दबंग जाति वालों ने दूल्हे को पीटा, अब गरीब बिटिया के जिन्दगी का क्या?

अहंकार ने सनातन के मूल मन्त्र का तिरस्कार कर जन्म से ऊँची जाति को बनाया, नाकारात्मक सोच और क्रोध से तपते व्यक्ति ने सनातन ही नहीं अपितु भारतीय संविधान के समानता के अधिकार का बहिस्कार कर धर्म युद्ध नहीं बल्कि झूठे अहंकार से पनपे हिंसा को अपनाया और मानवता को एक ऐसा दाग दिया कि प्रभु श्री राम और सबरी के जूठे बेर की कहानी कमज़ोर सी नज़र आती है। जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम के मर्यादाओं से सींचे सनातन के तन पर वार से मर्यादाएं मर जाती हैं। जैसे रोने लगी हो निषादराज और प्रभु श्री राम की तस्वीर, जैसे लग गया हो सबरी की कहानी में अहंकार का तीर! क्या वाकई आज भी है भारत के गाँव गाँव की यही तकदीर?

सिसकियाँ लेती लड़खड़ाती आवाज से माँ कहती है “बारात दरवाजे से लौट गई थी, बेटी ने कहा कि मैं अब जिंदा नहीं रह पाऊंगी। घबराकर हम लोग दौड़े, बारात को रोका। हाथ-पैर जोड़े, इज्जत का हवाला दिया। पुलिसवालों ने भी सुरक्षा की गारंटी दी। लेकिनहमारा गुनाह सिर्फ इतना है कि हम गरीब हैं। इस घटना ने जिंदगीभर का दाग लगा दिया। बिटिया ससुराल में ताने सुनेगी। हमारे दरवाजे पर बारात पिटी। दूल्हे को थप्पड़ मारे गए। ऐसा कही होता है क्या?”

ये दर्द उस माँ का है जिसके एक तरफ दुल्हन बन खड़ी बिटिया है तो दूसरी तरफ़ बीमार पति। ये दास्ताँ उस दलित परिवार की है जिसने संघर्षो से आजादी के 74 साल बाद अपने बच्चों को शिक्षित तो बनाया लेकिन प्रभु श्री राम, सबरी और निषादराज के इस देश मे समानता बहुत अभी दूर है क्योंकि सामने एक अदृश्य असुर है।

आखिर दबंगों ने दलित की बारात पर हमला क्यों किया? इस घटना के पीछे का सच क्या है? दुल्हन के साथ क्या हुआ? पुलिस एक्शन हुआ या नहीं? पढ़िए हमारी विशेष प्रस्तुति “असुर” तीसरा अध्याय…

उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद में शहर से करीब 31 किलोमीटर दूर सरधना के कालिंदी गांव के एक घर में रौनक लगी हुई थी, ये घर दलित समाज के सिपटर का है, सांस की बीमारी से ग्रसित सिपटर के आँखों में एक ही सपना था कि वो अपनी बिटिया को दुल्हन बनाकर विदा करे। आँखों में सपने लिए सिपटर और उनकी पत्नी अंगूरी देवी तैयारियों में जूट गये। उनकी बेटी सोनिया खुश थी, नए ज़माने की लड़की सोनिया को यही लगता था कि अब समाज बदल चूका है, मनुष्य जाति, शिक्षा कर्म और आज़ादी अधिकार है।

1 मार्च 2025, शादी का दिन था; सोनिया के गाँव से करीब 60 किलोमीटर दूर मुज़फरनगर जनपद के भोकरहेड़ी गाँव में लोग सज धज के तैयार थे, बारात निकालने की तैयारी थी, स्वतंत्र भारत की धरती पर दलित समाज का युवक संजीव दूल्हा बनकर तैयार था। बारात में माताएं, बहने और बच्चे भी शामिल थे, बारात मेरठ के सरधना थानाक्षेत्र के कालिंदी गाँव पहुंची, कालिंदी गाँव के बारात घर में सजेधजे बाराती चढ़त की तैयारियां कर ही रहे थे कि अचानक सरधना थाने पर हलचल तेज हो गयी, कुछ लोग घायल अवस्था में मदद की गुहार लगा रहे थे, पुलिस एक्शन मोड में थी और कहानी उसी पुराने मोड़ पर थी।

