Ghazipur: “लिटरेचर फेस्टिवल में किताबें ठेले पर, साहित्य सम्मान स्टेज पर”

गाजीपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान लंका मैदान का दृश्य देखकर किसी भी साहित्यप्रेमी का दिल दहल सकता था। जहां मंच पर शब्दों के सम्मान के गीत गाए जा रहे थे, वहीं बाहर ठेले पर किताबें सजाकर बेची जा रही थीं — जैसे टमाटर और आलू। साहित्य का यह “साहित्यिक बाजार” शायद आने वाले समय में शोध का विषय बनेगा कि आखिर साहित्य को ठेले तक कौन और क्यों पहुंचा गया।

“साहित्य” ठेले पर और “सम्मान” मंच पर

कार्यक्रम के दौरान जब लोग अंदर वातानुकूलित हॉल में “साहित्य की गरिमा” पर भाषण सुन रहे थे, तभी बाहर स्थानीय लेखकों की रचनाएँ धूप में तप रही थीं। डॉ. पी.एन. सिंह और डॉ. एम.डी. सिंह जैसे नामचीन साहित्यकारों की किताबें भी उन्हीं ठेलों पर “सेल आइटम” बनी पड़ी थीं। यह दृश्य शायद उस विडंबना का प्रतीक था, जहां किताबें अपनी जगह खो चुकी हैं, और दिखावे ने “संवेदना” को भी मंच से बाहर कर दिया है।

एक लेखक आंखें नम थीं — बोले, “दिल द्रवित हो गया अपनी पुस्तकों को इस हाल में देखकर।” कवियित्री पूजा राय ने कहा, “अपने काव्य संग्रह को इस तरह धूल खाते देख मन टूट गया। जब साहित्यकारों का ही सम्मान नहीं होगा तो ऐसे फेस्टिवल का मतलब क्या बचता है?”


फेसबुक पर फूटा ग़ाज़ीपुर का गुस्सा

इसी बीच, एक समाजसेवी ने फेसबुक पर लंबी पोस्ट लिखी — “गाजीपुर के भले लोग, जो आये ठग जाये।” उनकी कलम से निकले शब्दों में व्यंग्य भी था और चेतावनी भी। उन्होंने लिखा कि “डायलॉग कम्पनी सरकार से पैसा ले गई, संस्था पर पैसा ले गई, चंदा भी ले लिया — और अब सम्मानित लोगों को भी नहीं छोड़ा।”

उनका दर्द साफ झलक रहा था — “कार्यक्रम से पहले सबको बेवकूफ बनाया गया। कहा गया कि यह सबका कार्यक्रम है, निमंत्रण दो, किताबें जुटाओ, पैसा जुटाओ। और अब, जब मंच सजा, तो सम्मान सिर्फ उन्हीं के हिस्से आया जो हवाई जहाज से उतरकर होटल तक पहुंचे। बाकी सब टुकुर-टुकुर देख रहे थे कि कब ‘घघरा वाली ओमन’ चारा फेंके और ‘सलवार सूट वाला आदमी’ आवाज लगाए — आओ भौं-भौं करो!”

यह उपमा शायद अतिशयोक्ति नहीं थी, बल्कि उस असहज सच्चाई की झलक थी जिसमें मेहनतकश साहित्यकार खुद को ठेला-विक्रेता के रूप में देख रहे थे।

किताबों का अपमान, समाज की आत्मा पर चोट

किताबें केवल कागज़ नहीं होतीं — वे समाज की आत्मा होती हैं। लेकिन गाजीपुर में यह आत्मा भी ठेले पर रख दी गई। आयोजकों ने शायद भूल से समझ लिया कि “बुक फेयर” का मतलब “बुक सेल” है। फर्क यह नहीं समझ पाए कि साहित्य सिर्फ बिकने की चीज नहीं, बल्कि समझने और सहेजने की विरासत है।

यह दृश्य केवल लेखकों का अपमान नहीं था, बल्कि पूरे समाज के उस हिस्से पर सवाल था जो अब किताबों को सिर्फ सजावट समझता है। जब शब्द उपेक्षित हो जाते हैं, तो समाज भी धीरे-धीरे मौन हो जाता है। और शायद वही मौन इस मेले के चारों ओर पसरा था।

मंच पर भाषण, बाहर हकीकत

विडंबना यह कि ठीक इसी फेस्टिवल का उद्घाटन जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने किया। मंच से उन्होंने कहा — “भारत न सिर्फ चौथी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है, बल्कि सबसे बड़ी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक शक्ति भी है।”
उन्होंने गाजीपुर के साहित्यकार राही मासूम रज़ा, विवेकी राय और कुबेर राय को याद करते हुए कहा कि “साहित्य हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है।”

मगर सवाल यही उठता है — अगर साहित्य जड़ों से जोड़ता है, तो उन्हीं जड़ों की किताबें ठेले पर क्यों? जिन लेखकों ने गाजीपुर को पहचान दी, उनके वारिसों की किताबें आज गुमनामी और उपेक्षा की धूल झाड़ रही थीं।

गाजीपुर का “फेस्टिवल मॉडल” : बोलो, ठेला है कि मंच?

कहने को तो लिटरेचर फेस्टिवल दो दिन का भव्य आयोजन था। शहर के होटल में सेमिनार, सभागार में काव्य पाठ और मंच पर रोशनी। लेकिन बाहर, वहीं लंका मैदान में, साहित्य के असली योद्धा ठंडे बेंचों पर बैठे अपनी किताबों के ढेर को निहार रहे थे — मानो कह रहे हों, “हमने तो शब्दों में आत्मा डाली, पर किसी ने उन्हें भाव नहीं दिया।”

अब गाजीपुर के लोग पूछ रहे हैं — यह “फेस्टिवल” था या “फैशन शो”? क्योंकि जहां साहित्य मंच से भाषणों में था, वहीं असली किताबें ठेले पर थी।


जब ठेले पर बिके शब्द, तो सन्नाटा भी बोलेगा
गाजीपुर लिटरेचर फेस्टिवल का दृश्य एक सवाल छोड़ गया है — क्या साहित्य अब सिर्फ मंच की सजावट बनकर रह गया है?

अगर हां, तो आने वाले वक्त में शायद कवि सम्मेलन नहीं, “सेल ऑफ पोएट्री” का बोर्ड दिखेगा। और तब हम सबको यह याद रखना होगा — जब किताबें ठेले पर बिकती हैं, तो समाज के विचार भी उसी ठेले पर उतर जाते हैं।

गाजीपुर के इस फेस्टिवल ने सिर्फ किताबों का नहीं, सम्मान का भी मेला लगा दिया — फर्क बस इतना था कि मेला में भाव-ताव चल रहा था, और सम्मान सिर्फ भाषणों में था।

Disclaimer:
यह खबर स्थानीय संवादाता/मीडिया प्लेटफार्म या अन्य द्वारा प्राप्त की गई सूचना पर आधारित है।

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