भारत और इजराइल के संबंध एक बार फिर चर्चा में हैं। 5 जुलाई को इजराइली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu (बेंजामिन नेतन्याहू) ने कहा कि अमेरिका ही नहीं, बल्कि इजराइल के अन्य मित्र देशों में 1.4 अरब आबादी वाला भारत भी शामिल है। उनका यह बयान अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance (जेडी वेंस) की उस टिप्पणी के जवाब में आया, जिसमें उन्होंने कहा था कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दुनिया के इकलौते ताकतवर नेता हैं जो इजराइल के प्रति सहानुभूति रखते हैं। हालांकि भारत और इजराइल के रिश्तों का इतिहास कई दशकों पुराना है और समय-समय पर दोनों देशों ने अलग-अलग परिस्थितियों में एक-दूसरे का सहयोग किया है।
1962 के युद्ध में भारत को मिली इजराइल की मदद:
20 अक्टूबर 1962 को चीन ने भारत पर हमला किया था। इजराइली दस्तावेजों के अनुसार, 27 अक्टूबर 1962 को तत्कालीन प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru (जवाहरलाल नेहरू) ने इजराइल के प्रधानमंत्री David Ben-Gurion (डेविड बेन गुरियन) को पत्र लिखकर हथियारों की सहायता मांगी थी।
2 नवंबर को गुरियन ने जवाब देते हुए कहा कि सभी देशों की संप्रभुता की रक्षा होनी चाहिए और सीमाओं पर तनाव कम करने के हर प्रयास का समर्थन किया जाना चाहिए। इसके बाद 18 नवंबर 1962 को नेहरू ने एक और पत्र लिखकर सीमाई क्षेत्रों की गंभीर स्थिति का उल्लेख करते हुए इजराइल की चिंता और सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया।
दस्तावेजों के अनुसार, युद्ध के दौरान भारत को इजराइल से हथियार और गोला-बारूद की आपूर्ति की गई। भारत चाहता था कि अरब देशों की नाराजगी से बचने के लिए बिना झंडे वाले जहाजों से हथियार भेजे जाएं, लेकिन हथियार इजराइली झंडे वाले जहाजों के जरिए भारत पहुंचे।
1965 और 1971 के युद्धों में भी मिला सहयोग:
Observer Research Foundation (ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन) की रिपोर्ट के अनुसार, 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में इजराइल ने भारत को 160 मिमी के M-58 मोर्टार और गोला-बारूद उपलब्ध कराए। यह पूरी प्रक्रिया गोपनीय तरीके से इजराइली व्यापारी Shlomo Zabludowicz (श्लोमो जब्लुडोविच) की कंपनी के माध्यम से पूरी की गई।
1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान भी भारत को भारी मोर्टारों की आवश्यकता पड़ी। उस समय अमेरिका का झुकाव पाकिस्तान की ओर था। ऐसे में इजराइल ने प्रत्यक्ष रूप से चर्चा में आए बिना भारत की मदद की। Nehru Memorial Museum (नेहरू मेमोरियल म्यूजियम) में सुरक्षित दस्तावेजों के अनुसार, 3 अगस्त 1971 को श्लोमो ने Prakash Kaul (प्रकाश कौल) से मुलाकात कर हथियारों की आपूर्ति बढ़ाने का भरोसा दिया और बाद में ईरान के लिए तैयार भारी मोर्टारों की खेप भारत भेजी गई।
कारगिल युद्ध में तकनीकी सहयोग बना अहम:
1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना को आधुनिक तकनीक और सटीक हथियारों की आवश्यकता थी। उस समय अमेरिका ने 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद भारत पर प्रतिबंध लगाए हुए थे, लेकिन इजराइल ने भारत को सैन्य सहायता प्रदान की।
विदेश नीति विशेषज्ञ Nicolas Blarel (निकोलस ब्लारेल) अपनी पुस्तक The Evolution of India’s Israel Policy में लिखते हैं कि इजराइल ने भारतीय वायुसेना के Mirage 2000 (मिराज 2000) विमानों के लिए लेजर डेजिग्नेटर पॉड और लेजर-गाइडेड बम उपलब्ध कराए। इसके अलावा सर्चर ड्रोन, सैटेलाइट तस्वीरें, नेविगेशन सिस्टम, मोर्टार और गोला-बारूद की आपूर्ति भी की गई, जिससे टाइगर हिल और प्वाइंट 4875 जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में अभियान को मजबूती मिली।
राजनयिक संबंधों का बदलता सफर:
इजराइल को 14 मई 1948 को स्वतंत्रता मिली। संयुक्त राष्ट्र में इजराइल और फिलिस्तीन को अलग-अलग राष्ट्र बनाने के प्रस्ताव पर भारत ने विरोध में मतदान किया था। हालांकि 17 सितंबर 1950 को भारत ने इजराइल को एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में आधिकारिक मान्यता दे दी।