ये तस्वीर झंकझोर देने वाली थी, चींख से आसमां गूंज रहा था, लाठियों की बौछार उम्र नहीं केवल शरीर देख रही थी। क्या महिला? क्या पुरुष? अपने परिजनों पर लाठी बरसता देखते वो मासूम… थाना 4 किलोमीटर दूर था और पूरा समाज मजबूर था।

स्कंदपुराण में नागरखण्ड के अध्याय 239 के श्लोक 31 में लिखा है कि “जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद्दिज उच्यते” अर्थात् जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म या ज्ञानप्राप्ति या संस्कार से ही वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये जाति नहीं ये वर्ण जो कर्म पर आधारित होता है जन्म पर नहीं, अत: वेदों की भांति मनुस्मृति में भी वर्ण व्यवस्था पर जोर दिया गया है न कि जाति व्यवस्था पर।

लेकिन सैंकड़ों वर्षों से ताकत पर अहंकार हावी होता गया और स्वार्थ और लोभ ने गर्भ में पल रहे शिशु का भविष्य को गुलामी की जंजीरों में कैद कर दिया, धरती पर कर्म से उच्च व्यक्ति अहंकार और लोभ का शिकार होकर बिना अवतार भगवान् बन बैठा, अपने कर्म को जाति घोषित कर अपने अंश को वारदान दे बैठा, अन्य वर्णों पर जाति का दंश लगा, जब उनके अंश ने अधिकार मांगा तो यही विध्वंश करा बैठा…

हमारा समाज विकसित हुआ, शिक्षा ने लोगों को जागरूक किया, लोगों ने वेदों को पढ़ा, पुरानी कथाओं और कहानियों पर शोध किया, समाज को जागरूक किया और आज यही कारण है कि जाति में बदल चुके इस समाज आज इतना बदलाव आ चूका है कि एक बड़ा वर्ग अपने बच्चों की शिक्षा पर जोर दे रहा है और सबको सम्मान की नज़र से देखता है, चाहे वो ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो, वैश्य हो या शुद्र। लेकिन अभी कुछ ऐसे असामाजिक तत्व हैं जो एक स्वस्थ समाज के संस्कार को अपने आमानवीय हरकतों से बदनाम कर रहे हैं, कुछ ऐसा ही इस घटना में हुआ।

बताया जा रहा है कि मेरठ का कालिंदी गाँव क्षत्रिय बाहुल्य है और उसी जगह से दलित लड़के संजीव की बारात निकली, इस दौरान साइड देते वक़्त बारातियों की बस से एक स्कॉर्पियो गाड़ी की मामूली टक्कर हो गयी। फिर क्या था इसी बात पर कार में बैठे 5 युवक भड़क गए। पहले विवाद हुआ, फिर मारपीट शुरू हो गई। बारातियों ने उन्हें समझाया, फिर वह चले गए। वो शराब के नशे में चूर थे और अहंकार माथे का ताज बनकर बैठा हुआ था, संस्कार अपनी परिभाषा बताने को बेकरार था, उन्होंने अपनी संख्या बढाई, कमज़ोर सोच के साथ मजबूत लाठी डंडे लिए और बारातियों पर टूट पड़े। हमलावरों ने बारातियों को दौड़ा दौड़ा कर लाठी डंडों से पीटा, यहां तक कि दूल्हे और महिलाओं को भी नहीं बक्शा, आरोप लगा कि हमलावरों ने दुल्हे के चाचा को पकड़ा और उनके हाथ से पैसों से भरा बैग छीन लिया, उसमे शादी के लिए रखे करीब 2 लाख रूपये थे। वो यहीं रुके उनकी लाठियां महिलाओं के शरीर पर गवाही दे रही थी और उन्होंने दुल्हे को निशाना बनाया और उसके आभूषण को छीन लिया।

