लखनऊ: पार्षद को शपथ न दिलाने पर हाईकोर्ट सख्त, मेयर के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सीज
इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) की लखनऊ बेंच ने समाजवादी पार्टी के निर्वाचित पार्षद को शपथ न दिलाए जाने के मामले में सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने गुरुवार को लखनऊ (Lucknow) की भाजपा मेयर सुषमा खर्कवाल के सभी वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार फ्रीज कर दिए। अदालत के आदेश के बाद अब मेयर अपने फंड से कोई खर्च नहीं कर सकेंगी और न ही किसी कर्मचारी पर प्रशासनिक कार्रवाई कर पाएंगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक सपा पार्षद को शपथ नहीं दिलाई जाती, तब तक यह आदेश प्रभावी रहेगा।

हाईकोर्ट ने डीएम और नगर आयुक्त को सौंपी जिम्मेदारी:
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस कमर हसन रिजवी की पीठ ने कहा कि मेयर के वित्तीय और प्रशासनिक कार्य अब जिला मजिस्ट्रेट और नगर आयुक्त देखेंगे। कोर्ट ने यह फैसला वार्ड संख्या-73 फैजुल्लागंज के पार्षद शपथ विवाद को लेकर सुनवाई के दौरान दिया। अदालत ने माना कि न्यायालय के आदेश के बावजूद निर्वाचित पार्षद को शपथ न दिलाना गंभीर मामला है।
वार्ड-73 के चुनाव से जुड़ा है मामला:
यह पूरा विवाद लखनऊ नगरीय निकाय चुनाव-2023 से जुड़ा हुआ है। वार्ड संख्या-73 फैजुल्लागंज में भाजपा प्रत्याशी प्रदीप कुमार शुक्ला उर्फ टिंकू शुक्ला और समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी ललित तिवारी के बीच मुकाबला हुआ था। मतगणना में प्रदीप कुमार शुक्ला को 4,972 वोट मिले थे, जबकि ललित तिवारी को 3,298 मत प्राप्त हुए थे। इसके बाद भाजपा प्रत्याशी को विजयी घोषित कर दिया गया था।
सपा प्रत्याशी ने कोर्ट में दी चुनौती:
चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद सपा प्रत्याशी ललित तिवारी ने 13 मई 2023 को अपर जिला जज की अदालत में याचिका दाखिल की। याचिका में आरोप लगाया गया कि भाजपा प्रत्याशी ने नामांकन पत्र दाखिल करते समय आवश्यक जानकारियां छिपाई थीं। याचिका में कहा गया कि यह चुनावी नियमों का उल्लंघन है और इसे कदाचार की श्रेणी में माना जाना चाहिए। इसी आधार पर चुनाव परिणाम को रद्द करने की मांग की गई थी।
ढाई साल चली सुनवाई के बाद फैसला:
करीब ढाई साल तक चली सुनवाई के दौरान अदालत ने नामांकन से जुड़े दस्तावेज, एफिडेविट और शपथ पत्रों की समीक्षा की। अदालत ने पाया कि जरूरी जानकारियां न देना गंभीर अनियमितता है और इससे चुनाव की वैधता प्रभावित होती है। इसके बाद 19 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने भाजपा प्रत्याशी प्रदीप कुमार शुक्ला का निर्वाचन रद्द कर दिया और ललित तिवारी को वार्ड-73 से निर्वाचित घोषित कर दिया।
शपथ न दिलाने पर हाईकोर्ट पहुंचा मामला:
ललित तिवारी ने आरोप लगाया कि निर्वाचित घोषित होने के बावजूद उन्हें पांच महीने तक शपथ नहीं दिलाई गई। उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा कि आदेश के बावजूद भाजपा पार्षद प्रदीप कुमार शुक्ला पार्षद के रूप में कार्य करते रहे। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट को बताया गया कि जिला मजिस्ट्रेट ने 23 जनवरी और 10 फरवरी 2026 को नगर आयुक्त को निर्वाचन न्यायाधिकरण के फैसले की जानकारी देते हुए शपथ प्रक्रिया पूरी कराने के निर्देश दिए थे। राज्य सरकार ने भी 4 फरवरी 2026 को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश जारी किए थे।
सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत:
हाईकोर्ट ने 12 मई को ललित तिवारी को एक सप्ताह के भीतर शपथ दिलाने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ भाजपा के प्रदीप कुमार शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की, लेकिन वहां से राहत नहीं मिली। इसके बावजूद कार्रवाई न होने पर हाईकोर्ट ने लखनऊ मेयर, जिलाधिकारी और नगर आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर जवाब देने का निर्देश दिया था।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी आईं सामने:
इस मामले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया मंच X पर पोस्ट कर लिखा कि “महापौर का सदैव महादौर नहीं होता। न्याय हुआ।” वहीं कांग्रेस पार्षद मुकेश सिंह चौहान ने कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को न्यायालय के आदेशों का पालन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय का यह आदेश साबित करता है कि न्यायालय से बड़ा कोई नहीं है।
मेयर ने कहा- आदेश का पालन होगा:
मेयर सुषमा खर्कवाल ने कहा कि वह पिछले कुछ दिनों से कमांड अस्पताल में उपचार करा रही हैं। उन्होंने कहा कि अदालत के आदेश का पालन किया जाएगा।
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