“गाजीपुर लिटरेचर फेस्टिवल: अब इतिहासकार ने भी खोला आयोजन का सच”
गाजीपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2025 का दृश्य किसी साहित्यिक पर्व से ज़्यादा एक विडंबना जैसा लगा। जहां एक ओर मंच पर साहित्य के सम्मान के बड़े-बड़े भाषण दिए जा रहे थे, वहीं दूसरी ओर उसी साहित्य की आत्मा — यानी किताबें — लंका मैदान के ठेलों पर धूल फांक रही थीं। जिन लेखकों की कलम से विचार जन्म लेते हैं, उनकी रचनाएँ सब्ज़ियों और फलों की तरह सजी नज़र आईं। यह दृश्य न केवल साहित्यकारों बल्कि पूरे समाज की संवेदना को झकझोर देने वाला था।
“साहित्य ठेले पर, संवेदना मंच पर”
फेस्टिवल के दौरान जब शहर के होटल और सभागार में साहित्य की महत्ता पर परिचर्चा हो रही थी, उसी वक्त बाहर गाजीपुर के स्थानीय लेखकों की किताबें खुले मैदान में ठेले पर सजाकर बेची जा रही थीं। डॉ. पी.एन. सिंह और डॉ. एम.डी. सिंह जैसे नामचीन साहित्यकारों की पुस्तकें भी इसी “सेल ज़ोन” में पहुंचा दी गईं।
लेखक पवन यदुवंशी ने कहा — “अपनी रचनाओं को इस तरह अपमानित देख दिल भर आया।”
कवियित्री पूजा राय ने दर्द जताया — “जब साहित्यकारों का ही सम्मान नहीं होगा, तो ऐसे कार्यक्रम का मतलब क्या है?”
“इतिहासकार ओबैदुर रहमान की कलम से फूटा व्यंग्य और आक्रोश”
गाज़ीपुर के प्रसिद्ध इतिहासकार ओबैदुर रहमान ने भी इस आयोजन पर तीखा व्यंग्य किया और अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया —
> “अमरनाथ तिवारी का मैसेज 25 दिन पहले मेरे व्हाट्सएप पर आया कि जितनी आपकी किताबें छपी हैं, उन्हें अमुक तारीख तक कमेटी को जमा कर दीजिए। मैंने पढ़ा और हंसा — गाजीपुर लिटरेचर फेस्टिवल की कमेटी का यह आदेश एक ऐसे वक्ता को, जो मुख्य वक्ता के तौर पर आमंत्रित है! इतनी भी तमीज़ नहीं कि सोचें किसे मैसेज भेज रहे हैं।”
उन्होंने आगे कहा —
> “कुछ दिनों बाद उरुज फातिमा का भी मेसेज आया और फोन भी। कहा कि आपने आयोजन के खिलाफ फेसबुक पर लिखा है। मेरी पोस्ट की लिंक शेयर की गई। उसके बाद प्रोफेसर आनंद सिंह साहब ने भी समझाने की कोशिश की।”
इतिहासकार ओबैदुर रहमान ने तीखे लहजे में कहा —
> “मेरी 15 किताबें घर बैठकर नहीं लिखी गई हैं। हर किताब के पीछे वर्षों की मेहनत, शोध और हजारों रुपए लगे हैं। संग्रहालयों और पुस्तकालयों की खाक छानी है, तब जाकर मैंने लिखा है। मैं अपनी किताबें किसी फेस्टिवल के लिए नहीं देने वाला था, ताकि उन्हें ठेले पर रख दिया जाए। मैंने एक भी किताब नहीं दी। अब सवाल है — जिन्होंने किताबें दी थीं, क्या उन्हें वापस की जाएंगी, या वे आयोजकों के घर की लाइब्रेरी की शोभा बढ़ाएंगी?”
ये भी देखें: Ghazipur: “लिटरेचर फेस्टिवल में किताबें ठेले पर, साहित्य सम्मान स्टेज पर”
इतिहासकार ने यह भी जोड़ा —
> “मेरे मित्रों ने बताया कि मेरे इनकार के बाद आयोजन समिति ने मेरा नाम कार्यक्रम से हटा दिया। लेकिन मैं संतुष्ट हूं कि कम से कम मेरी किताबें ‘ठेले के सम्मान’ से तो बच गईं।”
“फेसबुक पर फूटा जनता का गुस्सा”
उधर, गाजीपुर के एक समाजसेवी ने फेसबुक पर पोस्ट लिखी —
> “गाजीपुर के भले लोग, जो आये ठग जाये। डायलॉग कम्पनी सरकार से पैसा ले गई, संस्था से पैसा ले गई, चंदा भी ले लिया और अब सम्मानित लोगों को भी नहीं छोड़ा। कार्यक्रम से पहले कहा गया कि यह आप सबका आयोजन है, निमंत्रण दो, किताबें जुटाओ, पैसा जुटाओ। लेकिन आज वही लोग मंच पर हैं, और बाकी सब टुकुर-टुकुर देख रहे हैं कि कब चारा फेंका जाएगा।”
उनका व्यंग्य सटीक था —
> “कितनी मेहनत से एक-एक गरीब लेखक अपनी पुस्तकें तैयार करता है, और फिर उसकी किताबें ठेले पर सजा दी गईं। यह शर्म की बात है। ऐसे ठगों से गाजीपुर को बचाना होगा।”
“मंच पर भाषण, बाहर हकीकत”
विडंबना यह रही कि ठीक इसी आयोजन का उद्घाटन जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने किया। उन्होंने कहा —
> “भारत न सिर्फ चौथी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है, बल्कि सबसे बड़ी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक शक्ति भी है।”
उन्होंने राही मासूम रज़ा, विवेकी राय और कुबेर राय जैसे गाजीपुर के दिग्गज साहित्यकारों का स्मरण करते हुए कहा कि साहित्य हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है।
लेकिन सवाल यही उठता है — अगर साहित्य जड़ों से जोड़ता है, तो उन जड़ों की रचनाएँ ठेले पर क्यों रखी गईं?
“फेस्टिवल या फैशन शो?”
दो दिवसीय यह आयोजन, जो शहर के होटल और रामलीला सभागार में हुआ, शायद गाजीपुर का सबसे “चमकदार” सांस्कृतिक कार्यक्रम था — पर केवल मंच के लिए। असली साहित्य वहीं बाहर, ठेले के कोने में पड़ा रहा।
अब गाजीपुर में चर्चा है कि यह “लिटरेचर फेस्टिवल” था या “लिटरेचर मार्केट” — जहां रचनाएँ बिकती रहीं और सम्मान बाँटा गया।
“समापन – जब ठेले पर बिके शब्द, तो समाज मौन हो जाता है”
गाजीपुर लिटरेचर फेस्टिवल ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या साहित्य अब सिर्फ मंच की सजावट बनकर रह गया है? जब इतिहासकार अपनी किताबें देने से मना करें, कवि अपनी कविता के अपमान से आहत हों, और समाजसेवी सोशल मीडिया पर ठगों की पोल खोलें — तो यह आयोजन नहीं, आत्ममंथन का समय है।
किताबें बिक सकती हैं, पर विचार नहीं।
और जब विचार ठेले पर रख दिए जाएं — तो समाज के विवेक का पतन शुरू हो जाता है।
Disclaimer:
यह खबर स्थानीय संवादाता/मीडिया प्लेटफार्म या अन्य द्वारा प्राप्त की गई सूचना पर आधारित है।