दूल्हा संजीव ने कहा, “हमारे साथ मारपीट की, मुझे भी पीटा और कहा कि चमारों की बारात चढ़ने नहीं देंगे. जैसे ही हम बारातघर पहुंचे हम पर हमला कर दिया.” वहीं दूल्हे की बहन राधा रानी ने कहा, हम पहुंचे ही थे, हम पर हमला बोल दिया, हम आधे गाड़ी से उतरे भी नहीं थे तो खिड़की से खींच खींच कर पीटा, उन्होंने दारू पी रखी थी और 10-12 लड़के थे वो, कह रहे थे कि यहां चमारों की बारात नहीं चढ़ेगी, खुद को प्रधान का लड़का बता रहा था।

महिलाओं समेत बदहवास बाराती अपनी जान बचाकर थाने पहुंचे और सुरक्षा की मांग की, सरधना थाने की पुलिस ने घायल बारातियों को इलाज के लिए अस्पताल भिजवाया और जिले के वरिष्ठ अधिकारियों को घटना के बारे में सूचित किया. मामले की गंभीरता को समझते हुए मेरठ के SP देहात राकेश मिश्रा खुद थाने पहुंच गए। मेरठ का थाना सरधना कई घंटे बारातियों से भरा रहा, इसी वजह से शादी की रस्में भी रुकी रहीं और उधर गांव में लड़की पक्ष की सांसे अटकी रही।

शादी में मारपीट के बाद पुलिस की 4 टीमें एक्टिव हुईं। एक टीम घटनास्थल पहुंचकर मामला शांत कराने में जुटी। दूसरी टीम विरोधी पक्ष के लोगों को समझाने पहुंची। तीसरी टीम ने फौरन शादी की पूरी जिम्मेदारी संभालते हुए दूल्हे उसके परिजनों को मनाया। चौथी टीम ने बारात और शादी की जिम्मेदारी संभालते हुए बारात निकलवाई। बाद में अधिकारियों ने बारात के साथ गांव में पुलिस बल भेजा तब जाकर बाराती गांव में बारात चढ़ाने की हिम्मत जुटा पाए।

SP देहात राकेश कुमार मिश्रा का कहना था कि बारात पर हमला नहीं बल्कि गांव के दो पक्षों में गाड़ी को साइड देने की बात पर विवाद हुआ था। इसी कहासुनी में मारपीट हुई। सवाल था कि क्या ये घटना वाकई असमानता से जुड़ी है या मामला केवल दो पक्षों के मारपीट का है? इस बारे में जानने के लिए ख़बरों को खंगाला तो जानकारी सामने आई कि गांव में एक महीने पहले भी ठाकुर बिरादरी के लोगों ने प्रजापति परिवार की बारात के लोगों को पीटा था। तब भी काफी हंगामा हुआ था। तब आरोपियों ने कहा था कि कुम्हारों की बारात नहीं चढ़ने देंगे। मगर बाद में समझौता हो गया।

पुलिस ने यहाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, रात तक पुलिस शादी समारोह में खड़ी रही। फोर्स की मौजूदगी में शादी पूरी हुई। रातभर गांव में फोर्स तैनात रही। सुबह विदाई के बाद फोर्स गांव से हटी। पुलिस ने लड़की के भाई की शिकायत पर 4 लोगों पर मुकदमा दर्ज किया। शादी के दुसरे दिन तरुण सिंह और छोटू सिंह उर्फ निशांत को अरेस्ट कर जेल भेजा गया। अक्षय और सचिन उर्फ काला की तलाश की जा रही है।

