प्रयागराज (Prayagraj) में संगम (Sangam) की रेती पर चल रहे माघ मेले (Magh Mela) में देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालुओं के बीच 22 साल की लुक्रेशिया (Lucrezia) का ध्यान खींच रहा है। इटली (Italy) से आई लुक्रेशिया दिनभर भजन-कीर्तन करती हैं और भारतीय संस्कृति में गहरे विश्वास के साथ सनातन धर्म (Sanatan Dharma) को अपना चुकी हैं। उन्होंने कहा कि महाकुंभ (Mahakumbh) ने उनकी जिंदगी बदल दी और श्रद्धा व आस्था का सैलाब उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था।
विदेशी होते हुए भी भारतीय आध्यात्मिक जुड़ाव:
विदेशी लुक्रेशिया का भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं से गहरा लगाव सबका ध्यान खींच रहा है। उन्होंने अपने गुरु मनमौजी राम पुरी (Manmauji Ram Puri) से दीक्षा ली है और महाकुंभ के दौरान भी प्रयागराज (Prayagraj) आई थीं। संगम लोअर मार्ग (Sangam Lower Path) स्थित नेमिषारण्य आश्रम (Nemisharanya Ashram) में रहकर वह ‘जय सियाराम’ (Jai Sitaram), ‘जय सीताराम’ (Jai Sitaram) और ‘हर हर महादेव’ (Har Har Mahadev) के जयकारों के साथ मंत्रोच्चार सीख रही हैं।
साधना और श्रद्धा का हर कदम:
लुक्रेशिया मेले में साधु-संतों के साथ साधना में लीन हैं। आश्रम में वह हाथ जोड़कर लोगों का अभिवादन करती हैं और भक्ति गीतों व मंत्रों का अभ्यास करती हैं। विदेशी पहनावे के बावजूद उनके विचार और भाव पूरी तरह भारतीय सनातन संस्कृति में रचे-बसे दिखाई देते हैं। उनकी साधना और श्रद्धा मेले में हर तरफ चर्चा का विषय बनी हुई है।
सनातन धर्म ने जीवन को दी नई दिशा:
लुक्रेशिया कहती हैं कि सनातन धर्म (Sanatan Dharma) ने उन्हें अंदरूनी शांति और जीवन को समझने की नई दिशा दी। उन्होंने बताया कि वह तीसरी बार भारत आई हैं। 2024 में उन्होंने राजस्थान (Rajasthan) की यात्रा की, जहां भारतीय संस्कृति और अध्यात्म से उनका गहरा जुड़ाव हुआ। इसके बाद 2025 में महाकुंभ (Mahakumbh) के दौरान प्रयागराज पहुंची और विशाल जनसमूह व भव्य आयोजन देखकर अभिभूत हुईं।
माघ मेले में अनुभव और दीक्षा:
इस साल लुक्रेशिया माघ मेले (Magh Mela) के दौरान अपने गुरु के पास रहकर दीक्षा लेकर सनातन परंपरा को करीब से समझ रही हैं। उन्होंने कहा कि माघ मेले में रहकर उन्हें ध्यान, तप और बिना किसी भौतिक आवश्यकता के सन्यासी जीवन को समझने का अवसर मिला है। यह साल उनके जीवन में एक नई और सकारात्मक शुरुआत लेकर आया है।
विश्वभर में भारतीय संस्कृति का प्रभाव:
लुक्रेशिया का अनुभव यह दर्शाता है कि भारतीय सनातन धर्म और संस्कृति न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी लोगों के जीवन में परिवर्तन और आध्यात्मिक विकास ला सकती है। उनका यह जुड़ाव स्थानीय और विदेशी श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणास्पद साबित हो रहा है।
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