पश्चिमी घाट में 32 हजार पेड़ों पर चलेगी कुल्हाड़ी! टोरेंट पावर के 3,000 MW प्लांट पर विवाद, तमिलनाडु की बारिश पर भी पड़ सकता है असर
महाराष्ट्र (Maharashtra) के करजत (Karjat) में टोरेंट पावर (Torrent Power) की प्रस्तावित 3,000 मेगावाट क्षमता वाली पंप्ड स्टोरेज परियोजना को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। करीब 13,505 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना के निर्माण के लिए पश्चिमी घाट (Western Ghats) के सह्याद्रि क्षेत्र में 32 हजार से अधिक पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है। अब तक करीब 1,100 पेड़ काटे जाने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, स्थानीय ग्रामीणों के विरोध के बाद फिलहाल कटाई रोक दी गई है। सरकार और कंपनी इसे भविष्य की बिजली जरूरतों तथा स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार के लिए महत्वपूर्ण बता रहे हैं, जबकि पर्यावरण विशेषज्ञों, आदिवासी समुदायों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जंगल, वन्यजीवों और स्थानीय आजीविका पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई है। आशंका यह भी है कि पश्चिमी घाट के जंगलों से निकलने वाली नमी प्रभावित होने पर दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में बारिश के प्राकृतिक चक्र पर असर पड़ सकता है।
377 हेक्टेयर जमीन पर प्रस्तावित है परियोजना:
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह परियोजना महाराष्ट्र के रायगढ़ (Raigad) जिले के करजत तालुका में स्थापित की जा रही है। इसके लिए कुल 377 हेक्टेयर जमीन की आवश्यकता बताई गई है। इसमें 233 हेक्टेयर वन भूमि और 144 हेक्टेयर अन्य भूमि शामिल है। परियोजना को वर्ष 2029 तक शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की योजना को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध शुरू हो गया है।
1,100 पेड़ों की कटाई के बाद ग्रामीणों का विरोध:
करजत के सैदोंगर पहाड़ी क्षेत्र में दशहरे की सुबह पेड़ों की कटाई शुरू की गई थी। वन विभाग की ओर से पेड़ों की पहचान के लिए उन पर नंबर भी अंकित किए गए थे। कटाई के दौरान करीब 1,100 पेड़ काटे जाने की जानकारी है। इसके बाद स्थानीय ग्रामीणों ने विरोध शुरू कर दिया। आंदोलन में विपक्षी नेताओं और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने भी भाग लिया। विरोध बढ़ने के बाद फिलहाल कटाई रोक दी गई है। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, यह रोक अस्थायी है और कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए लगाई गई है। कटाई दोबारा कब शुरू होगी, इस पर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
150 आदिवासी परिवारों की आजीविका पर चिंता:
परियोजना के आसपास सैदोंगर, धाक, पाली, पोतल, अंबोट और भालीवाड़ी समेत छह छोटी बस्तियां हैं। इनमें करीब 150 परिवार रहते हैं, जिनमें अधिकांश कातकरी आदिवासी समुदाय से संबंधित हैं। इन परिवारों की आजीविका जंगल से मिलने वाले उत्पादों पर निर्भर है। ग्रामीण सूखी लकड़ियां, शहद, महुआ, जामुन और अमरूद जैसे वन उत्पाद इकट्ठा करते हैं। सूखी लकड़ियां बेचकर एक परिवार प्रतिदिन लगभग 150 से 200 रुपये तक कमा लेता है।
ग्रामीणों के अनुसार, नीम, गिलोय और अडुलसा जैसी वनस्पतियों का इस्तेमाल पारंपरिक उपचार में भी किया जाता है। मानसून के दौरान पहाड़ी के नीचे बहने वाली पेज नदी में मछलियां और केकड़े पकड़ना भी उनकी आजीविका का हिस्सा है। ऐसे में जंगल तक पहुंच सीमित होने और पेड़ों की कटाई से रोजगार, भोजन तथा पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित होने की आशंका है।
वन अधिकार कानून और मुआवजे पर सवाल:
इस परियोजना को लेकर वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत आदिवासी और परंपरागत वनवासियों के अधिकारों का मुद्दा भी उठ रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाली गांव में जंगल पर निर्भर परिवारों का पूरा विवरण ग्रामसभा की ओर से वन विभाग को उपलब्ध नहीं कराया गया। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कई बार जानकारी मांगी गई, लेकिन आवश्यक अभिलेख और सिफारिशें नहीं मिलीं।
अधिकारियों के अनुसार, करीब 18 महीने के दौरान 400 से अधिक लोगों की भागीदारी वाली जनसुनवाइयां भी हुईं। इसके बावजूद पात्र परिवारों की आधिकारिक पहचान और मुआवजे से संबंधित प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। इसी कारण पर्यावरणीय मंजूरी में किसी परिवार या गांव के पुनर्वास की आवश्यकता नहीं होने का उल्लेख किए जाने की बात सामने आई है। हालांकि, जंगल पर निर्भर परिवारों की मौजूदगी और उनके पारंपरिक अधिकारों को लेकर सवाल बने हुए हैं।
वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर भी खतरा:
