलकर स्कूल जाना पड़ेगा, जो कथित तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21ए और बच्चों के मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम (आरटीई), 2009 का उल्लंघन है। राज्य सरकार के फैसले के तहत राज्य के 1.3 लाख प्राथमिक विद्यालयों में से कम छात्रों वाले 10827 विद्यालयों का दूसरे विद्यालयों में विलय किया जाना है।
कांग्रेस की उत्तर प्रदेश इकाई के प्रमुख अजय राय ने राज्यपाल को पत्र लिखकर इस प्रक्रिया को तुरंत रोकने की मांग की है और कहा है कि यह विलय स्कूलों को बंद करने का एक छिपा हुआ प्रयास है, जिससे ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को नुकसान हो रहा है। आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सदस्य और उत्तर प्रदेश प्रभारी संजय सिंह ने ‘स्कूल बचाओ’ अभियान शुरू किया है और सरकार पर शराब की दुकानें खोलने के साथ-साथ कई स्कूलों (कथित तौर पर लगभग 27,000) को बंद करने की योजना बनाने का आरोप लगाया है।
सरकार के फैसले ने कई सवाल खड़े किये हैं… देखते हैं आगे क्या होता है?
