आध्यात्मिक चेतना से ही संभव है पूर्ण स्वास्थ्य : ओम श्री आनंद प्रभु


गाज़ीपुर के खिदराबाद स्थित निरामय आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्र (Niramay Ayurvedic Chikitsa Kendra) जमानिया मोड़ पर एक भव्य उद्घाटन समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर स्वबोध आश्रम श्री ज्योतिर्धाम वाराणसी (Swabodh Ashram Shri Jyotirdham Varanasi) के प्रतिष्ठाता प्रज्ञा पुरुष ओम श्री आनंद प्रभु उपस्थित रहे। उन्होंने अपने उद्बोधन में उपस्थित श्रद्धालुओं को स्वास्थ्य की गहरी आध्यात्मिक परिभाषा से परिचित कराते हुए कहा कि “स्वास्थ्य का वास्तविक अर्थ स्व में अवस्थित होना है।” किंतु वर्तमान मानव अपने स्व के यथार्थ ज्ञान से अपरिचित है और इसी कारण उसका चिकित्सा दृष्टिकोण केवल शरीर तक सीमित रह गया है।

स्वास्थ्य का वास्तविक अर्थ आत्मबोध में निहित है:
ओम श्री आनंद प्रभु ने कहा कि आज मानव अपनी अहं चेतना को ही अपना सच्चा स्व समझ बैठा है, जिसके कारण उसकी चिकित्सा व समृद्धि शरीरगत सीमाओं तक ही सिमट गई है। उन्होंने कहा कि पदार्थ विद्या, जिसे वेदों ने “अविद्या” कहा है, मनुष्य को केवल भौतिक जगत तक सीमित रखती है, जबकि “पराविद्या” वह विद्या है जो जीवन को मुक्ति की दिशा में अग्रसर करती है। उन्होंने बताया कि जब तक व्यक्ति इस पराविद्या से परिचित नहीं होगा, वह अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य — पूर्ण स्वास्थ्य और आत्ममुक्ति — से वंचित रहेगा।

वेद ही पूर्ण ज्ञान के स्रोत हैं:
उन्होंने आगे कहा कि हमारे सनातन वेद, जिनसे आयुर्वेद (Ayurveda) की उत्पत्ति हुई, केवल शरीरगत विज्ञान का संग्रह नहीं हैं, बल्कि वे पूर्ण ज्ञान और पराविद्या के स्रोत हैं। वेदों के माध्यम से ही व्यक्ति अपने अहं चेतना से मुक्त होकर अपने दिव्य आत्मचैतन्य से युक्त हो सकता है। ओम श्री आनंद प्रभु के अनुसार, “जब तक मनुष्य अपने भीतर के आत्मस्वरूप को नहीं पहचानता, तब तक वह अपूर्ण स्वास्थ्य और अधूरे जीवन का अनुभव करता रहता है।”

समाज को पुनः वेदों की ओर लौटने की आवश्यकता:
उन्होंने समाज को यह संदेश दिया कि वर्तमान समय में मानव विज्ञान के नाम पर केवल पदार्थ विद्या की उपासना में लिप्त हो गया है, जो उसे बाह्य सुख तक सीमित रखती है। उन्होंने कहा कि यह समाज का दुर्भाग्य है कि वह अपने वैदिक ज्ञान को भूल गया है। ऐसे में आवश्यक है कि हम पुनः वेदों की ओर लौटें क्योंकि वैदिक ज्ञान ही हमें पूर्णता की दिशा में अग्रसर कर सकता है। उन्होंने कहा कि स्वबोध आश्रम समाज में यही प्रयास कर रहा है कि मनुष्य अपने वास्तविक स्वास्थ्य और आत्मबोध को पहचान सके।

अध्यात्म का अर्थ भागना नहीं, जीवन में संतुलन बनाना है:
ओम श्री आनंद प्रभु ने स्पष्ट किया कि अध्यात्म का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि जीवन के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चारों पुरुषार्थों को संतुलित रूप से जीना है। उन्होंने कहा कि “जब तक मानव अपने स्व में अवस्थित नहीं होगा, तब तक वह न पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त कर सकेगा और न ही जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष को।” उन्होंने यह भी बताया कि आयुर्वेद की चिकित्सा पद्धति हमें इसी वैदिक सत्य की ओर अग्रसर करती है, जिससे मनुष्य अपने शरीर, मन और आत्मा तीनों स्तरों पर स्वस्थ हो सके।

कार्यक्रम में अनेक गणमान्य लोगों की उपस्थिति:
इस उद्घाटन समारोह में क्षेत्र के अनेक प्रमुख लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम में डॉ. श्याम लाल यादव, डॉ. विनय गुप्ता, डॉ. अनिल तिवारी, डॉ. अरविंद कुमार राय, व्यापार मंडल जिला अध्यक्ष कालिका यादव, गुड्डू केसरी, संजय गुप्ता, डॉ. शहनाज, एडवोकेट रामाश्रय सिंह, एडवोकेट विमल कुमार तथा फोटोग्राफर एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष सुधीर केसरी प्रमुख रूप से मौजूद रहे। सभी ने केंद्र की स्थापना को समाज के लिए एक नई शुरुआत बताया और आयुर्वेदिक चिकित्सा को जन-जन तक पहुँचाने के संकल्प को सराहा।

निष्कर्ष:
खिदराबाद के निरामय आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्र का उद्घाटन केवल एक चिकित्सा संस्थान की शुरुआत नहीं, बल्कि एक वैदिक पुनर्जागरण की दिशा में उठाया गया कदम है। ओम श्री आनंद प्रभु के संदेश ने यह स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य केवल शरीर की नहीं, बल्कि आत्मा की स्थिति है। जब मानव अपने स्व में स्थित होगा, तभी वह पूर्ण स्वास्थ्य, समृद्धि और मुक्ति की प्राप्ति कर सकेगा।


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डिस्क्लेमर: यह खबर स्थानीय संवादाता/मीडिया प्लेटफार्म या अन्य द्वारा प्राप्त की गई सूचना पर आधारित है।

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