Bahujan Samaj Party (बहुजन समाज पार्टी) ने विधानसभा चुनाव को लेकर सबसे पहले चुनावी मोर्चा खोलते हुए संगठनात्मक तैयारियों को गति दे दी है। पार्टी अब तक 24 विधानसभा प्रभारियों के नाम घोषित कर चुकी है। इन सभी प्रभारियों का चयन पार्टी प्रमुख Mayawati (मायावती) द्वारा लिए गए इंटरव्यू के बाद किया गया है। बसपा की परंपरा रही है कि जिन नेताओं को विधानसभा प्रभारी बनाया जाता है, बाद में वही पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार भी बनते हैं। ऐसे में इन नामों को विधानसभा चुनाव के संभावित प्रत्याशियों की पहली सूची के रूप में भी देखा जा रहा है।
24 विधानसभा प्रभारियों के नाम घोषित:
बसपा ने अब तक 24 विधानसभा क्षेत्रों के लिए प्रभारियों की घोषणा कर दी है। पार्टी की कार्यशैली के अनुसार इन नेताओं का चयन सीधे Mayawati (मायावती) के स्तर पर इंटरव्यू के बाद किया गया है। बसपा लंबे समय से इसी प्रक्रिया का पालन करती रही है, जिसमें विधानसभा प्रभारी के रूप में नियुक्त नेता बाद में संबंधित सीट से चुनाव मैदान में उतरते हैं। यही वजह है कि इन घोषणाओं को पार्टी की पहली संभावित उम्मीदवार सूची माना जा रहा है।
कार्यकर्ता सम्मेलनों से संगठन की ताकत का आकलन:
पार्टी केवल विधानसभा प्रभारियों की घोषणा तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित कर संगठन की सक्रियता और जनसंपर्क को भी मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। इसी क्रम में 10 अगस्त को Sadabad (सादाबाद) विधानसभा क्षेत्र, Hathras (हाथरस) में कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। इस सम्मेलन में पहली बार पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक Akash Anand (आकाश आनंद) शामिल होंगे। पार्टी की तैयारी इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं की मौजूदगी के माध्यम से चुनावी संदेश देने की है।
जेवर में भी होगा बड़ा कार्यक्रम:
बसपा की चुनावी गतिविधियां केवल सादाबाद तक सीमित नहीं रहेंगी। 25 अगस्त को Akash Anand (आकाश आनंद) Jewar (जेवर) विधानसभा, Gautam Buddh Nagar (गौतमबुद्ध नगर) में भी कार्यक्रम करेंगे। इसी दौरान पार्टी पहले से तय किए जा चुके Satveer Singh Nagar (सतवीर सिंह नागर) को विधानसभा प्रभारी घोषित करेगी। बसपा की योजना हर महीने दो से तीन बड़े कार्यक्रम आयोजित करते हुए इसी प्रकार विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में अपने संभावित उम्मीदवारों की घोषणा करने की है।
पश्चिमी यूपी पर विशेष रणनीति:
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित, विशेषकर जाटव मतदाताओं की बड़ी संख्या को देखते हुए बसपा अपनी रणनीति को उसी क्षेत्र से मजबूत करने की कोशिश कर रही है। यह वर्ग लंबे समय से पार्टी का प्रमुख समर्थन आधार माना जाता रहा है। हाल के वर्षों में Azad Samaj Party (आजाद समाज पार्टी) के प्रमुख Chandrashekhar Azad (चंद्रशेखर आजाद) ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटव और मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ाई है। ऐसे में बसपा ने Akash Anand (आकाश आनंद) को चुनावी अभियान में प्रमुख भूमिका देकर इस चुनौती का जवाब देने की रणनीति अपनाई है।
राजनीतिक विश्लेषक ने बताई रणनीति:
राजनीतिक विश्लेषक Harshvardhan Tripathi (हर्षवर्धन त्रिपाठी) के अनुसार वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान Akash Anand (आकाश आनंद) की सभाओं में बड़ी संख्या में दलित युवाओं की भागीदारी देखने को मिली थी। उनका मानना है कि बसपा अब इसी रणनीति को विधानसभा चुनाव में भी आगे बढ़ाना चाहती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से चुनावी अभियान की शुरुआत के जरिए पार्टी संगठन को मजबूत करने के साथ-साथ राजनीतिक संदेश देने की तैयारी कर रही है।
सादाबाद और जेवर में सामाजिक समीकरण पर फोकस:
Sadabad (सादाबाद) विधानसभा क्षेत्र में बसपा ने Dr. Avin Sharma (डॉ. अविन शर्मा) को आगे किया है। यह सीट कभी बसपा के वरिष्ठ नेता Ramveer Upadhyay (रामवीर उपाध्याय) का मजबूत राजनीतिक क्षेत्र मानी जाती थी। उनके पार्टी छोड़ने के बाद बसपा अब Dr. Avin Sharma (डॉ. अविन शर्मा) के माध्यम से उसी सामाजिक समीकरण को फिर से मजबूत करने का प्रयास कर रही है। उनका नाम कार्यकर्ता सम्मेलन में पहले ही घोषित किया जा चुका है।
दूसरी ओर Jewar (जेवर) विधानसभा में पार्टी ने Satveer Singh Nagar (सतवीर सिंह नागर) पर भरोसा जताया है। वह वर्ष 2007 और 2012 में Dadri (दादरी) से बसपा विधायक रह चुके हैं। वर्ष 2019 में उन्होंने Gautam Buddh Nagar (गौतम बुद्ध नगर) लोकसभा सीट से बसपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव भी लड़ा था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर मतदाताओं की प्रभावी भूमिका को देखते हुए पार्टी का यह निर्णय महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पहली सूची में सामाजिक संतुलन की झलक:
बसपा द्वारा घोषित विधानसभा प्रभारियों की सूची पर नजर डालने से स्पष्ट होता है कि पार्टी ने विभिन्न प्रभावशाली सामाजिक वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया है। पार्टी केवल अपने पारंपरिक दलित समर्थन आधार तक सीमित रहने के बजाय ब्राह्मण, मुस्लिम, ओबीसी और सवर्ण समाज के प्रमुख चेहरों को भी जिम्मेदारी दे रही है। कई विधानसभा क्षेत्रों में ब्राह्मण नेताओं को आगे कर बसपा पुराने ‘ब्राह्मण-दलित’ सामाजिक समीकरण को दोबारा मजबूत करने की कोशिश करती दिखाई दे रही है। वहीं, प्रत्याशियों के चयन में संबंधित विधानसभा क्षेत्र के सामाजिक समीकरणों को भी प्राथमिकता दी गई है।
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