1983 के ‘सामूहिक बलात्कार’ में 3 लोग बरी:इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- कोई मेडिकल सबूत नहीं, ‘संदेह का लाभ’  मिला

इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने वर्ष 1983 के एक कथित सामूहिक दुष्कर्म मामले में तीन आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने मामले में पेश किए गए साक्ष्यों और मेडिकल रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोपियों को संदेह का लाभ दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के जरिए साबित करने में सफल नहीं हो पाया।

एफआईआर में देरी पर कोर्ट की टिप्पणी:
जस्टिस अवनीश सक्सेना (Avnish Saxena) की बेंच ने सुनवाई के दौरान पाया कि मामले में एफआईआर दर्ज कराने में पांच दिन की देरी हुई थी और देरी के पीछे कोई स्पष्ट और ठोस कारण सामने नहीं आया। अदालत ने एफआईआर को अस्पष्ट भी बताया, क्योंकि कथित घटना में चार लोगों के शामिल होने की बात कही गई थी, जबकि रिपोर्ट में केवल तीन लोगों के नाम दर्ज थे।

मेडिकल रिपोर्ट में नहीं मिले पर्याप्त साक्ष्य:
हाईकोर्ट ने कहा कि मेडिकल रिकॉर्ड और पैथोलॉजिकल रिपोर्ट अभियोजन पक्ष के आरोपों की पुष्टि नहीं करते। अदालत के अनुसार, कथित पीड़िता उस समय सात महीने की गर्भवती थी। ऐसे में यदि उसके साथ लंबे समय तक हिंसक सामूहिक दुष्कर्म हुआ होता तो गंभीर चिकित्सीय स्थिति सामने आ सकती थी, लेकिन मेडिकल रिपोर्ट में ऐसी कोई स्थिति दर्ज नहीं मिली। रिपोर्ट में शरीर या गुप्तांगों पर चोट के निशान भी नहीं पाए गए।

1984 का फैसला रद्द:
हाईकोर्ट ने मथुरा (Mathura) के एडिशनल सेशन जज द्वारा मई 1984 में सुनाए गए फैसले को रद्द कर दिया। इस मामले में हेतराम, शंकर और भूदत को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत दोषी मानते हुए सात साल की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने अब इन सभी आरोपियों को बरी कर दिया है।

मामले में सामने आई कई विसंगतियां:
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 9 मई 1983 को शिकायतकर्ता जब बकरियां चराकर घर लौटा तो उसका घर अंदर से बंद मिला। दीवार फांदकर अंदर जाने पर उसने कुछ लोगों को भागते हुए देखा। बाद में उसकी पत्नी ने आरोप लगाया कि चार लोगों ने चाकू की नोक पर उसके साथ दुष्कर्म किया। हालांकि अदालत ने पाया कि घटना के बाद दर्ज मेडिकल रिपोर्ट में अभियोजन पक्ष के दावों का समर्थन करने वाले पर्याप्त तथ्य मौजूद नहीं थे।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा:
ट्रायल कोर्ट ने पति, कथित पीड़िता और एक स्वतंत्र गवाह की गवाही के आधार पर आरोपियों को दोषी ठहराया था। अदालत ने यह भी माना था कि पीड़िता के हाथों पर चोटें टूटी हुई चूड़ियों के कारण हो सकती हैं। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी को घटनास्थल से टूटी हुई चूड़ियां नहीं मिलीं और डॉक्टर ने भी ऐसी चोटों का उल्लेख नहीं किया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला:
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के ‘लल्लीराम बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ फैसले का हवाला भी दिया। अदालत ने कहा कि दुष्कर्म मामलों में केवल चोट का न होना आरोप को गलत साबित नहीं करता, लेकिन जब गवाही और परिस्थितियों में विरोधाभास हो तो मेडिकल साक्ष्य महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इसी आधार पर अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों पर पूर्ण विश्वास नहीं किया जा सकता।


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