एक जज का काम न्याय करना होता है, लेकिन अगर उसके साथ ही अन्याय हो तो वह कहां जाए? क्या जिला जज के प्रशासनिक नियंत्रण में काम कर रहा जज ऐसे आदेशों को मानने के लिए बाध्य है, जो कानून के खिलाफ हों? मुजफ्फरनगर के जज रवि कुमार दिवाकर (Ravi Kumar Diwakar) ने गुरुवार, 17 सितंबर को 10 साल पुराने एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के एक मामले में फैसला सुनाते हुए ऐसे ही सवाल उठाए। मामले में लंबे समय से अदालत के चक्कर काट रहे आरोपी को सबूतों और गवाहों के अभाव में बरी कर दिया गया।
करीब 10 दिन पहले जज रवि कुमार दिवाकर ने शाहपुर शहजादी हत्याकांड में आरोपी को फांसी की सजा सुनाई थी। उस फैसले में उन्होंने लिखा था कि वह डरपोक जज कहलाने के बजाय मरना पसंद करेंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि जब तक वह अपने सिद्धांतों पर चल सकते हैं, तब तक सेवा करेंगे, अन्यथा इस्तीफा दे देंगे।
मुकदमों के ट्रांसफर पर जताई नाराजगी:
ताजा फैसले में जज रवि कुमार दिवाकर ने अपनी अदालत से 97 मुकदमों को वापस लेकर दूसरी अदालतों में स्थानांतरित करने के तत्कालीन जिला जज के फैसले पर नाराजगी जताई। उन्होंने अपने आदेश में कानून और संविधान के शासन का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है। देश संविधान और विधि के शासन के आधार पर चलेगा, किसी लोक सेवक के मनमाने व्यवहार से नहीं।
जज ने कहा कि कोई भी लोक सेवक राजाओं की तरह आचरण नहीं कर सकता। उसे अपने प्रशासनिक आदेश के पीछे कानूनी कारण बताना होगा। फैसले में इस बात पर भी सवाल उठाया गया कि 18 अगस्त को सेवानिवृत्ति से 13 दिन पहले बिना कारण बताए मुकदमों को स्थानांतरित करने का तत्कालीन जिला जज का फैसला उचित था या नहीं।
10 साल पुराने एनडीपीएस मामले में आरोपी बरी:
यह फैसला मुजफ्फरनगर के पटेल नगर इलाके के रहने वाले अशोक भारती से जुड़े मामले में आया। अशोक भारती को 21 अक्टूबर 2015 को भरतिया कॉलोनी के पास से गिरफ्तार किया गया था। पुलिस के अनुसार, उनके पास से 150 ग्राम चरस बरामद हुई थी। पुलिस ने वर्ष 2016 में मामले में आरोप पत्र दाखिल किया था।
मामले की सुनवाई के दौरान आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत अदालत के सामने पेश नहीं किए जा सके। सार्वजनिक स्थान से बरामदगी के बावजूद गवाहों की भी कमी रही। सबूत और गवाह उपलब्ध नहीं होने के कारण अदालत ने आरोपी को बरी कर दिया। सुनवाई के दौरान जज ने फिल्म ‘दामिनी’ के चर्चित संवाद ‘तारीख पर तारीख’ का भी उल्लेख किया।
जज ने कहा कि अदालत में इंसाफ की जगह तारीख पर तारीख मिलती रहती है। उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को अपनी बेगुनाही साबित करने में 10 साल लग गए। लंबे समय तक अदालत के चक्कर काटना अपने आप में एक तरह का दंड है और न्यायिक व्यवस्था की धीमी गति से निर्दोष व्यक्ति को मानसिक आघात होता है।
35 पेज के आदेश में कानूनी प्रावधानों का उल्लेख:
जज रवि कुमार दिवाकर ने अपने 35 पेज के आदेश में कहा कि जिला जज ने बिना कोई कारण बताए एक जैसे नौ आदेश पारित कर उनकी अदालत से मुकदमे वापस मंगा लिए। इन आदेशों में केवल ‘रिकॉल’ शब्द का इस्तेमाल किया गया था और इसके पीछे कोई कारण नहीं बताया गया। जज ने कहा कि इस आधार पर इसे स्पीकिंग ऑर्डर नहीं कहा जा सकता।
आदेश में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 409 का भी उल्लेख किया गया। जज ने लिखा कि यह धारा जिला जज को किसी मामले को वापस लेने की शक्ति देती है, लेकिन धारा 409(2) में इस शक्ति पर रोक का प्रावधान है। उनके अनुसार, यदि किसी मामले में सुनवाई शुरू हो चुकी है तो विशेष परिस्थितियों को छोड़कर सेशन जज उसे वापस नहीं ले सकते।
लोक सेवकों की जिम्मेदारी पर भी टिप्पणी:
फैसले में जज ने लोक सेवकों की जिम्मेदारी को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि एक लोक सेवक में सही को सही और गलत को गलत कहने की क्षमता होनी चाहिए। जिस संस्था का वह प्रतिनिधित्व करता है, उसकी विश्वसनीयता भी उसके आचरण से जुड़ी होती है।
जज के अनुसार व्यवस्था तभी लंबे समय तक चल सकती है, जब लोक सेवक सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता रखते हों। इसी संदर्भ में उन्होंने प्रशासनिक आदेशों के पीछे कानूनी आधार और कारण बताए जाने के महत्व पर भी सवाल उठाए।
17 साल की न्यायिक सेवा में 36 दोषियों को फांसी:
जज रवि कुमार दिवाकर ने 17 साल की न्यायिक सेवा पूरी की है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वह अब तक 36 दोषियों को फांसी की सजा सुना चुके हैं। मुजफ्फरनगर में करीब पांच महीने के कार्यकाल के दौरान ही उन्होंने 23 दोषियों को मृत्युदंड दिया है।
उन्होंने 29 नवंबर 2025 को मुजफ्फरनगर के अपर जिला एवं सत्र न्यायालय, फास्ट ट्रैक कोर्ट-3 में कार्यभार संभाला था। वर्ष 2009 में उन्होंने न्यायिक सेवा शुरू की थी। मुजफ्फरनगर से पहले वह संभल और बरेली में तैनात रहे। ज्ञानवापी प्रकरण में दिए गए फैसले को लेकर भी वह चर्चा में रहे हैं। उन्होंने पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों को पत्र भेजकर कई बार खुद को खतरा होने की बात कही थी।
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