राज्यसभा सांसद डॉ. संगीता बलवंत ने वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने के अवसर पर सदन में स्वरचित कविताओं के माध्यम से देशभक्ति और मातृभूमि के प्रति सम्मान व्यक्त किया। सांसद ने कहा कि वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता और स्वतंत्रता की प्रतीक है। उन्होंने सदन में इस संदेश को जोरदार और भावपूर्ण तरीके से रखा।
स्वरचित कविताओं से व्यक्त किया देशभक्ति भाव:
डॉ. संगीता बलवंत ने कहा, “मातृभूमि को शीश झुकाकर निस दिन वंदन हो जननी का। वंदे मातरम के गुंजन से नित अभिनंदन हो जननी का।” सांसद ने बताया कि वंदे मातरम के शब्द ब्रिटिश साम्राज्य के विरोध में लोगों में साहस भरते थे और स्वतंत्रता की भावना को प्रबल करते थे।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का योगदान:
सांसद ने सदन में कहा कि 7 नवम्बर 1875 को कार्तिक शुक्ल नवमी के दिन बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम लिखा, जो केवल एक गीत नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत की भविष्यवाणी था। भारत माता को उन्होंने धन, ज्ञान और शक्ति का प्रतीक बताते हुए इसे भारतीय आत्मा का अविभाज्य हिस्सा बनाया।
इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम में वंदे मातरम:
सांसद ने बताया कि वंदे मातरम स्वतंत्रता आंदोलन में युवाओं और नागरिकों को अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा करने का प्रतीक रहा। 1905 के बंग-भंग आंदोलन और 1906 के बारिसाल के विद्रोह में इस गीत ने हजारों लोगों को लाठीचार्ज और दमन के बावजूद एकजुट किया। नेताजी सुभाषचंद्र बोस और आजाद हिंद फौज में यह नारा गूंजा और स्वतंत्रता सेनानियों के साहस और उत्साह का स्रोत बना।
भाषा, क्षेत्र और राष्ट्रव्यापी प्रभाव:
रवींद्रनाथ टैगोर ने 1896 में वंदे मातरम को धुन में पिरोया और तमिलनाडु में सुब्रमण्यम भारती जी ने इसका तमिल अनुवाद किया। पंजाब में क्रांतिकारियों ने इसे गाकर ब्रिटिश राज को चुनौती दी। यह गीत भाषा और क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर उठकर पूरे देश में गुंजा और भारतीयों के मन में देशभक्ति का ज्वलंत संदेश फैलाया।
वंदे मातरम का सांस्कृतिक महत्व:
सांसद ने कहा कि वंदे मातरम केवल गीत नहीं, बल्कि भारत के पुनर्जन्म और संस्कृति का मंत्र है। यह गीत हमें हरे-भरे खेतों, नदियों और समृद्ध संस्कृति की याद दिलाता है और मातृभूमि के प्रति सम्मान और सेवा की प्रेरणा देता है। महर्षि अरविंद जी ने इसे भारत के पुनर्जन्म का मंत्र कहा है।
नागरिकों और युवा पीढ़ी के लिए संदेश:
सांसद ने नागरिकों, विद्यार्थियों और युवाओं से अपील की कि वे वंदे मातरम के संदेश को केवल सुनने तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने जीवन में उतारें और देशभक्ति के आदर्शों को अपने कार्यों में अपनाएं।
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