शुक्र है राम ने किसी अल्पसंख्यक को नहीं मारा वोटर लिस्ट गलती विवाद पर यूपी चीफ इलेक्शन ऑफिसर का जवाब
उत्तर प्रदेश में विधान परिषद चुनाव की मतदाता सूची में अजीबोगरीब नाम दर्ज होने का मामला अब राजनीतिक बहस के साथ सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बन गया है। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने मतदाता सूची में ‘राम ने यादव को मारा’ नाम दर्ज होने पर चुनाव आयोग से सवाल किया था। इसके जवाब में उत्तर प्रदेश चुनाव आयोग ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल ‘एक्स’ पर तंज भरी टिप्पणी की। आयोग के इस जवाब के बाद उसकी भाषा और मतदाता सूची में हुई गलतियों को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
चुनाव आयोग ने संजय सिंह के सवाल पर दिया जवाब:
उत्तर प्रदेश चुनाव आयोग ने रविवार आधी रात 12:24 बजे ‘एक्स’ पर पोस्ट कर मतदाता सूची में नामों की गड़बड़ी को लेकर प्रतिक्रिया दी। आयोग ने एक अन्य अजीबोगरीब नाम ‘राम ने शर्मा को मारा’ का जिक्र करते हुए कहा कि कंप्यूटर या सॉफ्टवेयर जातिवादी नहीं होता। आयोग ने गलती स्वीकार करते हुए व्यंग्यात्मक अंदाज में टिप्पणी की कि गलती होने के दौरान भी जातीय भेदभाव नहीं हुआ। पोस्ट में यह भी कहा गया कि अगर किसी अल्पसंख्यक का नाम इस तरह सामने आता, तो सांप्रदायिक होने का आरोप भी लगता।
संजय सिंह ने जातीय भेदभाव को लेकर उठाए थे सवाल:
दरअसल, आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने मतदाता सूची में ‘राम ने यादव को मारा’ नाम दर्ज होने पर सवाल उठाए थे। उन्होंने राजेश यादव नाम के व्यक्ति का वीडियो ‘एक्स’ पर साझा करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से पूछा था कि इस तरह का नाम यादव समुदाय से ही संबंधित क्यों दिखाई दे रहा है। उन्होंने सवाल किया था कि सूची में सिंह, पाठक, अस्थाना, शर्मा, राय या बिष्ट जैसे अन्य उपनामों के साथ इस तरह की प्रविष्टियां क्यों नहीं दिख रही हैं। संजय सिंह ने यह भी पूछा था कि क्या कंप्यूटर जातिवादी है या किसी राजनीतिक दल के एजेंडे के तहत काम किया जा रहा है।
चुनाव आयोग ने पहले भी दी थी तकनीकी गलती की सफाई:
चुनाव आयोग ने इससे पहले 22 अक्टूबर को मतदाता सूची में नामों की गड़बड़ी को लेकर सफाई दी थी। आयोग ने ‘एक्स’ पर बताया था कि उत्तर प्रदेश में विधान परिषद चुनाव के लिए मतदाता सूची में नाम जोड़ने की प्रक्रिया इस बार पहली बार ऑनलाइन की गई। इसी दौरान कुछ स्थानों पर गलतियां सामने आईं।
आयोग के मुताबिक, मतदाता सूची में दर्ज 14.81 लाख नामों में से केवल 158 नाम ऐसे मिले, जो पढ़ने में असामान्य लग रहे थे। आयोग ने इसकी वजह बताते हुए कहा था कि कंप्यूटर को अंग्रेजी में लिखे नामों को हिंदी में उसी ध्वनि के आधार पर लिखना था, लेकिन कुछ मामलों में उसने नाम का अर्थ निकालकर उसका अनुवाद कर दिया।
उदाहरण के तौर पर आयोग ने बताया था कि किसी व्यक्ति का नाम ‘रामहित यादव’ था। टाइप करते समय यदि इसकी वर्तनी ‘Ram hit Yadav’ हो गई, तो सॉफ्टवेयर ने उसे नाम के रूप में लिखने के बजाय उसका अर्थ निकाल दिया और हिंदी में ‘राम ने यादव को मारा’ जैसा वाक्य बन गया।
मतदाता सूची में कई असामान्य नाम आने की शिकायतें:
विधान परिषद चुनाव से पहले मतदाता सूची में गड़बड़ी की शिकायतें सामने आई थीं। सूची में कुछ ऐसे नाम और पते दर्ज होने का दावा किया गया, जो सामान्य नामों के बजाय वाक्य जैसे दिखाई देते थे। इनमें ‘टक्कर मारना’ और ‘राम ने शर्मा को मारा’ जैसी प्रविष्टियां भी शामिल थीं।
सोशल मीडिया पर इलाहाबाद-झांसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्जनों नाम फर्जी होने के दावे किए गए थे। इन दावों की पड़ताल के लिए वायरल सूचियों का संबंधित जिले की विधान परिषद चुनाव की मतदाता सूची से मिलान किया गया। इस दौरान कुछ प्रविष्टियों में गड़बड़ी सामने आने की बात कही गई।
वायरल सूची में शामिल नामों पर भी उठे सवाल:
वायरल सूची में भाग संख्या 73 के क्रमांक 420 पर ‘राम ने मारा यादव को’ नाम और पिता के नाम के स्थान पर ‘फूल चंद्र यादव’ दर्ज होने का दावा किया गया था। भाग संख्या 69 के क्रमांक 351 पर नाम और पिता, दोनों के स्थान पर ‘टक्कर मारना’ लिखा होने की बात कही गई।
इसी तरह भाग संख्या 133 के क्रमांक 768 पर ‘रवि शर्मा’ नाम के साथ पिता के नाम के स्थान पर ‘राम ने शर्मा को मारा’ दर्ज होने का दावा किया गया। सूची में भाग संख्या 189 के क्रमांक 1034 पर ‘मूर्ख काली देवी’, भाग संख्या 15 के क्रमांक 82 पर ‘मोहम्मद पागल रेहान’ और भाग संख्या 81 के क्रमांक 696 पर ‘नरेंद्र यादव’ के साथ पिता के नाम के स्थान पर ‘बी कॉम’ लिखे होने की प्रविष्टियां भी साझा की गई थीं।
झांसी की सूची की जांच में सामने आया अंतर:
वायरल सूची में दावा किया गया था कि झांसी के भाग संख्या 252 के क्रमांक 566 पर ‘खालिद अली ने कहा’ नाम का मतदाता दर्ज है। हालांकि, दिसंबर 2025 में अपडेट हुई आधिकारिक मतदाता सूची की जांच में संबंधित भाग में कुल 537 मतदाता ही मिले। इस कारण क्रमांक 566 की प्रविष्टि वहां मौजूद नहीं मिली।
दूसरी ओर, भाग संख्या 133 के क्रमांक 768 पर नाम से जुड़ी बड़ी गड़बड़ी सामने आने की बात कही गई। इन तथ्यों के आधार पर वायरल सूची में किए गए सभी दावों को एक जैसा मानने के बजाय अलग-अलग प्रविष्टियों की आधिकारिक सूची से जांच किए जाने की जरूरत सामने आई।
सपा-कांग्रेस ने उठाए सवाल, जांच के आदेश:
मतदाता सूची में गड़बड़ी के मामले को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे। कांग्रेस ने तंज कसते हुए पूछा था कि चुनाव आयोग शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की मतदाता सूची तैयार कर रहा है या बेतुके वाक्यों की प्रतियोगिता चला रहा है। पार्टी ने यह भी सवाल उठाया था कि क्या ऐसी गलतियों से मतदाताओं को मतदान से वंचित करने की कोशिश हो रही है।
मामले के सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने इलाहाबाद-झांसी निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी और झांसी के कमिश्नर को वायरल सूचियों की जांच के निर्देश दिए थे। नवदीप रिणवा के मुताबिक, पूरे प्रदेश में करीब 80 ऐसे नाम सामने आए, जिनमें गड़बड़ी पाई गई। उन्होंने बताया था कि इन गलतियों के कारणों को लेकर भी जवाब मांगा गया है और रिपोर्ट मिलने के बाद कार्रवाई की जाएगी।
11 सीटों पर हुआ था विधान परिषद चुनाव:
उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की 11 सीटों के लिए शुक्रवार, 23 अक्टूबर को मतदान हुआ था। इनमें पांच स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की सीटें लखनऊ, वाराणसी, आगरा, मेरठ और इलाहाबाद-झांसी की थीं। वहीं, छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की सीटें लखनऊ, आगरा, वाराणसी, मेरठ, बरेली-मुरादाबाद और गोरखपुर-फैजाबाद की थीं। चुनाव के नतीजे 27 अक्टूबर को घोषित किए जाने हैं।
सोशल मीडिया पर आयोग की भाषा को लेकर नाराजगी:
मतदाता सूची में नामों की गड़बड़ी पर चुनाव आयोग की तंज भरी पोस्ट के बाद ‘एक्स’ पर यूजर्स ने नाराजगी जताई। कुछ यूजर्स ने सवाल किया कि आयोग का आधिकारिक हैंडल है या पैरोडी अकाउंट। लोगों ने कहा कि मतदाता सूची जैसी गंभीर समस्या पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी करने के बजाय तकनीकी खामियों को दूर करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
सोशल मीडिया पर आयोग की भाषा को गैर-जिम्मेदाराना बताते हुए यह भी कहा गया कि एक संवैधानिक संस्था से अपनी गलती स्वीकार करने के साथ उसमें सुधार की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में मतदाता सूची में हुई गड़बड़ियों की जांच, उनके कारणों का पता लगाना और आवश्यक सुधार करना इस विवाद के प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं।
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