विदेश नीति विशेषज्ञ P.R. Kumaraswamy (पी.आर. कुमारस्वामी) के अनुसार, 1950 से 1992 तक दोनों देशों के बीच औपचारिक मान्यता तो थी, लेकिन पूर्ण राजनयिक संबंध नहीं थे।
1971 के युद्ध के दौरान इजराइल ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत का समर्थन किया था। वहीं 1988 में भारत, फिलिस्तीन को मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश बना। इसके बाद 1992 में प्रधानमंत्री P.V. Narasimha Rao (पी.वी. नरसिम्हा राव) के कार्यकाल में दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हुए और दोनों देशों में दूतावास खोले गए।
प्रधानमंत्री मोदी के दौर में संबंधों को नई गति:
प्रधानमंत्री Narendra Modi (नरेंद्र मोदी) के कार्यकाल में भारत-इजराइल संबंधों में नया दौर शुरू हुआ। वर्ष 2015 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में फिलिस्तीन से जुड़े एक प्रस्ताव पर मतदान से दूरी बनाई। 2017 में मोदी इजराइल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने, जबकि 2018 में प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu (बेंजामिन नेतन्याहू) भारत आए।
इसी दौरान विदेश नीति में “डी-हाइफनेशन” शब्द चर्चा में आया। इसका अर्थ यह माना गया कि भारत अब इजराइल और फिलिस्तीन के मुद्दों को अलग-अलग आधार पर देखता है और प्रत्येक विषय पर अपना स्वतंत्र रुख अपनाता है।
संयुक्त राष्ट्र और पश्चिम एशिया पर भारत का संतुलित रुख:
7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले की भारत ने निंदा की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत इजराइल के साथ एकजुटता से खड़ा है।
इसके बाद 27 अक्टूबर 2023 को United Nations General Assembly (UNGA) (संयुक्त राष्ट्र महासभा) में गाजा को लेकर लाए गए प्रस्ताव पर भारत ने मतदान से दूरी बनाई। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Arindam Bagchi (अरिंदम बागची) ने कहा था कि भारत आतंकवाद की निंदा करता है और ऐसे प्रस्ताव का समर्थन नहीं कर सकता जिसमें हमास के हमले की स्पष्ट निंदा न हो।
2023 और 2024 के दौरान संयुक्त राष्ट्र में इजराइल से जुड़े कई प्रस्तावों पर भारत कभी अनुपस्थित रहा तो कई मामलों में युद्धविराम के प्रस्तावों का समर्थन भी किया। वहीं इजराइल-ईरान तनाव के दौरान भी भारत ने संयम और बातचीत के जरिए समाधान की अपील की।
जून 2025 में SCO (शंघाई सहयोग संगठन) शिखर सम्मेलन के दौरान ईरान पर इजराइल-अमेरिका के हमलों की निंदा वाले प्रस्ताव से भारत ने दूरी बनाई। इसके बाद 25-26 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजराइल का दौरा किया और आतंकवाद के खिलाफ इजराइल के साथ मजबूती से खड़े रहने की बात कही।
रक्षा सहयोग लगातार हो रहा मजबूत:
SIPRI (Stockholm International Peace Research Institute) (स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट) के अनुसार, 2021 से 2025 के बीच भारत के कुल रक्षा आयात में इजराइल की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत रही। वहीं 2020 से 2024 के बीच इजराइल के कुल हथियार निर्यात का 34 प्रतिशत हिस्सा भारत को गया।
इस अवधि में भारत ने ड्रोन, रडार, सर्विलांस सिस्टम, गाइडेड बम, राइफल, लाइट मशीन गन, Barak-8 (बराक-8) मिसाइल सिस्टम, SPYDER (स्पाइडर) एयर डिफेंस सिस्टम तथा Derby (डर्बी) और Python-5 (पाइथन-5) जैसी एयर-टू-एयर मिसाइलों सहित विभिन्न रक्षा प्रणालियों की खरीद की।
व्यापारिक संबंध भी लगातार बढ़े:
रक्षा सहयोग के अलावा भारत और इजराइल के बीच व्यापारिक संबंध भी लगातार मजबूत हुए हैं। दोनों देशों के बीच लगभग एक लाख करोड़ रुपये के कारोबार का उल्लेख किया जाता है। रक्षा, कृषि, तकनीक और अन्य क्षेत्रों में सहयोग के कारण दोनों देशों के संबंध समय के साथ और व्यापक होते गए हैं।
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