Uttar Pradesh की 57 हजार 695 ग्राम पंचायतों में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त होने जा रहा है, लेकिन पंचायत चुनाव की तारीख को लेकर अब तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। ऐसे में पंचायतीराज विभाग ने ग्राम पंचायतों के कामकाज को प्रभावित होने से बचाने के लिए प्रशासक की नियुक्ति अथवा प्रशासनिक समिति के गठन का प्रस्ताव सरकार को भेजा है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस प्रस्ताव को कैबिनेट से मंजूरी मिल सकती है।

कुछ समय पहले पंचायतीराज मंत्री Om Prakash Rajbhar ने पंचायत चुनाव 12 जुलाई तक कराए जाने की बात कही थी, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए चुनाव प्रक्रिया में देरी की संभावना जताई जा रही है।
प्रशासक नियुक्ति की तैयारी:
पंचायतीराज विभाग के निदेशक अमित सिंह के अनुसार, ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। ऐसे में शासन स्तर से प्रशासक नियुक्त किए जाएंगे। विभागीय व्यवस्था के तहत ग्राम पंचायत सहायकों को प्रशासक बनाए जाने का प्रावधान है। जब तक पंचायत चुनाव नहीं होते, तब तक वही ग्राम पंचायतों का कामकाज संभालेंगे।
बताया जा रहा है कि पंचायतों में प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखने और विकास कार्यों को जारी रखने के उद्देश्य से यह कदम उठाया जा रहा है। हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर ग्राम प्रधान संगठनों में अलग-अलग राय देखने को मिल रही है।
प्रशासनिक समिति गठन की मांग:
Rashtriya Panchayati Raj Gram Pradhan Sangathan के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश सिंह ने बताया कि संगठन के प्रतिनिधिमंडल ने 20 अप्रैल को मुख्यमंत्री Yogi Adityanath से मुलाकात कर प्रशासनिक समिति गठित करने की मांग रखी थी। इसके बाद 16 मई को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष Pankaj Chaudhary से भी इस विषय पर बातचीत की गई।
संगठन के उपाध्यक्ष ललित कुमार शर्मा ने कहा कि पंचायतीराज एक्ट 1947 की धारा-12 की उपधारा 3A के तहत सरकार या जिलाधिकारी प्रशासक अथवा प्रशासनिक समिति का गठन कर सकते हैं। प्रशासनिक समिति में ग्राम प्रधान या सरकार द्वारा तय अध्यक्ष के साथ वार्ड सदस्य और ग्राम पंचायत सहायक को भी सदस्य बनाया जा सकता है।
प्रशासक नियुक्ति पर उठे सवाल:
ग्राम प्रधान संगठनों का कहना है कि सरकारी कर्मचारियों को प्रशासक नियुक्त करने से ग्रामीण क्षेत्रों में व्यावहारिक कठिनाइयां बढ़ सकती हैं। संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश सिंह का कहना है कि बाहरी अधिकारी स्थानीय सामाजिक व्यवस्था और ग्रामीण जरूरतों को बेहतर ढंग से नहीं समझ पाते हैं।
उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2021 में प्रशासकों द्वारा करीब चार हजार करोड़ रुपए खर्च किए गए थे, लेकिन उसका स्पष्ट हिसाब-किताब सामने नहीं आया। इसके अलावा, ग्रामीणों के सामाजिक और व्यक्तिगत मामलों में भी प्रशासक उतनी सक्रिय भूमिका नहीं निभाते, जितनी निर्वाचित ग्राम प्रधान निभाते हैं।
संगठन का यह भी कहना है कि ग्राम प्रधान गांव के लोगों से सीधे जुड़े होते हैं और स्थानीय परिस्थितियों को समझते हैं। वहीं, चुनाव के दौरान भी ग्राम प्रधान शांति व्यवस्था बनाए रखने और मतदान प्रतिशत बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
चुनाव में देरी की तीन बड़ी वजहें:
पंचायत चुनाव में देरी के पीछे कई प्रशासनिक और कानूनी कारण बताए जा रहे हैं। पहली वजह पंचायत चुनाव की वोटर लिस्ट का अंतिम प्रकाशन अभी तक नहीं होना है। ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई तक है, जबकि वोटर लिस्ट का अंतिम प्रकाशन 10 जून को प्रस्तावित है।
दूसरी वजह पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण तय करने की प्रक्रिया है। सरकार ने इसके लिए ओबीसी आयोग गठन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। आयोग अपनी रिपोर्ट तीन से छह महीने के भीतर देगा, जिसके बाद आरक्षण का निर्धारण किया जाएगा।
तीसरी वजह यह मानी जा रही है कि सरकार पंचायत चुनाव को विधानसभा चुनाव के बाद कराने पर विचार कर रही है। बताया जा रहा है कि राजनीतिक दल भी सिद्धांत रूप से इस पर सहमत हैं। हालांकि, यह मामला फिलहाल Allahabad High Court में विचाराधीन है।
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