अपमान के इरादे के बिना जातिसूचक शब्द कहना एससी/एसटी एक्ट का अपराध नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी व्यक्ति को जातिसूचक शब्द से संबोधित कर देना अपने आप में इस कानून के तहत अपराध नहीं बनता, यदि उसके पीछे अपमानित करने का स्पष्ट और दुर्भावनापूर्ण इरादा साबित न हो। न्यायमूर्ति संतोष राय (Santosh Rai) की एकल पीठ ने इसी आधार पर बरेली (Bareilly) की विशेष अदालत की ओर से जारी समन आदेश को रद्द कर दिया।
मामला बरेली जिले के इज्जतनगर थाने में दर्ज प्राथमिकी से जुड़ा था। इसमें मुख्य आरोपी हिम्मत सिंह के साथ उसके पिता वेगराज सिंह और भाई दौलत को भी नामजद किया गया था। हालांकि, पुलिस की जांच के बाद दोनों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल नहीं किया गया था।
प्राथमिकी और पुलिस जांच में क्या सामने आया:
इज्जतनगर थाना क्षेत्र में दर्ज प्राथमिकी में हिम्मत सिंह के अलावा वेगराज सिंह और दौलत के नाम भी शामिल किए गए थे। मामले की जांच के दौरान पुलिस ने आरोपों और संबंधित बयानों की पड़ताल की।
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने केवल मुख्य आरोपी हिम्मत सिंह के खिलाफ न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया। वहीं, वेगराज सिंह और दौलत को जांच के दौरान क्लीनचिट दे दी गई। इस तरह पुलिस की जांच में दोनों के खिलाफ आगे मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया गया।
क्लीनचिट के बाद ट्रायल कोर्ट ने जारी किया समन:
पुलिस की ओर से क्लीनचिट दिए जाने के बावजूद मामला आगे बढ़ा। बरेली की विशेष अदालत ने पीड़िता के बयानों को आधार बनाते हुए वेगराज सिंह और दौलत को समन जारी कर तलब किया।
विशेष अदालत के इस आदेश के बाद दोनों ने इसे इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचियों की ओर से अदालत के सामने ट्रायल कोर्ट के समन आदेश को रद्द करने की मांग की गई।
हाईकोर्ट ने अपमान के इरादे को माना अहम:
मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध तय करने के लिए केवल जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल किया जाना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि यह भी देखा जाना जरूरी है कि संबंधित शब्दों का इस्तेमाल किस उद्देश्य और इरादे से किया गया था।
अदालत के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को अपमानित करने का स्पष्ट दुर्भावनापूर्ण इरादा साबित नहीं होता है तो केवल जातिसूचक शब्द से संबोधित करने के आधार पर एससी/एसटी एक्ट की धाराएं लागू नहीं की जा सकतीं।
दोनों याचियों को हाईकोर्ट से मिली राहत:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद वेगराज सिंह और दौलत के खिलाफ जारी समन आदेश को रद्द कर दिया। इस तरह दोनों याचियों को हाईकोर्ट से राहत मिली।
अदालत के फैसले में इस बात को महत्वपूर्ण माना गया कि पुलिस जांच में दोनों को क्लीनचिट दी गई थी और उनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल नहीं किया गया था। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के बयानों के आधार पर उन्हें समन किया था।
जातिसूचक शब्द और कानून के तहत अपराध पर अदालत की टिप्पणी:
हाईकोर्ट की टिप्पणी का मुख्य आधार यह रहा कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समुदाय के किसी व्यक्ति को जातिसूचक शब्द से संबोधित किए जाने के मामले में केवल शब्दों का इस्तेमाल देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी स्थापित होना चाहिए कि उनका इस्तेमाल अपमानित करने के इरादे से किया गया था।
अदालत ने इसी कानूनी पहलू को ध्यान में रखते हुए वेगराज सिंह और दौलत के खिलाफ जारी समन को रद्द कर दिया। हालांकि, यह फैसला मामले में सामने आए तथ्यों और अदालत के समक्ष रखी गई सामग्री के आधार पर है।
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