रिपोर्ट: सऊद अंसारी
Lucknow: लखनऊ विकास प्राधिकरण की ओर से अवैध निर्माणों पर लगातार कार्रवाई के आदेश दिए जा रहे हैं, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। शिया कॉलेज के सामने स्थित शाहिद प्लाजा की सील बिल्डिंग इसका ताजा उदाहरण है, जहां सील के बावजूद सौदेबाजी और वसूली का खेल जमकर चल रहा है।
सील में डीलिंग का कारोबार
ज़ोन 7 में तैनात जूनियर इंजीनियर विवेक पटेल और प्रमोद पांडे के साथ एई अनूप श्रीवास्तव पर आरोप है कि उन्होंने सील बिल्डिंग से अवैध वसूली की और फिर उसे अध्यासित करा दिया। हालात यह बताते हैं कि यहां “सैया भाई कोतवाल तो डर काहे का” वाली कहावत पूरी तरह सच साबित हो रही है।
पुराने लखनऊ में मोटी वसूली
केवल शाहिद प्लाजा ही नहीं, बल्कि पुराने लखनऊ के कई क्षेत्रों में भी यही खेल चलता नजर आ रहा है। अवैध प्लॉटिंग और निर्माण कार्य से मोटा पैसा वसूला जा रहा है और बदले में इन निर्माणों को संरक्षण दिया जा रहा है। सवाल यह है कि आखिर किसकी शह पर यह कारोबार इतनी बेखौफी से फल-फूल रहा है।
सील तोड़ने का सिलसिला
पूर्व जोनल अधिकारी रवि नंदन ने शिया पीजी कॉलेज के सामने बन रहे अवैध निर्माण को सील किया था। लेकिन उनके तबादले के बाद स्थिति बदल गई और सील तोड़ने के साथ डीलिंग कर काम आगे बढ़ा दिया गया। यह गंभीर सवाल खड़ा करता है कि कार्रवाई के बाद भी अवैध निर्माण कैसे दोबारा सक्रिय हो जाते हैं।
गैरतैनात कर्मचारियों के नाम पर उगाही
चौंकाने वाली बात यह भी है कि जून में जिन कर्मचारियों की तैनाती ही नहीं थी, उनके नाम का सहारा लेकर भी वसूली की जा रही है। एई और जेई इस बहाने रकम निकालते हैं और यहां तक कि ऑफिस में तैनात पूर्व सुपरवाइजर तक को अवैध निर्माण स्थलों पर भेजकर जमकर वसूली कराई जाती है।
प्रशासन की चुप्पी पर उठते सवाल
सबसे अहम सवाल यह है कि इस पूरे खेल पर अंकुश क्यों नहीं लगाया जा रहा। ज़ोन 7 में तैनात जोनल अधिकारी और लखनऊ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष इस भ्रष्टाचार को रोकने में क्यों नाकाम साबित हो रहे हैं। क्या सच में यह पूरा तंत्र “चोर-चोर मौसेरे भाई” की तरह काम कर रहा है, जहां ऊपर से लेकर नीचे तक सबकी मिलीभगत से शाहिद प्लाजा जैसे अवैध निर्माण वसूली के अड्डे में बदल गए हैं।

