उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में आपराधिक मामलों की प्रक्रिया को लेकर बड़ा बदलाव लागू किया गया है। नए नियमों के अनुसार अब कुछ विशेष श्रेणियों के मामलों में पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं करेगी। इन मामलों में पहले संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष वाद दायर करना अनिवार्य होगा, जिसके बाद न्यायालय के निर्देश पर ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। इस निर्णय का असर दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, चेक बाउंस, मानहानि, पशु क्रूरता, पर्यावरण और प्रदूषण, उपभोक्ता मामलों, बाल श्रम, वन्यजीव संरक्षण, बौद्धिक संपदा और बीमा अधिनियम जैसे कुल 31 प्रकार के मामलों पर पड़ेगा।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद बदली प्रक्रिया:
इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) की लखनऊ पीठ (Lucknow Bench) ने अनिरुद्ध तिवारी बनाम यूपी सरकार मामले की सुनवाई के दौरान 25 फरवरी को महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। न्यायालय ने बीएनएस (BNS) की धारा 82 के तहत सीधे एफआईआर दर्ज किए जाने पर आपत्ति जताई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बीएनएसएस (BNSS), 2023 की धारा 219 के अनुसार, धारा 81 से 84 के अंतर्गत आने वाले अपराधों में तब तक संज्ञान नहीं लिया जाएगा जब तक पीड़ित व्यक्ति स्वयं शिकायत दर्ज न करे।
डीजीपी ने जारी किए सख्त निर्देश:
इस निर्णय के अनुपालन में कार्यवाहक डीजीपी (DGP) राजीव कृष्ण (Rajeev Krishna) ने सभी जिलों के पुलिस अधिकारियों को निर्देश जारी किए हैं कि वे नए नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करें। अधिकारियों को स्पष्ट किया गया है कि किसी भी प्रकार की लापरवाही या उल्लंघन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की जाएगी।
क्या है नई शिकायत प्रक्रिया:
नए नियमों के तहत अब इन मामलों को शिकायत आधारित प्रक्रिया में रखा गया है। इसका मतलब है कि पुलिस स्वतः संज्ञान लेकर एफआईआर दर्ज नहीं करेगी। शिकायतकर्ता को पहले मजिस्ट्रेट की अदालत में प्रार्थना पत्र देना होगा। यदि मजिस्ट्रेट मामले को प्रथम दृष्टया गंभीर मानते हैं, तभी पुलिस को एफआईआर दर्ज करने और जांच शुरू करने का आदेश मिलेगा। इससे प्रारंभिक स्तर पर न्यायिक जांच सुनिश्चित होगी और मामलों की गंभीरता का मूल्यांकन पहले ही चरण में हो सकेगा।
पुलिस की भूमिका में बढ़ेगी जवाबदेही:
इस नई व्यवस्था के लागू होने के बाद पुलिस की भूमिका और अधिक जिम्मेदार हो जाएगी। पुलिस को अब न्यायालय के आदेश के बाद ही कार्रवाई करनी होगी, जिससे मनमाने तरीके से एफआईआर दर्ज करने की संभावना कम होगी। इससे जांच प्रक्रिया अधिक संतुलित और व्यवस्थित होने की उम्मीद जताई जा रही है।
न्यायिक पारदर्शिता में होगा सुधार:
इस फैसले से न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है। इससे झूठे या अनावश्यक मामलों में कमी आएगी और वास्तविक मामलों को प्राथमिकता मिल सकेगी। साथ ही, न्यायालय की निगरानी में प्रक्रिया होने से निष्पक्षता भी सुनिश्चित होगी।
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