करजत का इलाका पश्चिमी घाट की सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला का हिस्सा है और जैव विविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। परियोजना के पर्यावरणीय अध्ययन में व्यापक क्षेत्र के भीतर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 में शामिल 26 प्रजातियों का उल्लेख किया गया है। इनमें तेंदुआ, स्लॉथ भालू, सांभर, भारतीय साही, जंगली बिल्ली, मोर, ब्लैक ईगल, भारतीय अजगर और रसेल वाइपर जैसी प्रजातियां शामिल हैं।
इन वन्यजीवों को कानून के तहत उच्च स्तर का संरक्षण प्राप्त है। ऐसे में बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई से उनके प्राकृतिक आवास, भोजन और प्रजनन स्थलों पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। परियोजना में जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण योजना के लिए करीब 3.26 करोड़ रुपये का प्रावधान बताया गया है।
तमिलनाडु की बारिश से भी जुड़ी पर्यावरणीय चिंता:
परियोजना को लेकर एक प्रमुख चिंता पश्चिमी घाट के जंगलों और दक्षिण भारत में होने वाली बारिश के बीच संबंध को लेकर है। वर्ष 2018 में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन में पश्चिमी घाट के जंगलों से निकलने वाली नमी और तमिलनाडु (Tamil Nadu) तथा कावेरी नदी बेसिन में होने वाली बारिश के संबंध का अध्ययन किया गया था। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई (IIT Bombay) और वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) से जुड़े शोधकर्ताओं के अध्ययन के अनुसार, पेड़ वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया के जरिए वातावरण में नमी छोड़ते हैं। यह नमी हवाओं के साथ दूसरे क्षेत्रों तक पहुंचकर बारिश में योगदान देती है।
अध्ययन में पश्चिमी घाट की वनस्पति का तमिलनाडु में दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश में लगभग 25 से 40 प्रतिशत तक योगदान होने का अनुमान जताया गया था। कमजोर मानसून या सूखे की स्थिति में कुछ क्षेत्रों में यह योगदान 50 प्रतिशत तक पहुंचने की बात भी कही गई। हालांकि, इस अध्ययन में करजत की प्रस्तावित परियोजना के कारण तमिलनाडु में कितनी बारिश कम होगी, इसका कोई प्रत्यक्ष अनुमान नहीं दिया गया है।
सरकार और कंपनी का ऊर्जा जरूरतों पर जोर:
महाराष्ट्र सरकार इस परियोजना को भविष्य की बिजली जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण मान रही है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) का कहना है कि बिजली की बढ़ती मांग पूरी करने और कोयले पर निर्भरता कम करने के लिए ऐसी परियोजनाओं की जरूरत है। पंप्ड स्टोरेज तकनीक में दो जलाशय बनाए जाते हैं। बिजली की मांग कम होने पर अतिरिक्त बिजली से पानी को निचले जलाशय से ऊपर पहुंचाया जाता है। मांग बढ़ने पर ऊपरी जलाशय से पानी नीचे छोड़कर टरबाइन के माध्यम से बिजली पैदा की जाती है। इस तरह सौर और पवन ऊर्जा से उपलब्ध अतिरिक्त बिजली को बाद में इस्तेमाल के लिए संग्रहित किया जा सकता है।
टोरेंट पावर ने स्थानीय आदिवासी समुदायों के लिए 50 बिस्तरों वाला अस्पताल, स्कूलों का नवीनीकरण, कौशल विकास केंद्र और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के आश्वासन दिए हैं। कंपनी के अनुसार, निर्माण के दौरान करीब 2,000 लोगों को रोजगार मिलने का अनुमान है। हालांकि, ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का सवाल है कि इन आश्वासनों से जंगलों के नुकसान और पारंपरिक आजीविका पर पड़ने वाले प्रभाव की भरपाई किस तरह होगी।
विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती:
वर्ष 2011 में माधव गाडगिल की अध्यक्षता वाले पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल ने इस क्षेत्र को पर्यावरणीय संवेदनशीलता के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटने की सिफारिश की थी। रिपोर्ट में करजत तालुका की पाली ग्राम पंचायत को सबसे अधिक संवेदनशील श्रेणी में रखे जाने का उल्लेख है। इस श्रेणी में बड़े बांधों, खनन और अन्य बड़ी परियोजनाओं पर सख्त प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई थी। हालांकि, पैनल की सिफारिशें लागू नहीं हुईं और बाद में एक अन्य समिति ने अलग प्रस्ताव तैयार किया।
करजत परियोजना ने एक बार फिर विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन का सवाल खड़ा कर दिया है। एक ओर ऊर्जा भंडारण क्षमता बढ़ाने और कोयले पर निर्भरता कम करने की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर पश्चिमी घाट के जंगलों, वन्यजीवों और वहां रहने वाले आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा भी महत्वपूर्ण है। परियोजना के दीर्घकालिक प्रभावों का आकलन करते समय पर्यावरणीय संवेदनशीलता, वन अधिकार और स्थानीय आजीविका से जुड़े पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी होगा।
#Tags: #WesternGhats #KarjatProject #TorrentPower #ForestConservation #TribalRights
Disclaimer:
यह खबर स्थानीय संवादाता/मीडिया प्लेटफार्म या अन्य द्वारा प्राप्त की गई सूचना पर आधारित है। यदि कोई आपत्ति है या खबर से संबंधित कोई सूचना देने या अपना पक्ष रखने के लिए हमें ईमेल करें: apnabharattimes@gmail.com।