भारत में हर 18 मिनट में एक दलित के खिलाफ अपराध दर्ज होता है और हर साल अनुसूचित जातियों के खिलाफ 45,000 से अधिक मामले दर्ज किए जाते हैं। National Crime Records Bureau की रिपोर्ट के अनुसार 2022 में अनुसूचित जातियों के खिलाफ 50,000 से ज्यादा केस दर्ज हुए। दूसरी तरफ धर्मांतरण को लेकर तस्वीर बहुस्तरीय है—Pew Research Center (2021) के सर्वे के अनुसार देश में कुल मिलाकर धर्मांतरण की दर बहुत कम है और अधिकांश लोग अपने जन्म धर्म में ही बने रहते हैं। लेकिन कुछ राज्यों में पिछले ढाई वर्षों में धर्मांतरण से जुड़े मामलों में चार गुना तक वृद्धि दर्ज की गई है। उत्तराखंड में 2023–2025 के बीच 42 मामले सामने आए, छत्तीसगढ़ में चार वर्षों में 102 विवादित प्रकरण दर्ज हुए।
उत्तर प्रदेश में “उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम, 2021” लागू होने के बाद से राज्य सरकार द्वारा सार्वजनिक किए गए आंकड़ों के अनुसार 2021 से 2024 के बीच 800 से अधिक मामले दर्ज हुए और 1600 से ज्यादा गिरफ्तारियां हुईं। कई मीडिया रिपोर्टों में संगठित “धर्मांतरण गिरोह” के भंडाफोड़, विदेशी फंडिंग की जांच, दलित समुदायों को प्रलोभन देकर परिवर्तन कराने के आरोप, कथित “लव जिहाद” मामलों में हिंदू लड़कियों के धर्म परिवर्तन के आरोप, और नाबालिगों से जुड़े प्रकरण सामने आए हैं। हालांकि इन सभी मामलों में अंतिम सत्य न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर है—आरोप और दोषसिद्धि अलग-अलग बातें हैं।
लेकिन इन आंकड़ों से पहले एक जरूरी बात—किसी भी जाति या धर्म में अधिकांश लोग नफरत या भेदभाव करने वाले नहीं होते। कुछ लोग अंधविश्वास और कट्टर सोच में लिप्त होते हैं और वही विवाद की जड़ बनते हैं। जैसा कहा जाता है, एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है—अब समय आ गया है कि उस एक “मछली” रूपी गलत विचारधारा को जड़ से उखाड़ फेंका जाए। समाज रूपी इस तालाब को प्रेम, संवेदना और एकता से भरना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए।
यदि हर व्यक्ति जाति या धर्म के चश्मे से ही सोचने लगे तो एक अलग जाति का पत्रकार दूसरे समाज के दर्द को अपना दर्द समझकर दुनिया तक नहीं पहुंचा पाएगा। एक अलग धर्म का सैनिक सीमा पर खड़ा होकर पूरे भारत की रक्षा नहीं कर पाएगा। एक नेता, चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का हो, अपने क्षेत्र को परिवार की तरह नहीं देख पाएगा। स्पष्ट है—गलत करने वालों की कोई जाति या धर्म नहीं होती; वे अपने निजी स्वार्थ और अपराध को छिपाने के लिए धर्म और जाति का सहारा लेते हैं।
इसी पृष्ठभूमि में लखनऊ से आया बयान राष्ट्रीय विमर्श को और तीखा कर देता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने सामाजिक सद्भाव कार्यक्रम में हिंदू समाज की एकता, ‘घर वापसी’, अवैध घुसपैठ और तीन बच्चों की अपील जैसे मुद्दों को जोरदार तरीके से उठाया। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज को संगठित और सशक्त होना चाहिए, डरने की जरूरत नहीं लेकिन सतर्क रहना जरूरी है। उन्होंने घटती जन्मदर को भविष्य के लिए चेतावनी बताया और कहा कि नवदंपतियों तक यह संदेश पहुंचना चाहिए।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—जब एक तरफ दलितों के खिलाफ हजारों अपराध दर्ज हो रहे हों, जब धर्मांतरण के आरोपों में सैकड़ों मुकदमे दर्ज हो रहे हों, जब गिरोहों के खुलासे और गिरफ्तारियां हो रही हों, तब प्राथमिकता क्या होनी चाहिए? क्या समाज का असली संकट जनसंख्या संतुलन है, या सामाजिक असमानता और न्याय की कमी?
धर्मांतरण के मामलों में दलित समुदायों के सम्मान और समानता की तलाश, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रभाव, विवाह और व्यक्तिगत आस्था जैसे कारण भी सामने आते हैं। वहीं कथित प्रलोभन आधारित या जबरन परिवर्तन के आरोपों ने कानूनी और राजनीतिक बहस को तेज किया है। जातिगत हिंसा में जमीन विवाद, सामाजिक प्रभुत्व और धीमी न्यायिक प्रक्रिया बड़ी वजह मानी जाती हैं।
तो दर्शकों के सामने सीधा प्रश्न है—क्या समाधान केवल जनसंख्या बढ़ाने की अपील में है, या सामाजिक न्याय, शिक्षा और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने में? क्या कानून से मानसिकता बदलेगी, या समाज को भीतर से बदलने की जरूरत है?
आंकड़े मौजूद हैं। बयान सामने हैं। गिरोहों के खुलासे भी हो रहे हैं। लेकिन असली लड़ाई न किसी धर्म के खिलाफ है, न किसी जाति के—यह लड़ाई अन्याय, कट्टरता और अवैध गतिविधियों के खिलाफ है। फैसला समाज को करना है कि वह डर और विभाजन के रास्ते पर चलेगा या संवाद और संवैधानिक संतुलन के रास्ते पर।
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