सम्भल दंगे पर न्यायिक आयोग की गोपनीय रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपी, बयानबाज़ी तेज़



लखनऊ/सम्भल। 24 नवंबर 2024 को सम्भल में मस्जिद सर्वे के दौरान भड़की हिंसा की जांच के लिए गठित न्यायिक आयोग ने अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंप दी। आयोग में इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस देवेंद्र कुमार अरोड़ा, पूर्व IAS अमित मोहन और पूर्व IPS अरविंद कुमार जैन शामिल थे। आयोग ने कई महीने तक घटनाओं और दस्तावेज़ों की छानबीन कर रिपोर्ट तैयार की। यह रिपोर्ट फिलहाल गोपनीय बताई गई है, लेकिन सूत्रों और राजनीतिक हलकों में इसके कई अहम बिंदुओं पर चर्चा तेज़ है।

रिपोर्ट के सूत्रों से सामने आए तथ्य

सूत्रों के अनुसार, रिपोर्ट में सम्भल की बदलती जनसंख्या संरचना पर गंभीर टिप्पणी की गई है। आज़ादी के समय सम्भल की आबादी में करीब 55% मुस्लिम और 45% हिंदू थे, लेकिन वर्तमान में मुस्लिम आबादी 85% तक पहुँच गई है और हिंदुओं की संख्या घटकर महज 15-20% रह गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 1947 से 2019 तक सम्भल में 15 बड़े दंगे हुए और इनमें अधिकतर बार हिंदू समुदाय को निशाना बनाया गया।

जांच में यह भी सामने आया है कि हाल की हिंसा पूर्व-नियोजित थी और इसमें बाहरी उपद्रवियों को बुलाया गया था। हालांकि पुलिस की तत्परता और भारी मौजूदगी के कारण बड़े स्तर पर नुकसान टल गया। रिपोर्ट में सम्भल में अवैध हथियारों और नशे के कारोबार के फलने-फूलने का भी ज़िक्र है। इसके अलावा कई आतंकी संगठनों की सक्रियता और मौलाना आसिम उर्फ़ सना-उल-हक़ का नाम भी सामने आया है, जिन्हें अमेरिका आतंकवादी घोषित कर चुका है। हरिहर मंदिर विवाद को भी रिपोर्ट में महत्वपूर्ण तौर पर शामिल किया गया है।

भाजपा और सपा आमने-सामने

रिपोर्ट पर भाजपा और सपा में तीखी बयानबाज़ी देखने को मिली। भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा – “संभल रिपोर्ट से सच सामने आया है। देशभर में जनसंख्या असंतुलन के प्रयास हो रहे हैं। सम्भल में हिंदुओं की आबादी लगातार कम हुई है। जहां सुरक्षा का एहसास नहीं होता, वहां से पलायन होता है और डेमोग्राफी बदल जाती है।”

वहीं सपा प्रवक्ता फ़खरुल हसन चांद ने इस रिपोर्ट को राजनीतिक बताया। उन्होंने कहा – “फैसला पहले से लिखा रखा है, तो सफाई देने का क्या फायदा। भाजपा सरकार सिर्फ ध्यान भटकाने के लिए ऐसी गोपनीय रिपोर्ट जारी करती है। जनता सब जानती है कि इन रिपोर्टों का इस्तेमाल सिर्फ माहौल बनाने के लिए किया जाता है।”

हिन्दू संगठनों और संतों की प्रतिक्रिया

अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शिशिर चतुर्वेदी ने दावा किया कि रिपोर्ट ने हिंदू पक्ष की बात को सही साबित किया है। उन्होंने कहा – “हरिहर मंदिर को लेकर हिंदू पक्ष के दावों के सबूत रिपोर्ट में दर्ज हैं। सर्वे के दौरान हमारे अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन पर हमला किया गया था। विदेशी हथियार बरामद हुए। 1947 में सम्भल की हिंदू आबादी 45% थी, जो अब घटकर 15% रह गई है। हिन्दुओं को डराकर, धमकाकर और बहन-बेटियों की इज्जत लूटकर पलायन कराया गया। अब सरकार को कठोर कार्रवाई करनी चाहिए।”

हनुमानगढ़ी के संत राजू दास ने भी रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए कहा – “संभल में कभी हिंदुओं की आबादी 45% थी, लेकिन आज केवल 15% बची है। यह आंख खोलने की बात है उन लोगों के लिए, जो गंगा-जमुनी तहजीब और हिंदू-मुस्लिम एकता की बातें करते हैं। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि किस तरह हिन्दुओं को प्रताड़ित कर पलायन कराया गया। दुर्भाग्य है कि जो लोग हिंदू-मुस्लिम एकता का ढोल पीटते हैं, वे इस पर मौन हैं। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद और संदेशखाली की तरह यूपी के सम्भल में भी वही स्थिति है। जहां मुसलमान बहुसंख्यक होते हैं, वहां हिंसा और आतंक फैलाकर हिंदुओं को पलायन के लिए मजबूर कर दिया जाता है।”

सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया

रिपोर्ट पर सरकार ने फिलहाल कोई विस्तृत टिप्पणी नहीं की है। प्रमुख सचिव गृह संजय प्रसाद ने कहा – “रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद ही सारी जानकारी सामने आएगी।” सरकार का रुख साफ है कि रिपोर्ट पर कार्रवाई तभी तय होगी जब इसकी गहन समीक्षा हो जाएगी।

गोपनीयता पर उठे सवाल

आयोग ने रिपोर्ट को “गोपनीय” बताते हुए केवल मुख्यमंत्री को सौंपी है। हालांकि रिपोर्ट के बिंदु मीडिया और राजनीतिक गलियारों में लगातार चर्चा का विषय बने हुए हैं। विपक्ष सवाल उठा रहा है कि आखिर जब रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता तो इसके कुछ अंश बाहर कैसे आ रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि सूचना विभाग यह तय करता है कि जनता तक क्या पहुँचाना है और क्या छिपाना है।

कुल मिलाकर, सम्भल दंगे पर न्यायिक आयोग की रिपोर्ट ने प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ भाजपा और हिन्दू संगठन इसे “सच सामने आने” की बात कह रहे हैं, तो दूसरी ओर विपक्ष इसे मुद्दों से ध्यान भटकाने की कवायद बता रहा है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद क्या कदम उठाती है और क्या इसे सार्वजनिक किया जाता है या नहीं।

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