UP में हो रही अदृश्य मौतों का काला सच – “कटी पतंग”

अवध और काशी की खुशबू

अवध की खुशबू और काशी की ताजी हवाएं हर किसी को अपना बना लेती हैं। यह उत्तर प्रदेश है — यहाँ की आत्मा में खुशियों का प्रवेश है। कंधों पर जिम्मेदारियां हैं, चेहरे पर मुस्कान। यह कहानी है लखनऊ के शोएब, जौनपुर के डॉ. समीर हाशमी और शिक्षक संदीप तिवारी, उन्नाव के अमर राजपूत और मेरठ के सुहेल की। उम्र अलग‑अलग थी, काम अलग‑अलग था, लेकिन मकसद एक ही था — अपने परिवार को खुश रखना, अपने बच्चों की हँसी और घर की रौनक बनाए रखना।

त्योहार और पतंगबाजी की खुशियाँ

जनवरी की शुरुआत की वह कड़कड़हाटी ठंड, और फिर जनवरी के मध्य में वह मीठी धूप। इसी मौसम में हर गली‑मोहल्ला रंगीन हो जाता है। हर तरफ पकवान की खुशबू आती है, और आसमान रंग‑बिरंगे पतंगों से भर जाता है। बच्चे छतों पर दौड़ते हैं, पिता उनके पीछे‑पीछे मुस्कुराते हैं।

यही तो हमारी संस्कृति की खूबसूरती है — इसमें ना जाति दिखती है, ना धर्म। बस लोग होते हैं… और उनकी खुशियाँ। ये पाँचों भी इसी रंग में रंगे थे, जिम्मेदारियाँ निभाते हुए, अपने परिवार की मुस्कान को सबसे ऊपर रखते हुए।

हादसा और सस्पेंस

आज का दिन खास था। घर पर सभी बेसब्री से इनका इंतजार कर रहे थे। पतंगबाजी का आनंद, मिठाइयों की खुशबू, और त्योहार की रौनक — सबके चेहरों पर झलक रही थी। लेकिन जैसे ही ये सभी अपने‑अपने घर की ओर रवाना हुए, सड़क पर अचानक सब गिर पड़े, जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने उन पर प्रहार किया हो।

बाइक पर जा रहे शोएब, क्लिनिक से लौटते समीर, बेटी के साथ चल रहे संदीप, डिलीवरी के लिए दौड़ते अमर और दोस्त के साथ घर लौटते सुहेल — सब अचानक गिर पड़े। हँसी और खुशी की हवा पल भर में डर और शोक में बदल गई, और पतंगों की रंगीन डोरें अब जानलेवा बन गईं।

परिवारों पर मातम

ये केवल हादसे नहीं थे… ये परिवारों के टूटे सपनों की कहानी थीं। लखनऊ की बेटियाँ पिता के बिना खेल की खुशी को अधूरी पाती हैं। जौनपुर में समीर हाशमी की पत्नी और संदीप तिवारी की बेटी घर की हर दीवार पर उनके पिता की यादें गूँजती हैं। उन्नाव में अमर राजपूत की पत्नी और बेटियाँ उनके बिना नाश्ते की मेज पर अकेली बैठती हैं। मेरठ में सुहेल का परिवार हँसी और उम्मीद दोनों खो चुका है।

हर घर में सन्नाटा था। हर दीवार गवाह थी। खुशियों के त्योहार अब श्मशान की खामोशी में बदल चुके थे।

मांझा, सरकार और संदेश

और इस सबके पीछे था — चीनी मांझा। यह कोई साधारण धागा नहीं था। नायलॉन या प्लास्टिक के धागे पर कांच का बारीक पाउडर और केमिकल गोंद लगाया जाता है। यह इतनी तेज़ी से कटता है कि हवा में चलते हुए इंसान की गर्दन तक छेद कर सकता है। यह मांझा चोरी‑छिपे फैक्ट्रियों में बनता है, छोटे पैकेटों में बाजारों तक पहुँचता है, और फिर बच्चों की पतंग से निकलकर सड़कों पर उतर आता है — जहाँ राह चलते लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं।

सरकार ने अब इसे हल्के में नहीं लिया। उत्तर प्रदेश सरकार ने साफ़ आदेश दिए — चीनी मांझे से हुई मौतें हत्या जैसी गंभीर श्रेणी में ली जाएँगी। पुलिस की टीमें गली‑गली छापेमारी कर रही हैं, गोदाम सील किए जा रहे हैं, हजारों रील जब्त की जा चुकी हैं, और दुकानदारों पर मुकदमे दर्ज हो रहे हैं। जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं।

पतंगबाज़ी हमारी परंपरा है, लेकिन जब यह जानलेवा चीनी मांझे से मिलती है, तो वही परंपरा भयावह बन जाती है। सतर्क रहें, सुरक्षित रहें, और अपने परिवार और समाज को बचाएँ। हवा में उड़ती पतंगें हमें याद दिलाती हैं — खुशी उड़ाने के लिए हैं, डर नहीं।

By Abhinendra

Journalist

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