कांग्रेस के शासनकाल में लोकसभा अध्यक्ष रह चुकीं मीरा कुमार (Meira Kumar) ने लखनऊ (Lucknow) में आयोजित समता दिवस कार्यक्रम में अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्होंने स्वयं भी छुआछूत का दर्द झेला है। उन्होंने बताया कि यह समस्या केवल आम जीवन तक सीमित नहीं रही, बल्कि उनके परिवार को भी इसके प्रभाव का सामना करना पड़ा, चाहे वह पढ़ाई का दौर हो या राजनीतिक जीवन का शीर्ष पद।
बचपन और परिवार के अनुभवों में छुआछूत:
मीरा कुमार (Meira Kumar) ने कहा कि उनके पिता बाबू जगजीवन राम (Babu Jagjivan Ram) और मां इंद्राणी देवी (Indrani Devi) को भी जीवन में कई बार भेदभाव का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि उनकी मां ने जब स्कूल की पढ़ाई पूरी कर कॉलेज में प्रवेश लेना चाहा, तो उन्हें यह कहकर मना कर दिया गया कि अछूत को नहीं पढ़ाया जाएगा। इसके बाद उन्हें लखनऊ (Lucknow) भेजा गया, जहां उन्होंने हॉस्टल में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की, लेकिन वहां भी छुआछूत का व्यवहार जारी रहा।
लखनऊ और अन्य स्थानों पर भेदभाव की घटनाएं:
उन्होंने साझा किया कि लखनऊ (Lucknow) में पढ़ाई के दौरान उनकी मां के साथ भेदभाव हुआ। इसके अलावा, अपने अनुभव का जिक्र करते हुए मीरा कुमार (Meira Kumar) ने बताया कि एक बार उन्हें एक नेता के घर नाश्ते पर आमंत्रित किया गया था, लेकिन वहां अंदर से यह आवाज आई कि यदि अछूतों को भोजन कराया गया, तो बर्तनों को तोड़ना पड़ेगा। इस घटना ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया, हालांकि उन्होंने इसे संयम के साथ संभाला।
कानपुर के सामाजिक योगदान की कहानी:
मीरा कुमार (Meira Kumar) ने अपने ननिहाल कानपुर (Kanpur) का जिक्र करते हुए बताया कि उनके नाना डॉ. वीरबल (Dr. Veerbal) एक प्रतिष्ठित चिकित्सक थे। वर्ष 1911 में जब प्लेग फैला, तब उन्होंने क्षेत्र छोड़ने के बजाय लोगों की सेवा करने का निर्णय लिया। उन्होंने कुओं में चूना डलवाया, मृतकों के अंतिम संस्कार में मदद की और बीमारों का इलाज किया, जिससे अनेक लोगों की जान बचाई जा सकी।
राजनीतिक और सामाजिक जीवन में भी भेदभाव:
उन्होंने कहा कि उच्च पदों पर रहने और कांग्रेस (Congress) जैसी बड़ी राजनीतिक संस्था से जुड़े होने के बावजूद उन्हें छुआछूत से पूरी तरह मुक्ति नहीं मिल सकी। उन्होंने चेन्नई (Chennai) में घटी एक घटना का जिक्र किया, जहां उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया गया, लेकिन वहां भी भेदभावपूर्ण बातें सुनने को मिलीं। उन्होंने इस स्थिति को संयम और व्यावहारिकता के साथ संभालते हुए अपने साथियों को शांत रहने की सलाह दी।
1978 बनारस घटना और उसका जवाब:
मीरा कुमार (Meira Kumar) ने वर्ष 1978 की बनारस (Varanasi) घटना का जिक्र किया, जब बाबू जगजीवन राम (Babu Jagjivan Ram) को एक कार्यक्रम में अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा। इस घटना के बाद संसद में इसकी निंदा हुई, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। एक वर्ष बाद उन्होंने गंगा तट पर जमीन लेकर वहां एक भव्य रविदास मंदिर बनवाने का निर्णय लिया, जिसे उन्होंने समाज के प्रति अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया।
महिलाओं के सम्मान को प्राथमिकता:
मीरा कुमार (Meira Kumar) ने बताया कि उनके पिता मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश के समर्थन में आंदोलन चला रहे थे। जब काशी विश्वनाथ मंदिर (Kashi Vishwanath Temple) में प्रवेश के दौरान विरोध हुआ और महिलाओं को रास्ते में लेटा दिया गया, तब उन्होंने महिलाओं के सम्मान को सर्वोपरि मानते हुए वापस लौटने का निर्णय लिया। उनके अनुसार, महिलाओं का सम्मान ईश्वर के दर्शन से भी अधिक महत्वपूर्ण है।
समाज के लिए आगे की चुनौती:
अपने संबोधन के अंत में मीरा कुमार (Meira Kumar) ने कहा कि समाज में अभी भी कई चुनौतियां बाकी हैं। उन्होंने लोगों से सवाल किया कि क्या छुआछूत पूरी तरह समाप्त हो चुकी है, जिस पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आईं। उन्होंने युवाओं और कार्यकर्ताओं से समाज में बदलाव लाने की अपील करते हुए कहा कि यह संघर्ष अभी अधूरा है और इसे मिलकर आगे बढ़ाना होगा।
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