देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी कर दी गई है। राजधानी दिल्ली (Delhi) में पेट्रोल 87 पैसे महंगा होकर ₹99.51 प्रति लीटर पहुंच गया है, जबकि डीजल के दाम 91 पैसे प्रति लीटर बढ़कर ₹92.49 हो गए हैं। लगातार बढ़ती ईंधन कीमतों ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। इसके साथ ही दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) में सीएनजी (CNG) की कीमतों में भी ₹1 प्रति किलो का इजाफा किया गया है।
नई दरों के बाद दिल्ली में सीएनजी ₹81.09 प्रति किलो मिल रही है। पिछले 10 दिनों में सीएनजी कीमतों में यह तीसरी बढ़ोतरी है। इससे पहले 15 मई को ₹2 और 18 मई को ₹1 प्रति किलो की वृद्धि की गई थी।
9 दिनों में तीसरी बार बढ़े दाम:
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में पिछले 9 दिनों में यह तीसरी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इससे पहले 19 मई को ईंधन की कीमतों में औसतन 90 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई थी। वहीं 15 मई को भी पेट्रोल और डीजल के दाम ₹3 प्रति लीटर तक बढ़ाए गए थे।
लगातार हो रही वृद्धि से लोगों की जेब पर असर पड़ना शुरू हो गया है। परिवहन से लेकर घरेलू खर्च तक कई चीजें महंगी होने की आशंका जताई जा रही है।
दैनिक जरूरत की चीजें हो सकती हैं महंगी:
ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी का असर सिर्फ वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहेगा। ट्रक और टेम्पो का किराया बढ़ने से दूसरे राज्यों से आने वाली सब्जियां, फल और राशन भी महंगे हो सकते हैं।
खेती-किसानी पर भी इसका असर पड़ सकता है। किसानों को ट्रैक्टर और पंपिंग सेट चलाने में अधिक खर्च करना होगा, जिससे फसल उत्पादन की लागत बढ़ सकती है। इसके अलावा सार्वजनिक परिवहन, स्कूल बस, ऑटो और अन्य यात्री सेवाओं के किराए में भी इजाफा देखने को मिल सकता है।
कच्चे तेल की कीमतों का असर:
विशेषज्ञों के अनुसार ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी है। अमेरिका (America) और ईरान (Iran) के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध जैसे हालात के कारण क्रूड ऑयल (Crude Oil) की कीमतों में उछाल आया है।
बताया जा रहा है कि युद्ध शुरू होने से पहले कच्चा तेल करीब 70 डॉलर प्रति बैरल था, जो अब बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। इससे तेल कंपनियों पर आर्थिक दबाव बढ़ा और घाटे की भरपाई के लिए कीमतों में बढ़ोतरी की गई।
कैसे तय होती हैं पेट्रोल-डीजल की कीमतें:
भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत और डॉलर के मुकाबले रुपए की स्थिति के आधार पर देश में ईंधन के दाम तय किए जाते हैं।
सरकारी तेल कंपनियां “डेली प्राइस रिवीजन” प्रणाली के तहत हर दिन सुबह 6 बजे नई कीमतें जारी करती हैं। उपभोक्ताओं तक पहुंचने से पहले ईंधन की कीमतों में कई तरह के टैक्स और खर्च जुड़ते हैं।
सबसे पहले कच्चे तेल की मूल कीमत तय होती है। इसके बाद रिफाइनिंग लागत और कंपनियों का मार्जिन जोड़ा जाता है। फिर केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी और रोड सेस लगाती है। इसके बाद डीलर कमीशन जुड़ता है और अंत में राज्य सरकारें वैट या लोकल टैक्स लगाती हैं। इसी कारण अलग-अलग राज्यों और शहरों में पेट्रोल-डीजल के दाम अलग होते हैं।
मार्च 2024 से स्थिर थे दाम:
देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें मार्च 2024 से स्थिर बनी हुई थीं। लोकसभा चुनाव 2024 से पहले सरकार ने जनता को राहत देते हुए ₹2 प्रति लीटर की कटौती भी की थी।
हालांकि तकनीकी रूप से तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार के आधार पर रोजाना कीमतें बदल सकती हैं, लेकिन राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों के कारण लंबे समय तक कीमतों में बदलाव नहीं किया गया था।
तेल कंपनियों को हो रहा था भारी नुकसान:
सरकार के अनुसार इंडियन ऑयल (Indian Oil), भारत पेट्रोलियम (Bharat Petroleum) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (Hindustan Petroleum) जैसी सरकारी कंपनियां लंबे समय से घाटे में चल रही थीं।
पेट्रोलियम मंत्रालय की जॉइंट सेक्रेटरी सुजाता शर्मा (Sujata Sharma) के मुताबिक कंपनियों को पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की बिक्री पर हर महीने करीब ₹30 हजार करोड़ का नुकसान हो रहा था। इसी वजह से कंपनियों पर कीमतें बढ़ाने का दबाव बढ़ता जा रहा था।
पीएम मोदी ने संयमित उपयोग की दी सलाह:
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने हाल ही में तेलंगाना (Telangana) में एक कार्यक्रम के दौरान पेट्रोलियम उत्पादों के संयमित उपयोग की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात को देखते हुए पेट्रोल, गैस और डीजल का उपयोग जरूरत के अनुसार ही करना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने कहा था कि इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और युद्ध जैसे हालात के आर्थिक प्रभाव को कम करने में मदद मिलेगी।
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