जल जीवन मिशन में भ्रष्टाचार!

पहले एक विभाग ने सड़क बनायीं तो फिर दुसरे ने उसे खोद दिया, फिर टेंडर हुआ फिर सड़क बनी लेकिन इस बार छार्री बिछाकर छोड़ दिया, कई बार सड़क बनी और गद्दा हो गया, गड्डे शिकायत हुई, तब तक दुर्घटना हो गयी, ख़बर अखबार के पन्ने में कलि स्याही से छप गये, तब तक दूसरा गद्दा हो गया, जनता का आक्रोश जागने ही वाला था कि उसी गड्डे में फिर दुर्घटना हुई और इस बार इस गड्डे ने प्राण ले लिए, कलि स्याही अखबार के पन्नो पर शब्दों से समस्याओं को बयां करती रही और सड़कों में गड्डे नहीं, गद्दों में सड़क बनते रहें, बारिश का पानी गड्ढों में भरता रहा और गाँव में पानी की टंकी वर्षों से बनती रही…. ऐसी कई ख़बरें आपने पढ़ी होंगी या सुनी होंगी, लेकिन सवाल है कि इस समस्या का जड़ कहाँ है?

3 अप्रैल 2025 की ख़बर है जब लोकसभा में विपक्षी दलों के कई सांसदों ने सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘जल जीवन मिशन’ में विभिन्न राज्यों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होने का आरोप लगाया और इसकी जांच कराने की मांग की। समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद ने सदन में शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाते हुए कहा कि उनके निर्वाचन क्षेत्र फैजाबाद में जल जीवन मिशन योजना के तहत पाइप बिछाने के लिए सारी सड़कें खोद दी गईं। उन्होंने आरोप लगाया कि सड़कों की खुदाई कर पानी की जो पाइपलाइन बिछाई गई, उस पर करोड़ों रुपये खर्च किये गए लेकिन किसी भी गांव में जलापूर्ति नहीं हो पा रही है। सपा सांसद ने इस योजना के क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार होने का आरोप लगाते हुए इसकी जांच कराने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई किये जाने की मांग की।

संसद के अन्दर जल जीवन मिशन को लेकर जिस तरह से भ्रष्टाचार के आरोप लगाये गये, ये अपने आप में गंभीर है। ये और गंभीर तब बन जाता है जब अख़बारों में आपके सामने भ्रष्टाचार की खबर छपती है और आप उसे पढ़कर अनदेखा कर देते हैं । आप भूल जाते हैं कि ये जो विकास कार्य हो रहे हैं, वो आपके ही टैक्स के पैसे से संभव है और उसी में सेंध मारी की जा रही है।

बात यहीं नहीं ख़त्म होती बड़ा सवाल तो तब खड़ा हो जाता है जब कोई सरकारी कर्मचारी अपना रसूख ज़माने लगे और नियम कानून को ताख पर रखकर सालों तक एक ही कुर्सी पर जमा रहे है। थोड़ा नजार अख़बारों पर घुमा लिया कीजिये। भारत एकता टाइम्स नामक समाचार पत्र में 1 मई 2025 को एक खबर प्रकाशित होती है कि उत्तर प्रदेश के जनपद गाजीपुर में जलनिगम विभाग का एक प्रधान सहायक लिपिक 2006 से एक ही कुर्सी पर बैठा है। जबकि साहब का प्रमोशन भी हो गया लेकिन तबादला नहीं हुआ। भईया ऐसी क्या बात है इस कुर्सी में, हमें भी बताएं।

ख़बर के अनुसार जलनिगम विभाग में 19 वर्षों तैनात प्रधान सहायक लिपिक की दबंगई इस कदर बढ़ गई है कि सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में सुमार जलजीवन मिशन योजना में भ्रष्टाचार की लकीर खींचने वाला एक प्रधान सहायक लिपिक की नियुक्ति 2006 में गाजीपुर में जलनिगम ग्रामीण के कार्यालय में हुई। यही से प्रमोशन हुआ लेकिन इनका तबादला नहीं हुआ। यह बाबू अपने रसूक के बल पर कार्य करता है। सूत्रों के माने तो 2022 में एक कर्मचारी के पेंशन, एरियर का अधिक भुगतान कर दिया गया था। शिकायत पर इसकी जांच चली और जांच पूरी भी नहीं हुई। ठंडे बस्ते में चली गई।

ख़बर के अनुसार जलनिगम के अधिकारियों के मिली भगत से भ्रष्टाचार का खेल जोर शोर से चल रहा है। बताया जा रहा है कि जिले में जलजीवन मिशन योजना में तीन बड़ी कंपनियां काम कर रही है एलएनटी बीएसए, एचएफसीएल कंपनियों ने गावो में पानी टंकिया और पाइप लाइन बिछाने का काम कर रही है। चर्चा है कि कंपनियों के बिल भुगतान करने के नाम पर भी भ्रष्टाचार का खेल चल रहा है। इसके साथ ही एनजीओ के माध्यम से गावो में प्रचार प्रसार और स्लोगन लिखने वाले से भी वसूली का काम प्रधान सहायक लिपिक के द्वारा किया जाता है।

अगर ये बातें सत्य हैं तो यही कारण है वो कुर्सी जिसपर साहब बैठ गये हैं, वो मलाईदार है। एक बात है संविधान और कानून के साथ गद्दारी नहीं करनी चाहिए। हमारा देश इसी से चलता है और जिस पैसे से ये साहब मोटी तनख्वा पाते होंगे, वो देश के नागरिकों के खून पसीने की कमाई का पैसा है।

वैसे कई वर्षों तक एक ही कुर्सी पर विराजमान होना कानून के खिलाफ है, सूत्रों के अनुसार ये साहब 19 वर्षों से एक ही जगह विराजमान हैं जबकि इनका 5 साल में जनपद के बाहर और 7 साल में जोन के बाहर तबादला हो जाना चाहिए। ये केवल उत्तर प्रदेश के जनपद के जनपद गाजीपुर की समस्या नहीं है ऐसी समस्या अन्य विभाग में राजधानी लखनऊ में भी है, जहाँ पी डब्लू डी विभाग में एक साहब 20 सालों से एक ही कुर्सी पर विराजमान है, प्रमोशन हो गया है, प्रमोशन का बाद वो पद उस विभाग है भी नहीं लेकिन साहब का रुतबा देखिये। न क़ानून का भय है और ना ही सरकार से डर।

अखबारों में ख़बरों की कमी नहीं है, कमी है संज्ञान लेने वालों की। इन ख़बरों ने सरकारी योजानाओं में भर्ष्टाचार की तस्वीर दिखाई है कि कैसे सरकारी कर्मचारी और ठेकेदार सरकार की आँखों में धुल झोंककर, आम जनमानस के साथ अन्याय करते हैं।

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