दुल्हन के पिता की आँखें नम थी, मन में एक ही सवाल था कि कब तक हमारे बच्चें असमानता का शिकार बनेगें, उनका कहना था कि मैं सांस का मरीज हूं। खड़ा भी नहीं हो सकता, एक साल से बिस्तर पर ही हूं। जैसे-तैसे बेटी को विदा किया। पुलिस की मौजूदगी में फेरे हुए, फिर बेटी विदा हुई। मगर मेहमान घबराकर शनिवार को ही चले जाते, तब क्या होता। डर के कारण गांव के लोग रात में खाना खाने नहीं आए, काफी खाना बेकार हो गया। जिसकी चौखट से बारात लौट जाए उसका हाल क्या होगा, आप खुद समझो। किसी तरह मनाकर उन्हें वापस लाए। मेहमानों में डर था कि वापस जाएंगे तो फिर मारपीट हो जाएगी। वो कह रहे थे यहां मरने नहीं आए थे, शादी करने आए थे।

दुल्हन की माँ अपने दर्द को बयां करते हुए रोने लगती हैं, वो कहती हैं कि पूरा परिवार डरा है। हमारा गुनाह सिर्फ इतना है कि हम गरीब हैं। इस घटना ने जिंदगीभर का दाग लगा दिया। बिटिया ससुराल में ताने सुनेगी। हमारे दरवाजे पर बारात पिटी। दूल्हे को थप्पड़ मारे गए। ऐसा कही होता है क्या?

गाँव के क्षत्रिय समाज में कुछ लोग इस घटना को सही मानते, खबर के अनुसार वो कहते हैं कि गांव में जो हुआ, वो सही नहीं था। सभी को मिलकर रहने का हक है। लेकिन इतना सब कुछ हुआ नहीं है, जिस तरह पेश किया गया। सामान्य कहासुनी हुई थी, बात समझौते से खत्म हो जाती। दोनों ही पक्षों को मिलकर बात करना था। सबको इसी गांव में ही रहना है, तो मिलकर रहो। कुछ भी ऊंची और नीची जाति जैसा नहीं है, सब गलत बातें कही जा रही है।

ख़बरों की पड़ताल करने पर पता चलता है कि ग्राम प्रधान छोटे क्षत्रिय समाज पर लगे आरोप से सहमत नहीं हैं उनका कहना है कि ठाकुरों पर आरोप लग रहे हैं, लेकिन हमने बारात निकलवाई। गांव के इन दबंगों में कुछ लड़के गलत आदतों वाले हैं। जिन्होंने ऐसा किया है। हर महीने इनका काम है इसी तरह लोगों को परेशान करना। मैं पुलिस से शिकायत कर चुका हूं, लेकिन फिर भी वो खुले घूम रहे हैं। चौकी प्रभारी से कई बार शिकायत कर चुके हैं, लेकिन सुनवाई नहीं हुई।

कुछ लोग समाज की तुलना हाथ की उँगलियों से करते हैं, कहते हैं कि जिस तरह ये उँगलियाँ एक सामान नहीं हैं, कुछ ऊँची हैं और कुछ नीची, उसी तरह ये समाज भी है लेकिन वो भूल जाते हैं कि ये उँगलियाँ मनुष्य के शरीर की हैं और समाज सम्पूर्ण मनुष्य से बनता है, एक मनुष्य, एक सम्पूर्ण जीवन में कई रूप में कर्मों को करता है। माता पिता के लिए मासूम बच्चा, भाई के लिए मार्गदर्शक, बहन और पत्नी के लिए रक्षक, पति और बच्चों के रक्षा लिए माँ का देवी रूप, शिक्षक के लिए, छात्र के लिए शिक्षक, सेठ के लिए नौकर, नौकर के लिए सेठ और बच्चों के लिए माता पिता। मनुष्य जन्म से शुद्र है और जीवन के अलग अलग पड़ाव पड़ाव पर वो कर्म से ऊँचा बनता जाता है, वर्तमान समय में एक मनुष्य अपने जीवन काल में कई वर्णों को जीता है, जैसे काम को कितना भी छोटा मानो, नौकरी पाने के लिए जाति भूल जाते हैं, अब व्यापारी केवल वैश्य नहीं होते और नौकर केवल शुद्र नहीं होता। इस भ्रम के असुर को दूर करें, ताकत तो केवल अहंकार का तमाशा है, अच्छे फल के लिए केवल कर्म से आशा है…

By Abhinendra

Journalist

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