लखनऊ (Lucknow)। शहर के कठौता झील (Kathauta Jheel) स्थित वाटर वर्क्स (Water Works) में बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। जलकल विभाग (Jalkal Vibhag) में कार्यरत तत्कालीन अधिशासी अभियंता विकास शर्मा (Vikas Sharma) ने अपने तबादले के बाद भी ठेकेदार को करोड़ों रुपये का ठेका दे दिया। जांच में सामने आया है कि यह अनुबंध न केवल विभागीय नियमों की अवहेलना करते हुए किया गया, बल्कि इसके लिए न तो उच्च अधिकारियों की अनुमति ली गई और न ही किसी गवाह के हस्ताक्षर करवाए गए।
कठौता झील वाटर वर्क्स में हुआ खुलासा:
जानकारी के अनुसार, कठौता झील पर बना यह वाटर वर्क्स शहर का तीसरा सबसे बड़ा जल स्रोत है, जहां से राजधानी के कई इलाकों को पानी की आपूर्ति की जाती है। इस वाटर वर्क्स से संबंधित ठेका 12 जून 2025 को समाप्त हो गया था। बावजूद इसके, उसी महीने अधिशासी अभियंता विकास शर्मा ने ठेकेदार को नया अनुबंध जारी कर दिया। यह अनुबंध विभागीय महाप्रबंधक की अनुमति के बिना किया गया था।
न गवाह, न अनुमति, फिर भी जारी हुआ ठेका:
जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि अनुबंध पर न तो किसी जूनियर इंजीनियर (Junior Engineer) के हस्ताक्षर हैं और न ही लेखाकार (Accountant) के। जबकि सरकारी नियमों के अनुसार किसी भी अनुबंध पर दो गवाहों के हस्ताक्षर अनिवार्य होते हैं। इतना ही नहीं, अनुबंध होने के बाद संबंधित पूरी फाइल ही विभाग से गायब कर दी गई। यह घटना सामने आने के बाद जलकल विभाग में हड़कंप मच गया है।
महाप्रबंधक कुलदीप सिंह का बयान:
महाप्रबंधक कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) ने बताया कि जब वर्तमान अधिशासी अभियंता की ओर से ठेकेदार को परिसर खाली करने का नोटिस भेजा गया, तब यह पूरा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ। उन्होंने कहा, “कठौता झील के संचालन और अनुरक्षण का अनुबंध हमारी अनुमति के बिना किया गया है। यह गंभीर अनियमितता का मामला है और जांच जारी है।”
कुलदीप सिंह ने यह भी बताया कि जांच में यह पाया गया कि स्थानांतरित अधिकारी ने ही अकेले हस्ताक्षर कर ठेका जारी किया। जब अनुबंध की फाइल को खोजा गया तो वह न तो मुख्यालय में मिली और न ही जोन कार्यालय में। लेखाकार ने लिखित बयान में कहा कि ठेकेदार फाइल अपने साथ ले गया था, जिससे संदेह और गहरा गया है।
गायब फाइल और फर्जी अनुबंध से मचा हड़कंप:
फाइल के गायब होने के बाद जलकल विभाग में अफरातफरी मच गई है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, यह संभव है कि अनुबंध को वैध दिखाने के लिए जानबूझकर दस्तावेजों में हेरफेर की गई हो। अधिकारियों ने कहा कि ऐसे मामलों में अनुबंध तब तक वैध नहीं माना जा सकता जब तक उच्च अधिकारी की स्वीकृति और लेखा विभाग की पुष्टि न हो।
बिना अनुमति पांच और ठेके भी दिए गए:
जांच में यह भी सामने आया है कि केवल कठौता झील का अनुबंध ही नहीं, बल्कि गोमतीनगर (Gomtinagar) से लेकर विभवखंड (Vibhavkhand) तक कई और ठेके बिना अनुमति के जारी किए गए हैं। विभागीय सूत्रों का कहना है कि यह पूरा नेटवर्क संगठित रूप से काम कर रहा था, जहां तबादले के बाद भी अधिकारियों ने अपनी पकड़ बनाए रखी।
विभागीय जांच और कार्रवाई की तैयारी:
जलकल प्रशासन ने अब इस मामले में विस्तृत जांच के आदेश दे दिए हैं। सभी संबंधित फाइलों की पुनः जांच की जा रही है और आरोपियों की जिम्मेदारी तय की जा रही है। महाप्रबंधक कुलदीप सिंह ने कहा कि “इस तरह की अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।”
निष्कर्ष:
कठौता झील वाटर वर्क्स का यह मामला केवल एक ठेके का नहीं, बल्कि विभागीय लापरवाही और भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें उजागर करता है। तबादले के बाद भी अनुबंध जारी करना, फाइल का गायब हो जाना और बिना अनुमति करोड़ों रुपये का ठेका दिया जाना प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अब देखना यह होगा कि जांच के बाद इस घोटाले में शामिल लोगों पर क्या कार्रवाई होती है।
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