चौड़ी चौड़ी सड़कों पर रफ़्तार को देखकर विकास पर विश्वास होता है. लेकिन इन्ही शहरों में अन्धविश्वास की आंधी देखकर दीमक का एहसास भी होता है. इस देश में हाथ तो सभी फैलाते हैं. कोई मेहनत कर तनख्वा पाने के लिए हाथ फैलता है, कोई भ्रष्टाचार की गद्दी पर बैठकर तांडव करने के लिए जनता के सामने हाथ फैलाता है, कोई फरेबी विचारधारों से ग्रसित होकर हाथ फैलता है. न्याय दिलाना वाला न्याय की बोली लगाने के लिए हाथ फैलाता है. बदबूदार सामाजिक सरंचना में कलम पकड़ने वाला मासूम भी हाथ फैलता है. भिखारी तो हम सब हैं साहब, पर विश्वास नहीं होता. अब तो रफ़्तार को देखकर विकास का एहसास भी नहीं होता. ये कहानी उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की है. इतिहास को अपने आँचल में समेटे इस शहर ने आधुनिकता को भी अपनाया. आधुनिक समाज के अत्याधुनिक लोगों ने लखनऊ को खास भी बनाया है, लेकिन इस आधुनिक शहर की वो अत्याधुनिक जनता, जो अपने बच्चे के भविष्य के लिए स्वार्थ की पराकाष्ठा को पार कर जाते पर लेकिन बदलते समय के साथ वो बच्चे उन्हें अपना नहीं पाते. काश की वो अत्याधुनिक जनता इन मासूम बच्चों को अपना लेती, जो पैदा होते ही कमाने का हुनर सीख जाते हैं, कलम पकड़कर इतिहास रचने का एलान कर जाते हैं. प्रदेश के भविष्य पर जहाँ बहस होती है, जहाँ महंगी गाड़ियों से दो हाथ और दो पैर पहुँच कर कुर्सी की शान बढ़ाते हैं वो लखनऊ के इस काले सच को छुपा भी नहीं पाते. कलम की ताकत को पहचान कर, मेहनत की परिभाषा समझाने वाले इस मासूम का नाम मुझे नहीं पता, लेकिन आज मैं इसका नामकरण करने जा रहा हूँ. राम … जी हाँ ये काल्पनिक नाम जरुर है लेकिन इस मासूम के वनवास को परिभाषित भी करता है. लखनऊ के ट्रैफिक लाइट जहाँ कई सारे मासूम हाथों में पेन, नमकीन या फूल देकर भीख मांगते हैं वहीँ राम स्कूल भी जाता है. राम के हाथों में वो कला है जिसे देखकर आप हैरान हो जायेंगें. हाथों में कलम पकड़कर राम अपने हुनर को इस कोरे कागज पर उतार रहा है. भले ही नसीब में आम न हो लेकिन आम की तस्वीर को बेहद खुबसूरत बना रहा है. सड़कों पर घूमते इन मासूमों की भी कई तमन्नाएं हैं. लेकिन क्या ये तस्वीरें देश के भविष्य पर काला धब्बा नहीं हैं. इन तस्वीरों में राम तो है, लेकिन इस राम को उस रावण की तलाश भी है, जो महा शक्तिशाली है, महाज्ञानी होने का घमंड है और जिसकी वजह से इन्ही ट्रैफिक लाइट पर कुछ किशोरों की जिन्दगी में दल दल में फसती जा रही है. ये वो किशोर है जो नशा और जीवन की आशा का अंतर भूल चूका है. ट्रैफिक लाइट पर घूम कर रंग बिरंगे गुब्बारे देकर भीख मांगता है, लेकिन इसकी जिन्दगी उस काले अंधरे में गोते लगा रही है जहाँ तकलीफ के सिवा कुछ भी नहीं है. ये किशोर हाथों में व्हाइटनर नाम का पदार्थ लेक र नशा करता है. जो न केवल समाज के लिए घातक है बल्कि इस किशोर की जिन्दगी के लिए विध्वंशकारी है. सबसे गंभीर सवाल तो ये है कि देश के संविधान में भीख मांगना अपराध है लेकिन लखनऊ विधानसभा के बगल में ही मासूम बच्चे भीख मांगते नज़र आ जाते हैं. बस अब तरीका बदल चूका है. भीख मांगने के लिए कलम, फुल और गुब्बारों का सहारा लिया जा रहा है. तो क्या भी सुनियोजित ढंग से किया जा रहा है. शर्म तो इस बात की है कि इन सड़कों से ना जाने कितने अधिकारी, कितने जनप्रतिनिधि और कितने ताकतवर मंत्री गुजरते होंगे, लेकिन उनकी निगाह इन तस्वीरों पर नहीं जाती. खैर हो सकता है कि काम की थकावट में लग्जरी गाड़ी की एसी में नींद आ जाती होगी.
अब जहाँ तक सरकारों के एक्शन की बात है तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने थोड़ी सख्ती तो दिखाई है, बीते 5 जुलाई को सीएम योगी ने भिक्षावृत्ति से विमुक्त हुए बच्चों को ‘मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना’ और स्माइल परियोजना के प्रमाण पत्र एवं शैक्षणिक किट वितरित किया. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि प्राचीन काल में भिक्षाटन भारतीय परम्परा का हिस्सा थी। इसके माध्यम से एक संन्यस्त व्यक्ति अपने अहंकार को त्यागकर समाज के दर्शन को समझ पाता था। आज भिक्षावृत्ति बच्चों के भविष्य के लिए खतरनाक है। उन्होंने कहा कि बच्चों को दिव्यांग बनाकर उनसे जबरन भिक्षावृत्ति करवाने वाले गिरोहों के खिलाफ हमारी सरकार लगातार कार्रवाई कर रही है। साथ ही भिक्षावृत्ति विमुक्त हुए बच्चों को सरकार प्लेटफार्म दे रही है। स्माइल परियोजना इसी लिए प्रारंभ हुई है। खैर यूपी सरकार ने प्रयास जरुर किया लेकिन ये अभी काफी नहीं है. सरकार को इस समस्या का जड़ निवारण करने के लिए बड़ा कदम उठाना होगा.
बदन का घाव दिखाकर जो अपना पेट भरता है सुना है वो भिखारी जख्म भर जाने से डरता है ||
परदेश में बैठे बेटे के लिए कोई पिता तरसता है ये देखो भिखारी, बेटे के भूख के लिए हर पल मरता है ||
उसके भी बेटे को सारा जहां मिले
बेटी को खुशियों का आसमां मिले
इन उम्मीदों के आंसूं में वो जमीन पर तड़पता है
वो भिखारी है जो हर पल मरता है ||
चेहरे पर थकावट, धुल की जमावट
हाथों में कलम, शिक्षा का मरहम
बेटे को भी मिले आशियाँ,
इसलिए संघर्ष करता है
वो भिखारी है साहब,
जो सड़कों पर हर पल मरता है ||
वक़्त ने अनपढ़ बनाया,
अपमान ने अपराधी
नशे की लत में डूब गया वो,
जिसकी जिन्दगी थी आधी
गुब्बारे बेचने वाला,
गुब्बारे को तरसता है
कलम और फूल ,
सम्मान की भीख का सहारा बनता है
वो भिखारी है साहब,
जो सड़कों पर हर पल मरता है ||