नई दिल्ली। फर्जी वोटर आई कार्ड और चुनाव में फर्जी मतदान रोकने के लिए चुनाव आयोग जल्द ही पैन कार्ड की तरह ही मतदाता पहचान पत्र को आधार से जोड़ेगा। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की अध्यक्षता में मंगलवार को कानूनी और तकनीकी विशेषज्ञों की उच्चस्तरीय बैठक हुई उसके बाद चुनाव आयोग ने यह एलान किया।
करीब तीन घंटे की मैराथन बैठक के बाद ईपीआईसी और आधार को जल्द से जल्द जोड़ने के लिए जरूरी कदम उठाने पर सहमति बनी है। इन दोनों महत्वपूर्ण कार्ड के जुड़ जाने से न सिर्फ फर्जी मतदाताओं की पहचान होगी, बल्कि फर्जी मतदान पर भी अंकुश लग सकेगा। इसके लिए आयोग जल्द ही भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण एर्ग (ईडीएआई) के अधिकारियों व तकनीकी विशेषज्ञों के साथ काम शुरू करेगा। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि आखिर यह संभव कैसे होगा?
आयोग ने कहा है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह संविधान के अनुच्छेद 326 व जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 23(4), 23(5) और 23(6) पर आधारित है। इसके लिए आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के पुराने निर्णयों का भी हवाला दिया। आयोग ने साफ किया कि आधार सिर्फ पहचान का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं। जबकि, मतदाता पहचान पत्र सिर्फ देश के नागरिकों को जारी किया जाता है। आयोग ने बीते दिनों दोनों कार्ड जोड़ने की योजना शुरू की थी, पर अभी तक ईपीआईसी को आधार कार्ड से जोड़ना बाध्यकारी नहीं, स्वैच्छिक है।
अप्रैल तक मांगे सुझाव:
प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए 31 मार्च से पहले आयोग पंजीकरण अधिकारियों, जिला व मुख्य चुनाव अधिकारियों के साथ सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाने जा रहा है। आयोग ने सभी राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों से 30 अप्रैल तक सुझाव भी मांगे हैं।
आयोग का फैसला ऐसे समय आया है, जब एक जैसे ईपीआईसी नंबर पर सियासी घमासान मचा है। विवाद के बाद आयोग ने तीन महीने में समान नंबर वाले ईपीआईसी के लिए नए नंबर जारी करने की घोषणा की थी। आयोग ने कहा था, एक जैसे नंबर का अर्थ ईपीआईसी का फर्जी होना नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट पहले रोक लगा चुका है
दरअसल ईपीआईसी को आधार से जोड़ने का प्रयास पहले भी हो चुका है। आयोग ने मार्च, 2015 से अगस्त, 2015 तक राष्ट्रीय मतदाता सूची शुद्धिकरण कार्यक्रम के तहत 30 करोड़ ईपीआईसी को आधार कार्ड से जोड़ा था। इस दौरान आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के 55 लाख लोगों के नाम छंटने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो उसने प्रक्रिया रोक दी थी।
आयोग ने कहा कि यह प्रक्रिया संविधान सम्मत तरीके से पूरी की जाएगी, जो संविधान, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका के निर्णय के अनुरूप होगी। तकनीकी विशेषज्ञों के बीच परामर्श जल्द होगा।
आसान नहीं आधार के साथ वोटर आईडी का लिंक!
आधार कार्ड को वोटर आईडी से जोड़ना आसान नहीं है। चुनावी व्यवस्था पर जनता का भरोसा कायम रखने के लिए इसका फूलप्रूफ बंदोबस्त करना होगा। आधार कार्ड की डुप्लेकेसी से इसका दुरुपयोग होने की आशंका बनी रहेगी। चुनाव आयोग की हर वोट वैध होने की मंशा पर डुप्लीकेसी पानी फेर सकता है।
आयोग को यह भी देखना होगा कि साइबर अपराधियों से इसे कैसे बचाया जाए। आधार कार्ड का पूरा डाटा चुनाव आयोग को उपलब्ध कराने के बाद सुरक्षित रखना भी बड़ी चुनौती बन सकता है। आयोग को इसके लिए सुरक्षित प्रणाली विकसित करनी होगी।
राजनीतिक दल इसे लोगों की निजता के हनन से भी जोड़ते रहे हैं। यही नहीं, आधार को वोटर आईडी से लिंक करने पर बड़ी संख्या में वोटरों के नाम मतदाता सूची से गायब होने की आशंका भी जताते रहे हैं। आधार के डाटाबेस में कमियां भी रोड़ा बन सकती हैं। इसका डाटा लीक होने से राजनीतिक दलों द्वारा गलत इस्तेमाल का खतरा भी बना रहेगा।
