7 नवंबर 2025 को Rampur में Akhilesh Yadav, Azam Khan से मुलाकात करने पहुंचे थे। जेल से रिहाई के बाद हुई इस मुलाकात में आजम खान का रुख कुछ तल्ख नजर आया। जब उनसे पार्टी के साथ रिश्तों को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने साफ संकेत दिए कि उनके और पार्टी के बीच दूरी बढ़ रही है, हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यह रिश्ता आसानी से खत्म होने वाला नहीं है।
बयान के बाद बढ़ी सियासी हलचल:
आजम खान के बयान के बाद यह स्पष्ट हो गया कि रामपुर की राजनीति में किसी अन्य नेतृत्व की एंट्री उन्हें सहज नहीं लग रही है। इस बीच 2 मार्च को सपा नेतृत्व ने बड़ा कदम उठाते हुए Surendra Sagar को प्रदेश सचिव बना दिया। यह निर्णय ऐसे समय लिया गया जब आजम खान सक्रिय राजनीति में मौजूद नहीं हैं, जिससे इस फैसले के कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं।
समर्थकों में नाराजगी का माहौल:
सुरेंद्र सागर को प्रदेश सचिव बनाए जाने के बाद रामपुर में आजम समर्थकों के बीच नाराजगी देखने को मिल रही है। उनका मानना है कि आजम खान लंबे समय से पार्टी के प्रमुख चेहरे रहे हैं, लेकिन मौजूदा हालात में उन्हें अपेक्षित महत्व नहीं मिल रहा है। यह असंतोष पार्टी के भीतर बदलते समीकरणों की ओर इशारा करता है।
2027 चुनाव को लेकर रणनीति:
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह फैसला 2027 विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए लिया गया हो सकता है। सपा का फोकस पीडीए (PDA) फॉर्मूले पर है, जिसमें पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग को साधने की कोशिश की जा रही है। सुरेंद्र सागर को बड़ी जिम्मेदारी देकर पार्टी इन वर्गों में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है।
आजम की गैरमौजूदगी में विकल्प की तलाश:
आजम खान फिलहाल कानूनी मामलों के चलते सक्रिय राजनीति से दूर हैं और आगामी चुनावों में उनकी भूमिका को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। ऐसे में सपा रामपुर में एक वैकल्पिक नेतृत्व तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। सुरेंद्र सागर को जिम्मेदारी देना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
बसपा वोट बैंक पर नजर:
सुरेंद्र सागर का जुड़ाव पहले Bahujan Samaj Party से रहा है। ऐसे में उनकी पकड़ दलित और कुछ अन्य वर्गों में मानी जाती है। सपा उनके माध्यम से बसपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है, ताकि चुनावी समीकरण अपने पक्ष में किए जा सकें।
स्थानीय गुटबाजी को संतुलित करने की कोशिश:
रामपुर में सपा के भीतर पहले से ही गुटबाजी की स्थिति रही है। ऐसे में बाहर से आए नेता को जिम्मेदारी देकर पार्टी पुराने गुटों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। इससे संगठन में नए समीकरण बन सकते हैं।
आजम खान का पुराना दबदबा:
एक समय ऐसा था जब रामपुर की राजनीति में आजम खान का प्रभाव बेहद मजबूत था। उनके प्रभाव के चलते प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों में उनकी अहम भूमिका मानी जाती थी। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में उनकी गैरमौजूदगी ने सपा को नई रणनीति अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है।
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