लखनऊ में ‘सिंदूर खेला’: 450 साल पुरानी परंपरा का अद्भुत नज़ारा

रिपोर्ट: सऊद अंसारी


Lucknow: लखनऊ शहर में विजयादशमी का त्योहार गुरुवार को बंगाली समाज की महिलाओं द्वारा निभाए गए सिंदूर खेला की अद्भुत परंपरा के साथ धूमधाम से संपन्न हुआ। नौ दिनों तक चली दुर्गा माता की आराधना के बाद, सुहागिन महिलाओं ने इस खास अनुष्ठान में हिस्सा लिया। गोमती नगर के रविंद्र पल्ली और केसरबाग स्थित बंगाली क्लब जैसे स्थानों पर विवाहित महिलाओं की भारी भीड़ उमड़ी, जहाँ उन्होंने एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर उत्सव मनाया। यह परंपरा न केवल विजयदशमी के समापन का प्रतीक है, बल्कि परिवार की सुख-समृद्धि और पति की लंबी आयु की कामना का भी माध्यम है।



हर्षोल्लास के साथ सिंदूर का आदान-प्रदान:


उत्सव में शामिल होने के लिए महिलाएं लाल जोड़े में दुल्हन की तरह सजकर पहुँचीं। उन्होंने पूरे हर्षोल्लास के साथ एक-दूसरे को सिंदूर लगाया और विजयादशमी की बधाई दी। इस दौरान सभी सुहागिन महिलाओं ने विधि-विधान से माता दुर्गा को विदाई देने की तैयारी की। परंपरा के अनुसार, महिलाओं ने सबसे पहले पान के पत्ते का उपयोग करके माता दुर्गा की प्रतिमा पर सिंदूर अर्पित किया। इसके अलावा, माता को पान और विभिन्न प्रकार की मिठाइयाँ भी खिलाई गईं, जिसे भोग के रूप में चढ़ाया गया। समारोह स्थल पर मौजूद सभी महिलाएं इस जश्न में पूरी तरह से डूबी हुई नजर आईं, जो बताता है कि यह अनुष्ठान उनके लिए कितना महत्वपूर्ण है।

माता की विदाई और सिंदूर की मान्यता:


सिंदूर खेला के दौरान महिलाओं ने बताया कि इस सामाजिक मान्यता के अनुसार, जब माँ दुर्गा वर्ष में एक बार अपने मायके से विदा होकर वापस जाती हैं, तो सुहागिन महिलाएं उनकी माँग को सिंदूर से भरती हैं। यह परंपरा इसी विदाई उत्सव को आगे बढ़ाती है। महिलाओं ने इस उत्सव की तुलना होली के त्योहार से की, क्योंकि इसमें भी रंगों (सिंदूर) का प्रयोग होता है और लोग एक-दूसरे को बधाई देते हैं। सिंदूर खेला के माध्यम से महिलाएं यह कामना करती हैं कि उनके वैवाहिक जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य बना रहे। इस परंपरा के द्वारा, सभी उपस्थित महिलाएं अगले वर्ष फिर से माता के आगमन की प्रार्थना करते हुए उन्हें विदा करती हैं।

चार सौ पचास साल पुरानी है यह परंपरा:


दिशा बनर्जी नामक एक महिला ने इस परंपरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। उन्होंने जानकारी दी कि सिंदूर खेला की यह परंपरा लगभग 450 साल पुरानी है और दशमी के दिन यह पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती आ रही है। बंगाली समाज में यह माना जाता है कि माँ दुर्गा साल में एक बार ही अपने मायके आती हैं, और उनकी विदाई का यह क्षण बेहद भावुक और महत्वपूर्ण होता है। 450 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के अनुसार, विसर्जन से पहले बंगाली समाज की महिलाओं ने माँ दुर्गा के साथ-साथ सरस्वती, कार्तिकेय, लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की और उनका श्रृंगार किया। पूजा के बाद, विसर्जन से ठीक पहले माता को विशेष मिठाइयों का भोग लगाया गया।

सिंदूर खेला के बाद विशेष प्रसाद वितरण:


सिंदूर खेला के आयोजन के बाद विशेष प्रसाद का वितरण एक और महत्वपूर्ण परंपरा है। देवांशु चौधरी ने बताया कि यह विशेष प्रसाद रविंद्र पल्ली के पंडाल में वितरित किया जाता है। माता की विदाई से पहले सभी भक्तों का मुंह मीठा कराया जाता है। यह प्रसाद कई सामग्रियों को मिलाकर तैयार किया जाता है, जिसमें दूध, दही, केला, चुरा (चपटा चावल) और बताशे शामिल होते हैं। इसे साल में सिर्फ एक बार बनाया जाता है और मान्यता है कि इस प्रसाद को ग्रहण करने से भक्त की सभी कामनाएँ पूरी होती हैं। यह प्रसाद केवल सिंदूर खेला के दिन ही वितरित और ग्रहण किया जा सकता है, जो इसकी पवित्रता और विशिष्टता को दर्शाता है।

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