एफआईआर के लिए सीधे हाईकोर्ट आने पर सख्ती, न्यायिक बोझ बढ़ने पर याचिका खारिज
इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने एफआईआर दर्ज कराने के लिए सीधे उच्च न्यायालय का रुख करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि हर मामले में पुलिस अधिकारियों और मजिस्ट्रेट के पास निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत जाने के बजाय सीधे हाईकोर्ट पहुंचने से न्यायिक व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है। साथ ही इससे मजिस्ट्रेट को कानून के तहत मिली भूमिका और अधिकार भी प्रभावित होते हैं।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह (Chandra Dhari Singh) और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना (Tarun Saxena) की खंडपीठ ने प्रयागराज (Prayagraj) के झूंसी निवासी अमित कुमार श्रीवास्तव की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिका में झूंसी थाने को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
फायरिंग की कथित घटना को लेकर दायर हुई याचिका:
याची की ओर से अदालत में बताया गया कि अगस्त 2025 में शाम करीब सात बजे रहीमापुर के पास उसकी कार पर कथित तौर पर फायरिंग की गई थी। आरोप के मुताबिक, दो बाइकों पर सवार चार अज्ञात हमलावरों ने कार को निशाना बनाया था।
याची का कहना था कि घटना के संबंध में पुलिस को लिखित शिकायत दी गई, लेकिन इसके बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की गई। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर ध्यान दिया कि एफआईआर दर्ज कराने के लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया उपलब्ध है और ऐसे मामलों में सीधे हाईकोर्ट आने के बजाय संबंधित अधिकारियों तथा मजिस्ट्रेट के समक्ष अपनी शिकायत रखी जा सकती है।
याची के अधिवक्ता ने ललिता कुमारी मामले का दिया हवाला:
सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित ‘ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले का हवाला दिया। अधिवक्ता ने दलील दी कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस के लिए एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है।
याची की ओर से यह आरोप भी लगाया गया कि स्थानीय थानाध्यक्ष कथित आरोपियों से मिले हुए हैं। इसी आधार पर पुलिस की ओर से एफआईआर दर्ज नहीं किए जाने की शिकायत अदालत के सामने रखी गई।
वहीं, दूसरी ओर अपर शासकीय अधिवक्ता ने याची की ओर से लगाए गए आरोपों को पूरी तरह झूठा और मनगढ़ंत बताया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने मामले पर अपना रुख स्पष्ट किया।
हाईकोर्ट ने निर्धारित प्रक्रिया पर दिया जोर:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि एफआईआर दर्ज कराने के लिए हर मामले में सीधे हाईकोर्ट का रुख करना उचित नहीं है। अदालत ने ऐसी प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए कहा कि इससे उच्च न्यायालय पर अनावश्यक मुकदमेबाजी का बोझ बढ़ता है।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि कानून ने मजिस्ट्रेट को भी महत्वपूर्ण भूमिका और वैधानिक अधिकार दिए हैं। इसलिए शिकायतकर्ता को उपलब्ध निर्धारित कानूनी उपायों का इस्तेमाल करना चाहिए।
निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी:
मामले की सुनवाई के बाद खंडपीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। अदालत की टिप्पणी का केंद्र यह रहा कि एफआईआर दर्ज कराने से जुड़े मामलों में कानून में उपलब्ध प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
इस मामले में याची ने सीधे हाईकोर्ट से पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की थी। अदालत ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किए जाने पर नाराजगी जताई और याचिका को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी में यह स्पष्ट किया गया कि पुलिस और मजिस्ट्रेट के स्तर पर उपलब्ध कानूनी उपायों का इस्तेमाल किए बिना प्रत्येक मामले में सीधे उच्च न्यायालय पहुंचना न्यायिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है।
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